कठोपनिषद

१. शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं कर वावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु।
मा विद्विषावहै। ॐ शांति: शांति: शांति:

२. सम्बन्ध भाष्य

३. वाजश्रवस का दान
प्रसिद्द है कि यग्य फल के इच्छुक वाजश्रवा के पुत्र ने अपना सारा धन दे दिया। उसका नचिकेता नामक एक प्रसिद्द पुत्र था।

जिस समय दक्षिणाएं ले जायी जा रही थीं, उसमें – यद्यपि अभी वह कुमार ही था – श्रद्धा का आवेश हुआ। वह सोचने लगा।

४. नचिकेता की शंका
जो जल पी चुकी हैं, जिनका घास खाना समाप्त हो चूका है, जिनका दूध दुह लिया गया है और जिनमें प्रजनन शक्ति का भी आभाव हो गया है उन गौओं का दान करने से वह दाता, जो अनंद लोक है उन्हीं को जाता है।

५. पिता-पुत्र-संवाद
तब वह अपने पिता से बोला- ‘हे पिता! आप मुझे किसको देंगे?’ इसी प्रकार उसने दुबारा – तिबारा भी कहा। तब पिता ने उससे ‘मैं तुझे मृत्यु को दूंगा’ ऐसा कहा।

मैं बहुत-से (शिष्य या पुत्रों) में तो प्रथम चलता हूँ और बहुतों के माध्यम जाता हूँ। यम का ऐसा क्या कार्य है जिसे पिता आज मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे।

जिस प्रकार पूर्व पुरुष व्यव्हार करते थे उसका विचार कीजिये तथा जैसे वर्तमान कालीन अन्य लोग प्रवृत्त होते हैं उसे भी देखिये। मनुष्य खेती की तरह पकता है और खेती की भांति फिर उत्पन्न हो जाता है।

६. यमलोक में नचिकेता
ब्रह्मण -अतिथि होकर अग्नि ही घरों में प्रवेश करता है। उस अतिथि की यह शांति किया करते हैं। अतः हे वैवस्वत! जल ले जाईये।

जिसके घर में ब्रह्मण – अतिथि बिना भोजन किये रहता है उस मंद बुद्धि पुरुष की ज्ञात और अज्ञात वस्तुओं की प्राप्ति की इच्छाएं, उनके संयोग से प्राप्त होने वाले फल, प्रिय वाणी से होने वाले फल, यागादि इष्ट एवं उद्यानादि पूर्व कर्मों के फल तथा समस्त पुत्र और पशु आदि को वह नष्ट कर देता है।

७. यमराज का वर प्रदान
हे ब्राह्मण! तुहें नमस्कार हो; मेरा कल्याण हो। तुम नमस्कार योग्य अतिथि होकर भी मेरे घर में तीन रात्रि तक बिना भोजन किये रहे; अतः एक एक रात्रि के लिए एक-एक करके मुझसे तीन वर मांग लो।

८. प्रथम वर – पितृपरितोष
हे मृत्यो! जिससे मेरे पिता वाजश्रवस मेरे पिता वाजश्रवस मेरे प्रति शांतसंकल्प, प्रसन्नचित्त और क्रोधरहित हो जाएँ तथा आपके भेजने पर मुझे पहचान कर बातचीत करे- यह मैं तीन वारों में से पहला वर मांगता हूँ

मृत्यु ने कहा – ‘मुझसे प्रेरित होकर अरुण्पुत्र उद्दालक तुझे पूर्ववत पहचान लेगा। और शेष रात्रियों में सुखपूर्वक सोवेगा, क्योंकि तुझे मृत्यु के मुख से छूटकर आया हुआ देखेगा’।

९. स्वर्गस्वरूपप्रदर्शन
हे मृत्युदेव! स्वर्ग्लोग में कुछ भी भय नहीं है। वहा आपका भी वश नहीं चलता। वहां कोई वृद्दावस्था से भी नहीं डरता। स्वर्गलोक में पुरुष भूख-प्यास-दोनों को पार करके शोक से ऊपर उठ कर आनंद मानता है।

१०. द्वितीय वर- स्वर्गसाधनभूत अग्निविद्या
हे नाचिकेत:! उस स्वर्ग पद अग्नि को अच्छी तरह जानने वाला मैं तेरे प्रति उसका उपदेश करता हूँ। तू उसे मुझसे अच्छी तरह समझ ले। इसे तू अनंत लोक को प्राप्ति कराने वाला, उसका आधार और बुद्धिरूपी गुहा में स्थित जान।

तब यमराज ने लोकों के आदि कारण भूत उस अग्नि का तथा उसके चयन करने में जैसी और जितनी ईटें होती है, एवं जिस प्रकार उसका च्चायण किया जाता है उन सबका नचिकेता के प्रति वर्णन किया। और उस नचिकेता ने भी जैसा उससे कहा गया था वह सब सुना दिया। इससे प्रसन्न होकर मृत्यु फिर बोला।

महात्मा यम ने प्रसन्न होकर उससे कहा – ‘अब मैं तुझे एक वर और भी देता हूँ। यह अग्नि तेरे ही नाम से प्रसिद्द होगा और तू इस अनेक रूप वाली माला को ग्रहण कर।

११. नाचिकेत अग्निचयन का फल
त्रिणाचिकेत अग्नि का तीन बार चयन करने वाला मनुष्य (माता, पिता और आचार्य इन) तीनों से सम्बन्ध को प्राप्त होकर जन्म और मृत्यु को पार कर जाता है। तथा ब्रह्म से उत्पन्न हुए,ज्ञानवान और स्तुतियोग्य देव को जानकर और उसे अनुभव क्र इस अत्यंत शांति को प्राप्त हो जाता है।

जो त्रिणाचिकेत विद्वान् अग्नि के इस त्रय को (यानि कौन ईटें हों, कितनी संख्या में हों और किस प्रकार अग्नि चयन किया जाये – इसको) जानकार नाचिकेत अग्नि का चयन करता है वह देह्पात से पूर्व ही मृत्यु के बन्धनों को तोड़कर शोक से पार हो स्वर्गलोक में आनंदित होता है।

हे नाचिकेत! तुने द्वितीय वर से जिसे वरन किया था वह यह स्वर्ग का साधन भूत अग्नि तुझे बतला दिया। लोग इस अग्नि को तेरा ही कहेंगे। हे नाचिकेत! तू तीसरा वर मांग ले।

१२. तृतीय वर – आत्मरहस्य
मरे हुए मनुष्य के विषय में जो यह संदेह है कि कोई तो कहते हैं ‘रहता है’ और कोई कहता है ‘नहीं रहता’ आपसे शिक्षित हुआ मैं इसे जान सकूँ। मेरे वरों में यह तीसरा वर है।

पूर्वकाल में इस विषय में देवताओं को भी संदेह हुआ था, क्योकि यह सूक्षम धर्म सुगमता से जानने वाला नहीं है। हे नाचिकेत! तू दूसरा वर मांग ले, मुझे न रोक। तू मेरे लिए यह वर छोड़ दे।

१३. नचिकेता की स्थिरता
(नचिकेता ने कहा) हे मृत्यो! इस विषय में निश्चय ही देवताओं को भी संदेह हुआ था तथा इसे आप भी सुगमता से जाने योग्य नहीं बतलाते। तथा इस धर्म का वक्ता भी आपके समान अन्य कोई नहीं मिल सकता और न इसके समान कोई दूसरा वर ही है।

१४. यमराज का प्रलोभन
हे नाचिकेत! तू सौ साल की आयु वाले बेटे-पोते, बहत से पशु, हाथी, सुवर्ण और घोड़े मांग ले, विशाल भूमंडल भी मांग ले तथा स्वयं भी जितने वर्ष इच्छा हो जीवित रह।

इसी के समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे, अथवा धन और चिरस्थायिनी जीविका मांग ले। हे नाचिकेत! इस विस्तृत भूमि में तू वृद्धि को प्राप्त हो। मैं तुझे कामनाओं को इच्छानुसार भोगने वाला किये देता हूँ।

मनुष्यलोक में जो – २ भोग दुर्लभ हैं उन सब भोगों को तू स्वच्छन्दतापूर्वक मांग ले। यहं रथ और बाजों के सहित ये रमणियां है। ऐसी स्त्रियाँ मनुष्यों को प्राप्त होने योग्य नहीं होती। मेरे द्वारा दी हुई इन कामिनियों से तू अपनी सेवा करा। परन्तु हे नाचिकेत! तू मरण संबंधी प्रश्न मत पूछ।

१५. नचिकेता की निरीहता
हे यमराज! ये भोग ‘कल रहेंगे या नहीं’- इस प्रकार के हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियों के तेज जो जीर्ण कर देते है। यह सारा जीवन भी बहुत थोडा है। आपके वाहन और नाच-गाने आपके ही पास रहें।

मनुष्य को धन से तृप्त नहीं किया जा सकता। अब यदि आपको देख लिया है तो धन तो हम पा ही लेंगे। जब तक आप शासन करेंगे हम जीवित रहेंगे; किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो यही है।

कभी जराग्रस्त न होने वाले अमरों के समीप पहुंचकर नीचे पृथ्वी पर रहने वाला कौन जराग्रस्त विवेकी मानुष होगा जो केवल शारीरिक वर्ण के राग से प्राप्त होने वाले सुखों को देखता हुआ भी अति दीर्घ जीवन में सुख मानेगा?

हे मृत्यो! जिस के सम्बन्ध में लोग ‘हैं या नहीं है’ ऐसा संदेह करते है तथा जो महँ परलोक के विषय में है वह हमसे कहिये। यह जो गहनता में अनुप्रविष्ट हुआ वर है इससे अन्य और कोई वर नचिकेता नहीं मांगता।

16. श्रेय-प्रेयविवेक
श्रेय और है तथा प्रेय और ही है। वे दोनों विभिन्न प्रयोजन वाले होते हुए ही पुरुष को बांधते हैं। उन दोनों में से श्रेय को ग्रहण करने वाले का शुभ होता है और जो प्रेय को वरण करता है वह पुरुषार्थ से पतित होता है।

श्रेय और प्रेय मनुष्य के पास आते है। उन दोनों को बुद्धिमान पुरुष भली प्रकार विचार कर अलग-अलग करता है। विवेकी पुरुष प्रेय के सामने श्रेय को ही वरण करता है; किन्तु मूढ़ योग-क्षेम के निमित्त से प्रेय को वरण करता है।

हे नाचिकेत! उस तुने पुत्र-वित्तादि प्रिय और अप्सरा आदि प्रिय रूप भोगों को, उनका असारत्व चिंतन करके त्याग दिया है और जिसमें बहुत-से मनुष्य डूब जाते हैं, उस इस धनप्राया निन्दित गति को तू प्राप्त नहीं हुआ।

जो विद्या और अविद्यारूप से जानी गयी है वे दोनों अत्यंत विरुद्ध स्वभाववाली और विपरीत फल देने वाली है। मैं तुझ नाचिकेता को विद्याभिलासी मानता हूँ, क्योंकि तुझे बहुत-से भोगों ने नहीं लुभाया।

17. अविद्याग्रस्तों की दुर्दशा
वे अविद्या के भीतर रहने वाले, अपने-आप बड़े बुद्धिमान बने हुए और अपने को पंडित मानने वाले मूढ़ पुरुष, अँधेरे से ही ले जाये जाते हुए अंधे के समान अनेकों कुटिल गतियों की इच्छा करते हुए भटकते रहते हैं।

धन के मोह से अंधे हुए और प्रमाद करने वाले उस मुर्ख को परलोक का साधन नहीं सूझता। यह लोक है, परलोक नहीं है– ऐसा मानने वाले पुरुष बारम्बार मेरे वश को प्राप्त होते हैं।

18. आत्मज्ञान की दुर्लभता
जो बहुतों को तो सुनने के लिए भी प्राप्त होने योग्य नहीं है, जिसे बहुत से सुनकर भी नहीं समझते उस आत्मतत्त्व का निरूपण करने वाला भी आश्चर्यरूप है, उसको प्राप्त करने वाला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल आचार्य द्वारा उपदेश किया हुआ ज्ञाता भी आश्चर्यरूप है।

कईं प्रकार से कल्पना किया हुआ यह आत्मा नीच पुरुष द्वारा कहे जाने पर अच्छी तरह नहीं जाना जा सकता। अभेद्दर्शी आचार्य द्वारा उपदेश किये गए इस आत्मा में कोई गति नहीं है, क्योंकि यह सूक्षम परिमाण वालों से भी सूक्षम और दुर्विज्ञेय है।

हे प्रियतम! सम्यक ज्ञान के लिए शुष्क तार्किक से भिन्न शास्त्रज्ञ आचार्य द्वारा कही हुयी यह बुद्धि, जिसे कि तू प्राप्त हुआ है, तर्क द्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है। अहा! तू बड़ा ही सत्य धारणा वाला है। हे नाचिकेत! हमें तेर समान प्रश्न करने वाला प्राप्त हो।

19. कर्मफल की अनित्यता
मैं यह जनता हूँ कि कर्मफल रूप निधि अनित्य है, क्योंकि अनित्य साधनों द्वारा वह नित्य (आत्मा) प्राप्त नहीं किया जा सकता। तब मेरे द्वारा नाचिकेत अग्नि का चयन किया गया। उन अनित्य पदार्थों से ही मैं नित्य को प्राप्त हुआ हूँ।

20. नाचिकेता के त्याग की प्रशंसा
हे नाचिकेत! तुने बुद्धिमान होकर भोगों की समाप्ति, जगत की प्रतिष्ठा, यज्ञ फल के अनंतत्व, अभय की मर्यादा, स्तुत्य और महती विस्तीर्ण गति तथा प्रतिष्ठा को देख कर भी उसे धैर्यपूर्वक त्याग दिया है।

21. आत्मज्ञान का फल
उस कठिनता से दिख पड़ने वाले, गूढ़ स्थान में अनुप्रविश, बुद्धि में स्थित, गहन स्थान में रहने वाले, पुरातन देव को अध्यात्म योग की प्राप्ति द्वारा जानकार धीर पुरुष हर्ष-शोक को त्याग देता है।

मनुष्य इस आत्मतत्त्व को सुनकर और उसे भली प्रकार ग्रहण कर धर्मी आत्मा को देहादी संघात पृथक करके इस सूक्षम आत्मा को पाकर तथा इस मोदनीय की उपलब्धि कर अति आनंदित हो जाता है। मैं नाचिकेता को ल्हुले हुए ब्रह्मभवन वाला समझता हूँ, मेरे विचार से तेरे लिए मोक्ष का द्वार खुला हुआ है।

22. सर्वातीत वस्तुविषयक प्रश्न
जो धर्म पृथक, अधर्म से पृथक तथा इस कार्यकारण रूप प्रपंच से भी पृथक है और जो भूत एवं भविष्यत् से भी अन्य है – ऐसा आप जिसे देखते है वही मुझसे कहिये।

23. ओंकारोपदेश
सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तापों को जिसकी प्राप्ति के साधक कहतें हैं, जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ।

यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही पर है, इस अक्षर को ही जानकार जो जिसकी इच्छा करता है, वही उसका हो जाता है।

यही श्रेष्ठ आलंबन है, यही पर आलंबन है। इस आलंबन को जानकार पुरुष ब्रह्मलोक में महिमान्वित होता है।

24. आत्मस्वरूप निरूपण
यह विपश्चित- मेधावी आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है; यह न तो किसी अन्य कारण से ही उत्पन्न हुआ है और न स्वतः ही कुछ बना है। यह अजन्मा, नित्य शाश्वत और पुरातन है तथा शरीर के मारे जाने पर भी स्वयं नहीं मरता।

यदि मारनेवाला आत्मा को मारने का विचार करता है और मारा जाने वाला उसे मारा हुआ समझता है तो दोनों ही उसे नहीं जानते, क्योंकि यह न तो मारता है और न मारा जाता है।

यह अणु से भी अणु और महान से भी महान आत्मा जीव की हृदयरूप गुहा में स्थित है। निष्काम पुरुष अपनी इन्द्रियों के प्रसाद से आत्मा की उस महिमा को देखता है और शोक रहित हो जाता है।

वह स्थित हुआ भी दूर तक जाता है, शयन करता हुआ भी सब और पहुँचता है। मद से युक्त और मद से रहित उस देव को भला मेरे सिवा और कौन जान सकता है?

जो शरीर में शरीररहित तथा अनित्यों में नित्यस्वरूप है उस महान और सर्वव्यापक आत्मा को जानकार बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता।

25. आत्मा आत्मकृसाध्य है
यह आत्मा वेदाध्ययन द्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है और न धारणाशक्ति अथवा अधिक श्रवण से ही प्राप्त हो सकता है। यह जिस का वरण करता है, उस से ही यह प्राप्त किया जा सकता है। उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूप को अभिव्यक्त कर देता है।

26. आत्मज्ञान का अनधिकारी
जो पाप कर्मों से निवृत नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियां शांत नहीं है और जिसका चित्त असमहित या अशांत है वह इसे आत्मज्ञान द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता है।

जिस आत्मा के ब्राह्मण और क्षत्रिय – ये दोनों ओदन – भात है तथा मृत्यु जिसका उपसेचन है वह जहाँ है उसे कौन इस प्रकार जान सकता है।

27. प्राप्ता और प्राप्तव्य – भेद से दो आत्मा
ब्रह्मवेत्ता लोग कहते है कि शरीर में बुद्धिरूप गुहा के भीतर प्रकृष्ट ब्रह्मस्थान में प्रविष्ट हुए अपने कर्म फल को भोगने वाले छाया और घाम के समान परस्पर विलक्षण दो है। यही बात जिन्होंने तीन बार नचिकेताग्नि का चयन किया है वे पंचाग्नि की उपासना करने वाले भी कहते हैं।

जो यजन करने वाले के लिए सेतु के समान है उस नाचिकेत अग्नि को तथा जो भयशून्य है और संसार को पार करने की इच्छा वालों का परम आश्रय है उस अक्षर ब्रह्म को जानने में हम समर्थ हों।

28. शरीरादि से संबंधित रथादी रूपक
तू आत्मा को रथी जान, शरीर को रथ समझ, बुद्धि को सारथि जान और मन को लगाम समझ।

विवेकी पुरुष इन्द्रियों को घोड़े बतलाते हैं तथा उनके घोड़े रूप से कल्पना किये जाने पर विषयों को उनके मार्ग बतलाते है और शरीर, इन्द्रियां एवं मन से युक्त आत्मा को भोक्ता कहते हैं।

29. अविवेकी की विवशता
किन्तु जो सर्वदा अविवेकी एवं असंयत चित्त से युक्त होता है उसके अधीन इन्द्रियां इसी प्रकार नहीं रहती जैसे सारथि के अधीन दुष्ट घोड़े।

30. विवेकी की स्वाधीनता
परन्तु जो कुशल और सर्वदा समाहित चित्त रहता है उसके अधीन इन्द्रियां इस प्रकार रहती है जैसे सारथि के अधीन अच्छे घोड़े।

31. अविवेकी की संसारप्राप्ति
किन्तु तो अविज्ञानवान, अनिगृहीतचित्त और सदा अपवित्र रहने वाला होता है वह उस पद को प्राप्त नहीं कर सकता, प्रत्युत संसार को ही प्राप्त होता है।

32. विवेकी की परमप्राप्ति
किन्तु जो विज्ञानवान, संयत चित्त और सदा पवित्र रहने वाला होता है वह उस पद को प्राप्त कर लेता है जहाँ से वह फिर उत्पन्न नहीं होता।

जो मनुष्य विवेक युक्त बुद्धि-सारथि से युक्त और मन को वश में रखने वाला होता है वह संसार मार्ग से पार होकर उस विष्णु के परमपद को प्राप्त कर लेता है।

33. इन्द्रियादि का तारतम्य
इन्द्रियों की अपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयों से मन उत्कृष्ट है, मन से बुद्धि पर है और बुद्धि से भी महान आत्मा उत्कृष्ट है।

महत्तत्त्व से अव्यक्त पर है और अव्यक्त से भी पुरुष पर है। पुरुष से पर और कुछ नहीं है। वही पराकाष्ठा है, वही परा गति है।

34. आत्मा सूक्षमबुद्धिग्राह्य है
सम्पूर्ण भूतों में छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमान नहीं होता। यह तो सूक्षमदर्शी पुरुषों द्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धि से ही देखा जाता है।

35. लयचिंतन
विवेकी पुरुष वाक्-इन्द्रिय का मन में उपसंहार करे, उसका प्रकाश स्वरूप बुद्धि में लय करे, बुद्धि को महत्तत्त्व में लीन करे और महत्तत्त्वको शांत आत्मा में नियुक्त करे।

36. उद्बोधन
उठो, जागो, और श्रेष्ठ पुरुषों के समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करो। जिस प्रकार छुरे की धार तीक्षण और दुस्तर होती है, तत्त्वज्ञानी लोग उस मार्ग को वैसा ही दुर्गम बतलाते है।

37. निर्विशेष आत्मज्ञान से अमृतत्वप्राप्ति
जो शब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय तथा रसहीन, नित्य और गंधरहित है; जो अनादी, अनंत, महत्तत्त्व से भी पर और ध्रुव है उस आत्म तत्त्व को जानकार पुरुष मृत्यु के मुख से छूट जाता है।

38. प्रस्तुत विज्ञानं की महिमा
नचिकेता द्वारा प्राप्त तथा मृत्यु के कहे हुए इस सनातन विज्ञानं को कह और सुनकर बुद्धिमान पुरुष ब्रह्मलोक में महिमान्वित होता है।

जो पुरुष इस परमगुह्य ग्रन्थ को पवित्रतापूर्वक ब्राह्मणों की सभा में अथवा श्राद्धकाल में सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनंत फलवाला होता है, अनंत फलवाला होता है

39. आत्मदर्शन का विघ्न – इन्द्रियों की बहिर्मुखता
स्वम्भू ने इन्द्रियों को बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है। इसी से जीव बाह्य विषयों को देखता है, अंतरात्मा को नहीं। जिसने अमरत्व की इच्छा करते हुए अपनी इन्द्रियों को रोक लिया है ऐसा कोई धीर पुरुष ही प्रत्यगात्मा को देख पाता है।

40. अविवेकी और विवेकी का अंतर
अल्पज्ञ पुरुष बाह्य भोगों के पीछे लगे रहते है। वे मृत्यु के सर्वत्र फैले हुए पाश में पड़ते हैं। किन्तु विवेकी पुरुष अमरत्व को ध्रुव जानकार संसार के अनित्य पदार्थों में से किसी की इच्छा नहीं करते।

41. आत्मज्ञ की सर्वज्ञता
जिस इस आत्मा के द्वारा मनुष्य रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श और मैथुनजन्य सुखों को निश्चयपूर्वक जानता है इस लोक में और क्या रह जाता है? वह तत्त्व निश्चय यही है।

42. आत्मज्ञ की नि:शोकता
जिसके द्वारा मनुष्य स्वप्न में प्रतीत होने वाले तथा जाग्रत में दिखाई देने वाले- दोनों प्रकार के पदार्थों को देखता है उस महान और विभु आत्मा को जानकर बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता।

43. आत्मज्ञ की निर्भयता
जो पुरुष इस कर्मफल भोक्ता और प्रनादी को धारण करने वाले आत्मा को उसके समीप रहकर भूत, भविष्यत् – के शासक रूप से जानता है वह वैसा विज्ञानं हो जाने के अनंतर उस की रक्षा करने के इच्छा नहीं करता। निश्चय यही वह(आत्मतत्त्व) है।

44. ब्रह्मज्ञ का सार्वात्म्य दर्शन
जो मुमुक्षु पहले तप से उत्पन्न हुए (हिरण्यगर्भ) को, जो कि जल आदि भूतों से पहले उत्पन्न हुआ है, भूतों के सहित बुद्धिरूप गुहा में स्थित हुआ देखता है वही उस ब्रह्म को देखता है। निश्चय यही ब्रह्म है।

जो देवतामयी अदिति प्राणरूप से प्रकट होती है तथा जो बुद्धिरूप गुहा में प्रविष्ट होकर रहनेवाली और भूतों के साथ ही उत्पन्न हुई है निश्चय यही वह तत्त्व है।

45. अर्णिस्थ अग्नि में ब्रह्मदृष्टि
गर्भिणी स्त्रियों द्वारा भली प्रकार पोषित हुए गर्भ के समान जो जातवेदा (अग्नि) दोनों अरणियों के बीच स्थित है तथा जो प्रमाद्शुन्य एवं होमसामग्री युक्त पुरुषों द्वारा नित्यप्रति स्तुति किये जाने योग्य है, यही वह ब्रह्म है।

46. प्राण में ब्रह्मदृष्टि
जहाँ से सूर्य उदित होता है और जहाँ से वह अस्त होता है उस प्रनात्मा में सम्पूर्ण देवता अर्पित हैं। उसका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता। यही वह ब्रह्म है।

47. भेददृष्टि की निंदा
जो तत्त्व इस में भासता है वही अन्यत्र भी है और जो अन्यत्र है वही इसमें है। जो मनुष्य इस तत्त्व में नानात्व देखता है वह मृत्यु को प्राप्त होता है।

मन से ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है। इस ब्रह्म तत्त्व में नाना कुछ भी नहीं है। जो पुरुष इसमें नानात्व-सा देखता है वह मृत्यु से मृत्यु को जाता है।

48. हृदयपूंडरीकस्थ ब्रह्म
जो अंगुष्ठ परिमाण पुरुष शरीर के मध्य में स्थित है, उसे भूत, भविष्यत् का शासन जानकर वह उस के कारण अपने शरीर की रक्षा करना नहीं चाहता; निश्चय यही वह (ब्रह्मतत्त्व) है।

यह अंगुष्ठ मात्र पुरुष धूम रहित ज्योति के समान है। यह भूत-भविष्यत् का शासक है। यही आज है और यही कल भी रहेगा। और निश्चय यही वह (ब्रह्मतत्त्व) है।

49. भेदावाद
जिस प्रकार ऊंचे स्थान में बरसा हुआ जल पर्वतों में बह जाता है उसी प्रकार आत्माओं को पृथक-पृथक देखकर जीव उन्हीं को प्राप्त होता है।

50. अभेददर्शन की कर्तव्यता
जिस प्रकार शुद्ध जल में डाला हुआ शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है उसी प्रकार, हे गौतम! विज्ञानी मुनि का आत्मा भी हो जाता है।

51. प्रकारांतर से ब्रह्मानुसंधान
उस नित्य विज्ञानं स्वरूप अजन्मा (आत्मा) का पुर ग्यारह दरवाजों वाला है। उस आत्मा का ध्यान करने पर मनुष्य शोक नहीं करता, और वह मुक्त हुआ ही मुक्त हो जाता है। निश्चय यही वह ब्रह्म है।

वह गमन करने वाला है, आकाश में चलने वाला सूर्य है, वसु है, अन्तरिक्ष में विचरने वाला सर्वव्यापक वायु है, वेदी में स्थित होता है, कलश में स्थित सोम है। इसी प्रकार वह मनुष्यों में गमन करने वाला, देवताओं में जाने वाला, सत्य या यज्ञ में गमन करने वाला, आकाश में जाने वाला, जल, पृथ्वी, यज्ञ और पर्वतों से उत्पन्न होने वाला तथा सत्य स्वरूप और महान है।

जो प्राण को ऊपर की ओर ले जाता है ओर अपान को नीचे की ओर ढकेलता है, हृदय के मध्य में रहने वाले उस वामन – भजनीय की सब देव उपासना करते हैं।

52. देहस्थ आत्मा ही जीवन है
इस शरीरस्थ देही के भ्रष्ट हो जाने पर – इस देह से मुक्त हो जाने पर भला इस शरीर में क्या रह जाता है? यही वह ब्रह्म है।

कोई भी मनुष्य न तो प्राण से जीवित रहता है ओर न अपान से ही। बल्कि वे तो, जिसमें ये दोनों आश्रित है ऐसे किसी अन्य से ही जीवित रहते हैं।

53. मरणोत्तर काल में जीव की गति
हे गौतम! अब मैं फिर भी तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्म का वर्णन करूँगा, तथा मरण को प्राप्त होने पर आत्मा जैसा हो जाता है।

अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार कितने ही देहधारी तो शरीर धारण करने के लिए किसी योनी के प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थावर-भाव को प्राप्त हो जाते है।

54. गुह्य ब्रह्मोपदेश
प्राणादि के सो जाने पर जो यह पुरुष अपने इच्छित पदार्थों की रचना करता हुआ जागता रहता है वही शुक्र है, वह ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है। उसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं; कोई भी उसका उलंघन नहीं कर सकता। निश्चय यही वह ब्रह्म है।

55. आत्मा का उपाधि प्रतिरूपत्व
जिस प्रकार सम्पूर्ण भुवन प्रविष्ट हुआ एक ही अग्नि प्रत्येक रूप के अनुरूप हो गया है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का एक ही अंतरात्मा उनके रूप के अनुरूप हो रहा है तथा उनसे बाहर भी है।

जिस प्रकार इस लोक में प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का एक ही अंतरात्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है।

56. आत्मा की असंगता
जिस प्रकार सम्पूर्ण लोक का नेत्र होकर भी सूर्य नेत्रसंबंधी बाह्य दोषों से लिप्त नहीं होता उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का एक ही अंतरात्मा संसार के दुःख से लिप्त नहीं होता, बल्कि उनसे बाहर रहता है।

57. आत्मदर्शी ही नित्य सुखी है
जो एक, सबको अपने अधीन रखने वाला और सम्पूर्ण भूतों का अंतरात्मा अपने एक रूप को ही अनेक प्रकार का कर लेता है, अपनी बुद्धि में स्थित उस आत्मदेव को जो धीर पुरुष देखते हैं उन्हीं को नित्यसुख प्राप्त हॉट है, औरों को नहीं।

जो अनित्य पदार्थों में नित्य स्वरूप तथा ब्रह्मा आदि चेतनों में चेतन है और जो अकेला ही अनेकों की कामनाएं पूर्ण करता है, अपनी बुद्धि में स्थित उस आत्मा को जो विवेकी पुरुष देखते हैं उन्हीं को नित्य शांति प्राप्त होती है, औरों को नहीं।

उसी इस को ही विवेकी पुरुष अनिर्वाच्य परम सुख मानते हैं। उसे मैं कैसे जान सकूँगा? क्या वह प्रकाशित होता है अथवा नहीं?

58. सर्व प्रकाशक का अप्रकाश्यत्व
वहां सूर्य प्रकाशित नहीं होता, चंद्रमा और तारे भी नहीं चमकते और न यह विद्युत् ही चमचमाती है; फिर इस अग्नि की तो बात ही क्या है? उसके प्रकाशमान होते हुए ही सब कुछ प्रकाशित होता है और उसके प्रकाश से ही यह सब कुछ भासता है।

59. संसार रूप अश्वत्थ वृक्ष
`जिसका मूल ऊपर की ओर तथा शाखाएं निचे की ओर हैं ऐसा यह अश्वत्थ वृक्ष सनातन है। वही विशुद्ध ज्योति-स्वरूप है, वही ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है। सम्पूर्ण लोक उसी में आश्रित है; कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। यही निश्चय वह है।

60. ईश्वर के ज्ञान से अमरत्व प्राप्ति
यह जो कुछ सारा जगत है प्राण- ब्रह्म में, उदित होकर उसी से, चेष्टा कर रहा है। वह ब्रह्म महान भयरूप और उठे हुए वज्र के समान है। जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं।

61. सर्व शासन प्रभु
इस के भय से अग्नि तपता है, इसी के भय से सूर्य तपता है तथा इसी के भय से इंद्र, वायु और पांचवा मृत्यु दौड़ता है।

62. ईश्वर ज्ञान के बिना पुनर्जन्म प्राप्ति
यदि इस देह में इसके पतन से पूर्व ही (ब्रह्म को) जान सका तो बंधन से मुक्त होता है यदि नहीं जान पाया तो इन जन्म-मरणशील लोकों में वह शरीर भाव को प्राप्त होने में समर्थ होता है।

63. स्थान भेद से भगव्द्दर्शन में तारतम्य
जिस प्रकार दर्पण में उसी प्रकार निर्मल बुद्धि में आत्मा का (स्पष्ट) दर्शन होता है तथा जैसा स्वप्न में वैसा ही पितृलोक में और जैसा जल में वैसा ही गन्धर्वलोक में उसका (अस्पष्ट) भान होता है; किन्तु ब्रह्मलोक में तो छाया और प्रकाश के समान वह (सर्वथा स्पष्ट) अनुभव होता है।

64. आत्मज्ञान का प्रकार और प्रयोजन
(पृथक-पृथक भूतों से उत्पन्न होने वाली) इन्द्रियों के जो विभिन्न भाव तथा उनकी उत्पत्ति और प्रलय हैं उन्हें जानकार बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता।

इन्द्रियों से मन पर (उत्कृष्ट) है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धि से महत्तत्व बढ़कर है तथा महत्तत्व बढ़कर है तथा महत्तत्व से अव्यक्त उत्तम है।

अव्यक्त से भी पुरुष श्रेष्ठ है और वह व्यापक अलिंग है; जिसे जानकर मनुष्य मुक्त होता है और अमरत्व को प्राप्त हो जाता है।

इस आत्मा का रूप दृष्टि में नहीं ठहरता। इसे नेत्र से कोई भी नहीं देख सकता। यह आत्मा का तो मन का नियमन करने वाली हृदयस्थिता बुद्धि द्वारा मननरूप सम्यग्दर्शन से प्रकाशित (हुआ ही जाना जा सकता है) जो इसे (ब्रह्म रूप से) जानते हैं वे अमर हो जाते हैं।

65. परमपदप्राप्ति
जिस समय पंचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन के (सहित आत्मा में) स्थित हो जाती है और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती उस अवस्था को परम गति कहते हैं।

उस स्थिर इन्द्रिय धारणा को ही योग कहते हैं। उस समय पुरुष प्रमादरहित हो जाता है, क्योंकि योग ही उत्पत्ति और नाशरूप है।

66. आत्मोपलब्धि का साधन सद्बुद्धि ही है
वह आत्मा न तो वाणी से, न मन से और न नेत्र से ही प्राप्त किया जा सकता है; वह ‘है’ ऐसा कहने वालों से अन्यत्र (भिन्न पुरुषों को) किस उपलब्ध हो सकता है।

वह आत्मा ‘है’ इस प्रकार ही किया जाना चाहिए तथा उसे तत्त्वभाव से भी जानना चाहिए। इन दोनों प्रकार की उपलब्धियों में से जिसे ‘है’ इस प्रकार की उपलब्धि हो गयी है तत्त्वभाव उसके अभिमुख हो जाता है।

67. अमर कब होता है?
जिस समय सम्पूर्ण कामनाएं, जोकि इसके ह्रदय में आश्रय करके रहती है, छूट जाती है उस समय वह मर्त्य (मरणधर्मा) अमर हो जाता है और इस शरीर से ही ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है।

जिस समय इस जीवन में ही इसके हृदय की सम्पूर्ण ग्रंधियों का छेदन हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमर हो जाता है। बस सम्पूर्ण वेदान्तों का इतना ही आदेश है।

इस हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ है; उनमें से एक मूर्धा का भेदन करके बाहर को निकली हुई है। उसके द्वारा ऊर्घ्व-ऊपर की और गमन करने वाला पुरुष अमरत्व को प्राप्त होता है। शेष विभिन्न गतियुक्त नाड़ियाँ उत्क्रमण (प्राणोत्सर्ग)-की हेतु होती है।

उपसंहार
अंगुष्ठमात्र पुरुष, जो अंतरात्मा है सर्वदा जीवों के हृदयदेश में स्थित है। मूंज से सींक के समान उसे धैर्यपूर्वक अपने शरीर से बहार निकाले (अर्थात शरीर से पृथक करके अनुभव करे) उसे शुक्र (शुद्ध) और अमृतरूप समझे, उसे शुक्र और अमृतरूप समझे।

मृत्यु की कही हुयी इस विद्या और सम्पूर्ण योग विधि को पाकर नचिकेता ब्रह्मभाव को प्राप्त, विराज (धर्माधर्मशुन्य) और मृत्युहीन हो गया। दूसरा भी जो कोई अध्यात्म-तत्त्व को इस प्रकार जानेगा वह भी वैसा ही हो जायेगा।

68. शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु, मा विद्विषावहै॥
ॐ शांतिः! शांतिः! शांति!
परमात्मा हम दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हमारा साथ-साथ पालन करें। हम साथ-साथ विद्यासम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें। हमारा अध्ययन किया हुआ तेजस्वी हो। हम द्वेष न करें।

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