ऋग्वेद

ऋग्वेद संहिता का सामान्य प्रचलित अभिधान ऋग्वेद है। यह प्राचीनतम तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसकी कई शाखाएं थी, परन्तु अब केवल एक शाखा उपलब्ध है। इसमें 1028 सूक्त है, जो दस मंडलों मे विभाजित है।

इस सूक्त संग्रह में प्राचीनतम भारतीय साहित्य संगृहित है। यह तथ्य इन सूक्तोां की भाषा से निर्विवाद रूप से प्रमाणित है। परन्तु इन सूक्तों की भाषा से यह भी सिद्ध होता है कि यह संग्रह एकरस रचना नहीं हैं, इसमें भी पुराने नये सूक्त हैं। जैसे कि ‘हिब्रु – गीत – पुस्तक’ मे हुआ, वेद मे भी विभिन्न समयों में लिखे गये सूक्त हैं। इन सूक्तों का सम्बन्ध प्रागैतिहासिक काल के प्रसिद्ध व्यक्तियों से स्थापित कर दिया गया। प्रायः ऎसा हुआ कि जो सूक्त जिस परिवार में चल रहा था। उसके किसी पूर्वज को ऋषि के रूप्; मे उल्लिखित कर दिया गया। अधिकांश प्राचीनतम सूक्त द्वितीय से सप्तम मण्डल में है।

इन्हें प्रायः ‘परिवार -मण्ड कहते है। क्योकि इन्में से प्रत्येक मण्डल ऋषियों के किसी परिवार विशेष से सम्बद्ध है। भारतीय परम्परा के अनुसार ऋषि वे है, जिन्होने मन्त्रों का साक्षात्कार किया। इन्में से कुछ ऋषियों के नाम ब्राह्मणग्रन्थों में भी उपलब्ध होते हैं। अनुक्रमणियों में इन्की पूरी सूची है। परिवार – मण्डलों के ऋषि हैं – गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भरद्वाज तथा वसिष्ठ। ये तथा इन्के वंशज भारतीयों के द्वारा द्वितीय से सप्तम मण्डलों के ऋषि (पाश्चात्यों के मत मे लेखक) माने जाते हैं। अष्टम मण्डल के ऋषि कण्व तथा अन्गिरस स्तोतृ वर्ग के है। अनुक्रमणियों मे शेष मंडलों (1,9,10) के प्रत्येक सूक्त के ऋषि अथवा लेखक का नाम है। यह अवधेय है कि इनमें स्त्री ऋषि(ऋषिकाएं) भी हैं।

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