ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त 11 से 20

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त ११
[ऋषि-जेतामाधुच्छन्दस । देवता – इन्द्र। छन्द- अनुष्टुप्।]

इन्द्रंविश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः। रथीतमं रथीनां वाजानां सतपर्ति पतिम्॥१॥
समुद्र के तुल्य व्यापक, सब रथियो मे महानतम, अन्नो के स्वामी और सत्प्रवृत्तियो के पालक इन्द्रदेव को समस्त स्तुतियां अभिवृद्धि प्रदान करती हैं ॥१॥

सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते। त्वामभि प्रणोनुमो जेतारमपराजितम्॥२॥
हे बलरक्षक इन्द्रदेव! आपकी मित्रता से हम बलशाली होकर किसी से न डरें। हे अपराजेय – विजयी इन्द्रदेव! हम साधक गण आपको प्रणाम करते हैं ॥२॥

पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्तन्त्यूतयः। यदी वाजस्य गोमतः स्तोतृभ्यो मंहते मघम्॥३॥
देवराज इन्द्र की दानशिलता सनातन है। ऐसी स्थिति मे आज के यजमान भी स्तोताओ को गवादि सहित अन्न दान करते है तो इन्द्रदेव द्वारा की गई सुरक्षा अक्षुण्ण रहती है ॥३॥

पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत। इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्तावज्री पुरुष्टुतः॥४॥
शत्रु के नगरो को विनष्ट करने वाले हे इन्द्रदेव युवा ज्ञाता, अतिशक्तिशाली, शुभ कार्यो के आश्रयदाता तथा सर्वाधिक कीर्ति-युक्त होकर विविधगुण समपन्न हुये हैं॥४॥

त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम् । त्वा देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानस आविषुः॥५॥
हे वज्रधारी इन्द्रदेव। आपने गौओ (सूर्य किरणो) को चुराने वाले असुरो के व्युह को नष्ट किया, तब असुरो से पराजित हुये देवगण आपके साथ आकर संगठित हुए॥५॥

तवांह शूर रातिभिःप्रत्यायं सिन्धुमावदन्। उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः ॥‍६॥
संग्रामशूर हे इन्द्रदेव! आपकी दानशीलता से आकृष्ट होकर हम होतागण पुनः आपके पास आये है। हे स्तुत्य इन्द्रदेव! सोमयाग मे आपकी प्रशंसा करते हुये ये ऋत्विज एवं यजमान आपकी दानशिलता को जानते है ॥६॥

मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिर:। विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषांश्रवांस्युत्तिर॥७॥
हे इन्द्रदेव! अपनी माता द्वारा आपने ’शुष्ण’(एक राक्षस) को पराजित किया। जो बुद्धीमान आपकी इस माया को जानते है, उन्हे यश और बल देकर वृद्धि प्रदान करें ॥७॥

इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत। सहस्त्र यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसी: ॥८॥
स्तोतागण, असंख्यो अनुदान देनेवाले, ओजस् (बल प्राक्रम) के कारण जगत् के नियन्ता इन्द्रदेव की स्तुति करने लगे ॥८॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त १२
[ऋषि-मेधातिथि काण्व। देवता-अग्नि, छटवी ऋचा के प्रथम पाद के देवता निर्मथ्य अग्नि और आहवनीय अग्नि। छन्द-गायत्री।]

अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ॥१॥
हे सर्वज्ञाता अग्निदेव! आप यज्ञ के विधाता है, समस्त देवशक्तियों को तुष्ट करने की सामर्थ्य रखते हैं। आप यज्ञ की विधि व्यवस्था के स्वामी है। ऐसे समर्थ आपको हम देव दूत रूप मे स्वीकार करते है॥१॥

अग्निमग्निं हवीमभिः सदा हवन्त विश्पतिम् । हव्यवाहं पुरुप्रियम्॥२॥
प्रजापालक, देवो तक हवि पहुंचाने वाले, परमप्रिय, कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाले हे अग्निदेव! हम याजक गण हवनीय मंत्रो से आपको सदा बुलाते है॥२॥

अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे । असि होता न ईड्यः॥३॥
हे स्तुत्य अग्निदेव ! आप अरणि मन्थन से उत्पन्न हुये है। आस्तीर्ण (बिछे हुये) कुशाओ पर बैठे हुये यजमान पर अनुग्रह करने हेतु आप (यज्ञ की) हवि ग्रहण करने वाले देवताओ को इस यज्ञ मे बुलायें॥३॥

ताँ उशतो वि बोधय यदग्ने यासि दूत्यम् । देवैरा सत्सि बर्हिषि॥४॥
हे अग्निदेव! आप हवि की कामना करने वाले देवो को यहाँ बुलाएँ और इन कुशा के आसन पर देवो के साथ प्रतिष्ठित हों॥४॥

घृताहवन दीदिवः प्रति ष्म रिषतो दह । अग्ने त्वं रक्षस्विनः॥५॥
घृत आहुतियो से प्रदीप्त हे अग्निदेव ! आप राक्षसी प्रवृत्तियो वाले शत्रुओं को सम्यक रूप से भस्म करे॥५॥

अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा । हव्यवाड्जुह्वास्यः॥६॥
यज्ञ स्थल के रक्षक, दूरदर्शी, चिरयुवा, आहुतियो को देवो तक पहुंचाने वाले, ज्वालायुक्त आहवनीय यज्ञाग्नि को अरणि मन्थन द्वारा उत्पन्न अग्नि से प्रज्वलित किया जाता है॥६॥

कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे । देवममीवचातनम्॥७॥
हे ऋत्विजो ! लोक हितकारी यज्ञ मे रोगो को नष्ट करने वाले, ज्ञानवान अग्निदेव की स्तुति आप सब विशेष रूप से करें॥७॥

यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतं देव सपर्यति । तस्य स्म प्राविता भव॥८॥
देवगणो तक हविष्यान्न पहुँचाने वाले हे अग्निदेव ! जो याजक, आप (देवदूत० की उत्तम विधि से अर्चना करते हौ, आप उनकी भली भाँति रक्षा करें॥८॥

यो अग्निं देववीतये हविष्माँ आविवासति । तस्मै पावक मृळय॥९॥
हे शोधक अग्निदेव! देवो के लिए हवि प्रदान करने वाले जो यजमान आपकी प्रार्थना करते है, आप उन्हे सुखी बनाये॥९॥

स नः पावक दीदिवोऽग्ने देवाँ इहा वह । उप यज्ञं हविश्च नः॥१०॥
हे पवित्र दीप्तिमान अग्निदेव ! आप देवो को हमारे यज्ञ मे हवि ग्रहण करने के निमित्त ले आएँ॥१०॥

स न स्तवान आ भर गायत्रेण नवीयसा । रयिं वीरवतीमिषम्॥११॥
हे अग्निदेव! नवीनतम गायत्री छन्द वाले सूक्त से स्तुति किये जाते हुये आप हमारे लिये पुत्रादि ऐश्वर्य और् बलयुक्त् अन्नो को भरपूर प्रदान करें॥११॥

अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिर्देवहूतिभिः । इमं स्तोमं जुषस्व नः॥१२॥
हे अग्निदेव! अपनि कान्तिमान् दीप्तियो से देवो को बुलाने निमित्त हमारी स्तुतियो को स्वीकार् करें॥१२॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त १३
[ऋषि – मेधातिथि काण्व। देवता १-इध्म अथवा समिद्ध अग्नि, २-तनूनपात्, ३-नराशंस, ४-इळा, ५-बर्हि, ६-दिव्यद्वार्, ७-उषासानक्ता, ८ दिव्यहोता प्रचेतस, ९- तीन देवियाँ- सरस्वती, इळा , भारती, १०-त्वष्टा, ११ वनस्पति, १२ स्वाहाकृति। छन्द-गायत्री।]

सुसमिद्धो न आ वह देवाँ अग्ने हविष्मते । होतः पावक यक्षि च॥१॥
पवित्रकर्ता यज्ञ सम्पादन कर्ता हे अग्निदेव। आप अच्छी तरह प्रज्वलित होकर यजमान के कल्याण के लिये देवताओ का आवाहन करें और उनको लक्ष्य करके यज्ञ सम्पन्न करे अर्थात देवो के पोषण के लिये हविष्यान्न ग्रहण करें ॥१॥

मधुमन्तं तनूनपाद् यज्ञं देवेषु नः कवे । अद्या कृणुहि वीतये॥२॥
उर्ध्वगामी, मेधावी हे अग्निदेव ! हमारी रक्षा के लिये प्राणवर्धक-मधुर् हवियो को देवो के निमित्त प्राप्त करें और उन तक पहुँचायेँ ॥२॥

नराशंसमिह प्रियमस्मिन्यज्ञ उप ह्वये । मधुजिह्वं हविष्कृतम्॥३॥
हम इस यज्ञ मे देवताओ के प्रिय और् आह्लादक (मदुजिह्ल) अग्निदेव का आवाहन करते है। वह हमारी हवियो को देवताओं तक पहुँचाने वाले है, अस्तु , वे स्तुत्य हैं॥३॥

अग्ने सुखतमे रथे देवाँ ईळित आ वह । असि होता मनुर्हितः॥४॥
मानवमात्र के हितैषी हे अग्निदेव! आप अपने श्रेष्ठ-सुखदायी रथ से देवताओ को लेकर (यज्ञस्थल पर) पधारे। हम आपकी वन्दना करते है।

स्तृणीत बर्हिरानुषग्घृतपृष्ठं मनीषिणः । यत्रामृतस्य चक्षणम्॥५॥
हे मेधावी पुरुषो ! आप इस यज्ञ मे कुशा के आसनो को परस्पर मिलाकर इस तरह से बिछाये कि उस पर घृतपात्र को भली प्रकार से रखा जा सके, जिससे अमृततुल्य घृत का सम्यक् दर्शन हो सके॥५॥

विश्रयन्तामृतावृधो द्वारो देवीरसश्चतः । अद्या नूनं च यष्टवे॥६॥
आज यज्ञ करने के लिये निश्चित रूप से ऋत(यज्ञीय वातावरण) की वृद्धि करने वाले अविनाशी दिव्यद्वार खुल जाएँ॥६॥

नक्तोषासा सुपेशसास्मिन्यज्ञ उप ह्वये । इदं नो बर्हिरासदे॥७॥
सुन्दर रूपवती रात्रि और उषा का हम इस यज्ञ मे आवाहन करते है। हमारी ओर से आसन रूप मे यह बर्हि (कुश) प्रस्तुत है॥७॥

तासुजिह्वा उप ह्वये होतारा दैव्या कवी । यज्ञं नो यक्षतामिमम्॥८॥
उन उत्तम वचन वाले और मेधावी दोनो(अग्नियो) दिव्य होताओ को यज्ञ मे यजन के निमित्त हम बुलाते हैं॥८॥

इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः । बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः॥९॥
इळा सरस्वती और मही ये तीनो देवियाँ सुखकारी और क्षयरहित है! ये तीनो बिछे हुए दीप्तिमान कुश के आसनो पर विराजमान् हों॥९॥

इह त्वष्टारमग्रियं विश्वरूपमुप ह्वये । अस्माकमस्तु केवलः॥१०॥
प्रथम पूज्य, विविध रूप वाले त्वष्टादेव का इस यज्ञ मे आवाहन करते है, वे देव केवल हमारे ही हो॥१०॥

अव सृजा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः । प्र दातुरस्तु चेतनम्॥११॥
हे वनस्पतिदेव! आप देवो के लिये नित्य हविष्यान्न प्रदान करने वाले दाता को प्राणरूप उत्साह प्रदान करें॥११॥

स्वाहा यज्ञं कृणोतनेन्द्राय यज्वनो गृहे । तत्र देवाँ उप ह्वये॥१२॥
(हे अध्वर्यु !) आप याजको के घर मे इन्द्रदेव की तुष्टी के लिये आहुतियाँ समर्पित करें। हम होता वहाँ देवो को आमन्त्रित करते है॥१२॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त १४
[ऋषि – मेधातिथि काण्व। देवता विश्वेदेवता। छन्द-गायत्री।]

ऐभिरग्ने दुवो गिरो विश्वेभिः सोमपीतये । देवेभिर्याहि यक्षि च ॥१॥
हे अग्निदेव! आप समस्त देवो के साथ इस यज्ञ मे सोम पीने के लिये आएँ एव हमारी परिचर्या उअर् स्तुतियो को ग्रहण करके यज्ञ कार्य सम्पन्न करें ॥१॥

आ त्वा कण्वा अहूषत गृणन्ति विप्र ते धियः । देवेभिरग्न आ गहि ॥२॥
हे मेधावी अग्निदेव! कण्व ऋषि आपको बुला रहे हैं, वे आपके कार्यो की प्रशंसा करते हौ। अतः आप देवो के साथ यहाँ पधारे ॥२॥

इन्द्रवायू बृहस्पतिं मित्राग्निं पूषणं भगम् । आदित्यान्मारुतं गणम् ॥३॥
यज्ञशाला मे हम इन्द्र, वायु, बृहस्पति,मित्र, अग्नि, पूषा,भग, आदित्यगण और मरुद्‍गण आदि देवो का आवाहन करते है॥३॥

प्रवोभ्रियन्त इन्दवो मत्सरा मादयिष्णवः। द्रप्सा मध्वश्चमूषदः ॥४॥
कूटपीसकर तैयार किया हुआ, आनन्द और हर्ष बढा़ने वाला यह मधुर सोमरस अग्निदेव के लिये चमसादि पात्रो मे भरा हुआ है॥४॥

ईळते त्वामवस्यवः कण्वासो वृक्तबर्हिषः । हविष्मन्तो अरंकृतः ॥५॥
कण्व ऋषि के वंशज अपनी सुरक्षा की कामना से, कुश आसन बिछाकर हविष्यान्न व अलंकारो से युक्त होकर अग्निदेव की स्तुति करते हैं॥५॥

घृतपृष्ठा मनोयुजो ये त्वा वहन्ति वह्नयः । आ देवान्सोमपीतये ॥६॥
अतिदीप्तिमान पृष्ठभाग वाले, मन के संकल्प मात्र से ही रथ मे नियोजित हो जाने वाले अश्वो(से नियोजित रथ) द्वारा आप सोमपान के निमित्त देवो को ले आएँ॥६॥

तान्यजत्राँ ऋतावृधोऽग्ने पत्नीवतस्कृधि । मध्वः सुजिह्व पायय ॥७॥
हे अग्निदेव! आप यज्ञ की समृद्धी एंव शोभा बढा़ने वाले पूजनीय इन्द्रादि देव को सपत्‍नीक इस यज्ञ मे बुलायें तथा उन्हे मधुर् सोमरस का पान करायें॥७॥

ये यजत्रा य ईड्यास्ते ते पिबन्तु जिह्वया । मधोरग्ने वषट्कृति ॥८॥
हे अग्निदेव! यजन किये जाने योग्य और् स्तुति किये जाने योग्य जो देवगण है, वे यज्ञ मे आपकी जिह्वा से आनन्दपूर्वक मधुर सोमरस का पान करें ॥८॥

आकीं सूर्यस्य रोचनाद्विश्वान्देवाँ उषर्बुधः । विप्रो होतेह वक्षति ॥९॥
हे मेधावी होतारूप अग्निदेव! आप प्रातः काल मे जागने वाले विश्वदेवि को सूर्य रश्मियो से युक्त करके हमारे पास लाते है॥९॥

विश्वेभिः सोम्यं मध्वग्न इन्द्रेण वायुना । पिबा मित्रस्य धामभिः ॥१०॥
हे अग्निदेव ! आप इन्द्र वायु मित्र आदि देवो के सम्पूर्ण तेजो के साथ मधुर् सोमरस का पान करें ॥१०॥

त्वं होता मनुर्हितोऽग्ने यज्ञेषु सीदसि । सेमं नो अध्वरं यज ॥११॥
हे मनुष्यो के हितैषी अग्निदेव! आप होता के रूप मे यज्ञ मे प्रतिष्ठ हों और हमारे इस् हिंसारहित यज्ञ हि सम्पन्न करें॥११॥

युक्ष्वा ह्यरुषी रथे हरितो देव रोहितः । ताभिर्देवाँ इहा वह ॥१२॥
हे अग्निदेव ! आप रोहित नामक रथ को ले जाने मे सक्षम, तेजगति वाली घोड़ीयो को रथ मे जोते एवं उनके द्वारा देवताओ को इस यज्ञ मे लाएँ॥१२॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त १५
[ऋषि – मेधातिथि काण्व। देवता-(प्रतिदेवता ऋतु सहित) १-५ इन्द्रदेव, २ मरुद्‍गण,३ त्वष्टा, ४,१२ अग्नि,६ मित्रावरुण, ७,१० द्रविणोदा,११ अश्‍विनीकुमार। छन्द-गायत्री।]

इन्द्र सोमं पिब ऋतुना त्वा विशन्त्विन्दवः । मत्सरासस्तदोकसः॥१॥
हे इन्द्रदेव! ऋतुओ के अनुकूल सोमरस का पान करें, ये सोमरस आपके शरीर मे प्रविष्ट हो; क्योंकि आपकी तृप्ति का आश्रयभूत साधन यही सोम है ॥१॥

मरुतः पिबत ऋतुना पोत्राद्यज्ञं पुनीतन । यूयं हि ष्ठा सुदानवः॥२॥
दानियो मे श्रेष्ठ हे मरुतो! आप पोता नामक ऋत्विज् के पात्र से ऋतु के अनुकूल सोमरस का पान करें एवं हमारे इस यज्ञ को पवित्रता प्रदान करें ॥२॥

अभि यज्ञं गृणीहि नो ग्नावो नेष्टः पिब ऋतुना । त्वं हि रत्नधा असि॥३॥
हे त्वष्टादेव! आप पत्नि सहित हमारे यज्ञ की प्रशंसा करे, ऋतु के अनुकूल सोमरस का पान करें! आप निश्‍चय ही रत्नो को देनेवाले है॥३॥

अग्ने देवाँ इहा वह सादया योनिषु त्रिषु । परि भूष पिब ऋतुना॥४॥
हे अग्निदेव! आप देवो को यहाँ बुलाकर उन्हे यज्ञ के तीनो सवनो (प्रातः, माध्यन्दिन एवं सांय) मे आसीन करें। उन्हे विभूषित करके ऋतु के अनुकूल सोम का पान करें ॥४॥

ब्राह्मणादिन्द्र राधसः पिबा सोममृतूँरनु । तवेद्धि सख्यमस्तृतम्॥५॥
हे इन्द्रदेव! आप ब्रह्मा को जानने वाले साधक के पात्र से सोमरस का पान करे, क्योंकि उनके साथ आपकी अविच्छिन्न मित्रता है॥५॥

युवं दक्षं धृतव्रत मित्रावरुण दूळभम् । ऋतुना यज्ञमाशाथे ॥६॥
हे अटल व्रत वाले मित्रावरुण! आप दोनो ऋतु के अनुसार बल प्रदान करने वाले है। आप कठिनाई से सिद्ध होने वाले इस यज्ञ को सम्पन्न करते हैं॥६॥

द्रविणोदा द्रविणसो ग्रावहस्तासो अध्वरे । यज्ञेषु देवमीळते॥७॥
धन की कामना वाले याजक सोमरस तैयार करने के निमित्त हाथ मे पत्थर धारण् करके पवित्र यज्ञ मे धनप्रदायक अग्निदेव की स्तुति करते है॥७॥

द्रविणोदा ददातु नो वसूनि यानि शृण्विरे । देवेषु ता वनामहे॥८॥
हे धन प्रदायक अग्निदेव! हमे वे सभी धन प्रदान करे, जिनके विषय मे हमने श्रवण किया है। वे समस्त धन हम देवगणो को ही अर्पित करते हैं॥८॥ [देव शक्तियो से प्राप्त विभूतियो का उपयोग देवकार्यो के लिये ही करने का भाव व्यक्त किया गया है।]

द्रविणोदाः पिपीषति जुहोत प्र च तिष्ठत । नेष्ट्रादृतुभिरिष्यत॥९॥
हे धन प्रदायक अग्निदेव! नेष्टापात्र (नेष्टधिष्ण्या स्थान-यज्ञ कुण्ड) से ऋतु के अनुसार सोमरस पीने की इच्छा करते है। अतः हे याजक गण! आप वहाँ जाकर यज्ञ करें और पुन: अपने निवास स्थान के लिये प्रस्थान करें ॥९॥

यत्त्वा तुरीयमृतुभिर्द्रविणोदो यजामहे । अध स्मा नो ददिर्भव॥१०॥
हे धनप्रदायक अग्निदेव! ऋतुओ के अनुगुत होकर हम आपके निमित्त सोम के चौथे भाग को अर्पित करते है, इसलिये आप हमारे लिये धन प्रदान करने वाले हो ॥१०॥

अश्विना पिबतं मधु दीद्यग्नी शुचिव्रता । ऋतुना यज्ञवाहसा॥११॥
दिप्तिमान, शुद्ध कर्म करने वाले, ऋतु के अनुसार यज्ञवाहक हे अश्‍विनीकुमारो! आप इस मधुर सोमरस का पान करें॥११॥

गार्हपत्येन सन्त्य ऋतुना यज्ञनीरसि । देवान्देवयते यज ॥१२॥
हे इष्टप्रद अग्निदेव! आप गार्हपत्य के नियमन मे ऋतुओ के अनुगत यज्ञ का निर्वाह करने वाले हैं, अतः देवत्व प्राप्ति की कामना वाले याजको के निमित्त देवो का यजन करें॥१२॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त १६
[ऋषि- मेधातिथि काण्व। देवता-इन्द्र।छन्द-गायत्री]

आत्वा वहन्तु हरयो वृषणं सोमपीतये । इन्द्र त्वा सूरचक्षसः ॥१॥
हे बलवान इन्द्रदेव! आपके तेजस्वी घोड़े सोमरस पीने के लिये आपको यज्ञस्थल पर लाएँ तथा सूर्य के समान प्रकाशयुक्त ऋत्विज् मन्त्रो द्वारा आपकी स्तुति करें॥१॥

इमा धाना घृतस्नुवो हरी इहोप वक्षतः। इन्द्रं सुखतमे रथे ॥२॥
अत्यन्त सुखकारी रथ मे नियोजित इन्द्रदेव के दोनो हरि (घोड़े) उन्हे (इन्द्रदेव को) घृत से स्निग्ध हवि रूप धाना(भुने हुये जौ) ग्रहण करने के लिये यहाँ ले आएँ॥२॥

इन्द्रं प्रातर्हवामह इन्द्रं प्रयत्यध्वरे। इन्द्रं सोमस्य पीतये ॥३॥
हम प्रातःकाल यज्ञ प्रारम्भ करते समय मध्याह्नकालीन सोमयाग प्रारम्भ होने पर तथा सांयकाल यज्ञ की समाप्ति पर भी सोमरस पीने के निमित्त इन्द्रदेव का आवाहन करते है॥३॥

उप नः सुतमा गहि हरिभिरिन्द्र केशिभिः। सुते हि त्वा हवामहे ॥४॥
हे इन्द्रदेव! आप अपने केसर युक्त अश्‍वो से सोम के अभिषव स्थान के पास् आएँ। सोम के अभिषुत होने पर हम आपका आवाहन करते है॥४॥

सेमं न स्तोममा गह्युपेदं सवनं सुतम्। गौरो न तृषितः पिब ॥५॥
हे इन्द्रदेव! हमारे स्तोत्रो का श्रवण कर आप यहाँ आएँ। प्यासे गौर मृग के सदृश व्याकुल मन से सोम के अभिषव स्थान के समीप आकर सोम का पान करें॥५॥

इमे सोमास इन्दवः सुतासो अधि बर्हिषि । ताँ इन्द्र सहसे पिब ॥६॥
हे इन्द्रदेव! यह दीप्तिमान् सोम निष्पादित होकर कुशाआसन पर सुशोभित है। शक्ति वर्धन के निमित्त आप इसका पान करें॥६॥

अयं ते स्तोमो अग्रियो हृदिस्पृगस्तु शंतमः। अथा सोमं सुतं पिब ॥७॥
हे इन्द्रदेव ! यह स्तोत्र श्रेष्ठ, मर्मस्पर्शी और अत्यन्य सुखकारी है। अब आप इसे सुनकर अभिषुत सोमरस का पान करें॥७॥

विश्वमित्सवनं सुतमिन्द्रो मदाय गच्छति। वृत्रहा सोमपीतये ॥८॥
सोम के सभी अभिषव स्थानो की ओर् इन्द्रदेव अवश्य जाते है। दुष्टो का हनन करने वाले इन्द्रदेव सोमरस पीकर अपना हर्ष बढाते है॥८॥

सेमं नः काममा पृण गोभिरश्वैः शतक्रतो। स्तवाम त्वा स्वाध्यः ॥९॥
हे शतकर्मा इन्द्रदेव! आप हमारी गौओ और अश्वो सम्बन्धी कामनाये पूर्ण करे। हम मनोयोग पूर्वक आपकी स्तुति करते है॥९॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त १७
[ऋषि-मेधातिथि काण्व। देवता-इन्द्रावरुण। छन्द-गायत्री।]

इन्द्रावरुणयोरहं सम्राजोरव आ वृणे । ता नो मृळात ईदृशे ॥१॥
हम इन्द्र और वरुण दोनो प्रतापी देवो से अपनी सुरक्षा की कामना करते हैं। वे दोनो हम पर इस प्रकार अनुकम्पा करें, जिससे कि हम सुखी रहें॥१॥

गन्तारा हि स्थोऽवसे हवं विप्रस्य मावतः । धर्तारा चर्षणीनाम् ॥२॥
हे इन्द्रदेव और वरुणदेवो! आप दोनो मनुष्यो के सम्राट, धारक एवं पोषक हैं। हम जैसे ब्राह्मणो के आवाहन पर सुरक्षा ले लिये आप निश्चय ही आने को उद्यत रहते हैं॥२॥

अनुकामं तर्पयेथामिन्द्रावरुण राय आ । ता वां नेदिष्ठमीमहे॥३॥
हे इन्द्रदेव और वरुणदेवो! हमारी कामनाओ के अनुरूप धन देकर हमें संतुष्ट करें। आप दोनो के समीप पहुचँकर हम प्रार्थना करते हैं॥३॥

युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम् । भूयाम वाजदाव्नाम् ॥४॥
हमारे कर्म संगठित हो, हमारी सद्‍बुद्धीयाँ संगठित हो, हम अग्रगण्य होकर दान करने वाले बनें॥४॥

इन्द्रः सहस्रदाव्नां वरुणः शंस्यानाम् । क्रतुर्भवत्युक्थ्यः॥५॥
इन्द्रदेव सहस्त्रो दाताओ मे सर्वश्रेष्ठ है और् वरुणदेव सहस्त्रो प्रशंसनीय देवो मे सर्वश्रेष्ठ हैं॥५॥

तयोरिदवसा वयं सनेम नि च धीमहि । स्यादुत प्ररेचनम्॥६॥
आपके द्वारा सुरक्षित धन को प्राप्त कर हम उसका श्रेष्ठतम उपयोग करें। वह धन हमे विपुल मात्रा मे प्राप्त हो॥‍६॥

इन्द्रावरुण वामहं हुवे चित्राय राधसे । अस्मान्सु जिग्युषस्कृतम्॥७॥
हे इन्द्रावरुण देवो! विविध प्रकार के धन की कामना से हम आपका आवाहन करते है। आप हमे उत्तम विजय प्राप्त कराएँ॥७॥

इन्द्रावरुण नू नु वां सिषासन्तीषु धीष्वा । अस्मभ्यं शर्म यच्छतम्॥८॥
हे इन्द्रावरुण देवो! हमारी बुद्धियाँ सम्यक् रूप से आपकी सेवा करने की इच्छा करती है, अतः हमे शीघ्र ही निश्‍चयपूर्वक सुख प्रदान करें॥८॥

प्रवामश्नोतु सुष्टुतिरिन्द्रावरुण यां हुवे । यामृधाथे सधस्तुतिम्॥९॥
हे इन्द्रावरुण देवो! जिन उत्तम स्तुतियों के लिये हम आप दोनो का आवाहन करते हैं एवं जिन स्तुतियो को साथ साथ प्राप्त करके आप दोनो पुष्ट होते हैं, वे स्तुतियाँ आपको प्राप्त हों॥९॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त १८
[ऋषि-मेधातिथी काण्व। देवता- १-३ ब्रह्मणस्पति, ४ इन्द्र,ब्रह्मणस्पति,सोम ५-ब्रह्मणस्पति,दक्षिणा, ६-८ सदसस्पति,९,नराशंस। छन्द -गायत्री]

सोमानं स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं य औशिजः ॥१॥
हे सम्पूर्ण ज्ञान के अधिपति ब्रह्मणस्पति देव! सोम का सेवन करने वाले यजमान को आप उशिज् के पुत्र कक्षीवान की तरह श्रेष्ठ प्रकाश से युक्त करें॥१॥

यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः ॥२॥
ऐश्वर्यवान, रोगो का नाश करने वाले,धन प्रदाता और् पुष्टिवर्धक तथा जो शीघ्रफलदायक है, वे ब्रह्मणस्पति देव हम पर कृपा करें॥२॥

मा नः शंसो अररुषो धूर्तिः प्रणङ्मर्त्यस्य । रक्षा णो ब्रह्मणस्पते ॥३॥
हे ब्रह्मणस्पति देव! यज्ञ न करनेवाले तथा अनिष्ट चिन्तन करनेवाले दुष्ट शत्रु का हिंसक, दुष्ट प्रभाव हम पर न पड़े। आप हमारी रक्षा करें॥३॥

स घा वीरो न रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः । सोमो हिनोति मर्त्यम् ॥४॥
जिस मनुष्य को इन्द्रदेव,ब्रह्मणस्पतिदेव और सोमदेव प्रेरित करते है, वह वीर कभी नष्ट नही होता॥४॥
[इन्द्र से संगठन की, ब्रह्मणस्पतिदेव से श्रेष्ठ मार्गदर्शन की एव सोम से पोषण की प्राप्ति होती है। इनसे युक्त मनुष्य क्षीण नही होता। ये तीनो देव यज्ञ मे एकत्रित होते हैं। यज्ञ से प्रेरित मनुष्य दुःखी नही होता वरन् देवत्व प्राप्त करता है।

त्वं तं ब्रह्मणस्पते सोम इन्द्रश्च मर्त्यम् । दक्षिणा पात्वंहसः॥५॥
हे ब्रह्मणस्पतिदेव। आप सोमदेव, इन्द्रदेव और दक्षिणादेवी के साथ मिलकर् यज्ञादि अनुष्ठान करने वाले मनुष्य़ की पापो से रक्षा करें॥५॥

सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषम् ॥६॥
इन्द्रदेव के प्रिय मित्र, अभीष्ट पदार्थो को देने मे समर्थ, लोको का मर्म समझने मे सक्षम सदसस्पतिदेव (सत्प्रवृत्तियो के स्वामी) से हम अद्‍भूत मेधा प्राप्त करना चाहते है॥६॥

यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन । स धीनां योगमिन्वति ॥७॥
जिनकी कृपा के बिना ज्ञानी का भी यज्ञ पूर्ण नही होता, वे सदसस्पतिदेव हमारी बुद्धि को उत्तम प्रेरणाओ से युक्त करते है॥७॥
[सदाशयता जिनमे नही, ऐसे विद्वानो द्वारा यज्ञीय प्रयोजनो की पूर्ति नही होती।]

आदृध्नोति हविष्कृतिं प्राञ्चं कृणोत्यध्वरम् । होत्रा देवेषु गच्छति॥८॥
वे सदसस्पतिदेव हविष्यान्न तैयार करने वाले साधको तथा यज्ञ को प्रवृद्ध करते है और वे ही हमारी स्तुतियों को देवो तक पहुंचाते हौ॥८॥

नराशंसं सुधृष्टममपश्यं सप्रथस्तमम् । दिवो न सद्ममखसम् ॥९॥
द्युलोक से सदृश अतिदीप्तिमान्, तेजवान,यशस्वी और् मनुष्यो द्वारा प्रशंसित वे सदसस्पतिदेव को हमने देखा है॥९॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त १९
[ऋषि-मेधातिथि काण्व। देवता- अग्नि और मरुद्‍गण। छन्द -गायत्री]

प्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीथाय प्र हूयसे । मरुद्भिरग्न आ गहि॥१॥
हे अग्निदेव! श्रेष्ठ यज्ञो की गरिमा के संरक्षण के लिये हम आपका आवाहन करते हैं, आपको मरुतो के साथ आमंत्रित करते हौ, अतः देवताओ के इस यज्ञ मे आप पधारे॥१॥

नहि देवो न मर्त्यो महस्तव क्रतुं परः । मरुद्भिरग्न आ गहि॥२॥
हे अग्निदेव! ऐसा न कोइ देव है, न ही कोई मनुष्य, जो आपके द्वारा सम्पादित महान् कर्म को कर सके। ऐसे समर्थ आप मरुद्‍गणो से साथ आप इस यज्ञ मे पधारे॥२॥

ये महो रजसो विदुर्विश्वे देवासो अद्रुहः । मरुद्भिरग्न आ गहि॥३॥
जो मरुद्‍गण पृथ्वी पर श्रेष्ठ जल वृष्टि की विधि जानते है या क्षमता से सम्पन्न है। हे अग्निदेव आप उन द्रोह रहित मरुद्‍गणो के साथ इस यज्ञ मे पधारें॥३॥

य उग्रा अर्कमानृचुरनाधृष्टास ओजसा । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥४॥
हे अग्निदेव! जो अतिबलशाली, अजेय और अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य के सदृश प्रकाशक है। आप उन मरुद्‍गणो के साथ यहाँ पधारें॥४॥

ये शुभ्रा घोरवर्पसः सुक्षत्रासो रिशादसः । मरुद्भिरग्न आ गहि॥५॥
जो शुभ्र तेजो से युक्त तीक्ष्ण,वेधक रूप वाले, श्रेष्ठ बल-सम्पन्न और शत्रु का संहार करने वाले है। हे अग्निदेव! आप उन मरुतो के साथ यहाँ पधारें॥५॥

ये नाकस्याधि रोचने दिवि देवास आसते । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥६॥
हे अग्निदेव! ये जो मरुद्‍गण सबके उपर अधिष्ठित,प्रकाशक,द्युलोक के निवासी है, आप उन मरुदगणो के साथ पधारें॥७॥

य ईङ्खयन्ति पर्वतान्तिरः समुद्रमर्णवम् । मरुद्भिरग्न आ गहि॥७॥
हे अग्निदेव! जो पर्वत सदृश विशाल मेघो को एक स्थान से दूसरे सुदूरस्थ दूसरे स्थान पर ले जाते हैं तथा जो शान्त समुद्रो मे भी ज्वार पैदा कर देते है(हलचल पैदा कर देते है), ऐसे उन मरुद्‍गणो ले साथ आप इस यज्ञ मे पधारे॥७॥

आ ये तन्वन्ति रश्मिभिस्तिरः समुद्रमोजसा । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥८॥
हे अग्निदेव! जो सूर्य की रश्मियो के साथ सर्व व्याप्त होकर समुद्र को अपने ओज से प्रभावित करते हैं उन मरुतो के साथ आप यहाँ पधारें॥८॥

अभि त्वा पूर्वपीतये सृजामि सोम्यं मधु । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥९॥
हे अग्निदेव! सर्वप्रथम आपके सेवनार्थ यह मधुर सोमरस हम अर्पित करते हैं, अतः आप मरउतो के साथ यहाँ पधारें॥९॥

ऋग्वेद-संहिता – प्रथम मंडल सूक्त २०
[ऋषि-मेधातिथि काण्व। देवता- ऋभुगण। छन्द -गायत्री]

अयं देवाय जन्मने स्तोमो विप्रेभिरासया । अकारि रत्नधातमः॥१॥
ऋभुदेवो के निमित्त ज्ञानियो ने अपने मुख से इन रमणीय स्तोत्रो की रचना की तथा उनका पाठ किया॥१॥

य इन्द्राय वचोयुजा ततक्षुर्मनसा हरी । शमीभिर्यज्ञमाशत ॥२॥
जिन ऋभुदेवो ने अतिकुशलतापूर्वक इन्द्रदेव के लिये वचन मात्र से नियोजित होकर चलनेवाले अश्‍वो की रचना की, ये शमी आदि यज्ञ (यज्ञ पात्र अथवा पाप शमन करने वाले देवों) के साथ यज्ञ मे सुशोभित होते हैं॥२॥
[चमस एक प्रकार के पात्र का नाम है, जिसे भी देव भाव से सम्बोधित् किया गया है।]

तक्षन्नासत्याभ्यां परिज्मानं सुखं रथम् । तक्षन्धेनुं सबर्दुघाम्॥३॥
जिन ऋभुदेवो ने अश्‍विनीकुमारो के लिये अति सुखप्रद सर्वत्र गमनशील रथ का निर्माण किया और गौओ को उत्तम दूध देने वाली बनाया॥३॥

युवाना पितरा पुनः सत्यमन्त्रा ऋजूयवः । ऋभवो विष्ट्यक्रत ॥४॥
अमोघ मन्त्र सामर्थ्य से युक्त, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले ऋभुदेवो ने मातापिता मे स्नेहभाव संचरित कर उन्हे पुनः जवान बनाया॥४॥
[यहाँ जरावस्था दूर करने की मन्त्र विद्या का संकेत है।]

सं वो मदासो अग्मतेन्द्रेण च मरुत्वता । आदित्येभिश्च राजभिः॥५॥
हे ऋभुदेवो! यह हर्षप्रद सोमरस इन्द्रदेव, मरुतो और दीप्तिमान् आदित्यो के साथ आपको अर्पित किया जाता है॥५॥

उत त्यं चमसं नवं त्वष्टुर्देवस्य निष्कृतम् । अकर्त चतुरः पुनः ॥६॥
त्वष्टादेव के द्वारा एक ही चमस तैयार किया गया था, ऋभुदेवो ने उसे चार प्रकार का बनाकर प्रयुक्त किया॥६॥

ते नो रत्नानि धत्तन त्रिरा साप्तानि सुन्वते । एकमेकं सुशस्तिभिः ॥७॥
वे उत्तम स्तुतियो से प्रशंसित होने वाले ऋभुदेव! सोमयाग करने वाले प्रत्येक याजक को तीनो कोटि के सप्तरत्नो अर्थात इक्कीस प्रकार के रत्नो (विशिष्ट कर्मो) को प्रदान करें। (यज्ञ के तीन विभाग है – हविर्यज्ञ, पाकयज्ञ एवं सोमयज्ञ। तीनो के सात-सात प्रकार है। इस प्रकार यज्ञ के इक्कीस प्रकार कहे गये हैं।)।७॥

अधारयन्त वह्नयोऽभजन्त सुकृत्यया । भागं देवेषु यज्ञियम् ॥८॥
तेजस्वी ऋभुदेवो ने अपने उत्तम कर्मो से देवो के स्थान पर अधिष्ठित होकर यज्ञ के भाग को धारण कर् उसका सेवन किया॥८॥

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