कृष्णयजुर्वेदीयोपनिषद

कृष्ण यजुर्वेद के उपनिषद

तैत्तिरीयोपनिषद …………………………………………………………..

कृष्ण आयुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के तैत्तिरीय आरण्यक के सप्तम से नवं प्रपाठक को तैत्तिरीयोपनिषद कहते है। इसमें ३३ आध्याय है जिन्हें क्रमशः शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली एवं भृगुवल्ली कहते हैं। ये वल्लियाँ अनुवाकों में विभक्त हैं। इस उपनिषद में दिए गए मातृ देवो भवः, अतिथि देवो भवः इन उपदेशों का सार्वकालिक महत्त्व है। इसमें आचार्य द्वारा स्नातक को दिए गए उपदेश हैं तथा ब्रह्म को आनंद, सत्य ज्ञान एवं अनंत कहकर उससे आकाश, वायु, अग्नि, जल आदि की उत्पत्ति कही गयी है साथ ही ब्रह्म संबंधी जिज्ञासा का निरूपण है। शंकराचार्य ने इस पर भाष्य किया है।

कठोपनिषद ………………………………………………………………..

कृष्ण यजुर्वेद की कठशाखा से सम्बद्ध उपनिषद है। इसमें २ अध्याय हैं जो ३-३ वल्लियों में विभक्त हैं। इसमें नचिकेता की कथा है। यम द्वारा प्रदत्त उपदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुरुष को ज्ञान की परम सीमा माना गया है। आत्मा की व्यापकता तथा विविध रूपों में उसकी अभिव्यक्ति का निरूपण भी इस उपनिषद में प्राप्त होता है। इस उपनिषद पर भी शंकर भाष्य उपलब्ध है।

श्वेताश्वतरोपनिषद ………………………………………………………..

इस उपनिषद को परवर्ती माना जाता है। इसमें ६ अध्याय है, इनमें ब्रह्म की व्यापकता तथा उसके साक्षात्कार का उपाय वर्णित है। योग का भी इसमें विस्तृत वर्णन है। ईश्वर की स्तुति रूद्र के रूप में की गयी है। एकात्मक ब्रह्म की माया का वर्णन है जिसमें त्रिगुणात्मक सृष्टि होती है। इस उपनिषद में सांख्य दर्शन के मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन है।

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