ऐतरेयोपनिषद

प्रथम अध्याय

इस उपनिषद के प्रथम अध्याय में तीन खण्ड हैं

पहले खण्ड में सृष्टि का जन्म,
दूसरे खण्ड में मानव-शरीर की उत्पत्ति और
तीसरे खण्ड में उपास्य देवों की क्षुधा-तृप्ति के लिए अन्न के उत्पादन का वर्णन किया गया है।

प्रथम खण्ड / सृष्टि की उत्पत्ति
प्रथम खण्ड में ऋषि कहता है कि सृष्टि के आरम्भ में एकमात्र ‘आत्मा’ का विराट ज्योतिर्मय स्वरूप विद्यमान था। तब उस आत्मा ने विचार किया कि सृष्टि का सृजन किया जाये और विभिन्न लोक बनाये जायें तथा उनके लोकपाल निश्चित किये जायें। [1] ऐसा विचार कर आत्मा ने ‘अम्भ’, ‘मरीचि’, ‘मर’ और ‘आप:’ लोकों की रचना की।

द्युलोक से परे स्वर्ग की प्रतिष्ठा रखने वाले लोक को ‘अम्भ’ कहा गया।
मरीचि को अन्तरिक्ष, अर्थात प्रकाश लोक (द्युलोक) कहा गया,
पृथिवी लोक को मर, अर्थात मृत्युलोक नाम दिया गया,
पृथिवी के नीचे जलीय गर्भ को पाताललोक (आप:) कहा गया।

ॠग्वेद में आप: को सृष्टि के मूल क्रियाशील प्रवाह के रूप में व्यक्त किया है। वही हिरण्यगर्भ रूप है। इस हिरण्यगर्भ रूप में ब्रह्म का संकल्प बीज पककर विश्व-रूप बनता है। इसी हिरण्यगर्भ से विराट पुरुष एवं उसकी इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है और उसकी इन्द्रियों से देवताओं का सृजन होता है। यही जीवन का विकास-क्रम है। वेद हिरण्यगर्भ रूप को पृथिवी और द्युलोक का आधार स्वीकार करते हैं- यह हिरण्यगर्भ रूप ही ‘आप:’ के मध्य से जन्म लेता है। अत: सृष्टि का आधारभूत हव्य है। [2]

लोकों की रचना करने के उपरान्त परमात्मा ने लोकपालों का सृजन करने की इच्छा से आप: (जलीय गर्भ) से ‘हिरण्य पुरुष’ का सृजन किया। सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ से अण्डे के रूप का एक मुख प्रकट हुआ। मुख से वाक् इन्द्री, वाक् इन्द्री से ‘अग्नि’ उत्पन्न हुई। तदुपरान्त नाक के छिद्र प्रकट हुए। नाक के छिद्रों से ‘प्राण’ और प्राण से ‘वायु’ उत्पन्न हुई। फिर नेत्र उत्पन्न हुए। नेत्रों से चक्षु (देखने की शक्ति) प्रकट हुए और चक्षु से ‘आदित्य’ प्रकट हुआ। फिर ‘त्वचा’, त्वचा से ‘रोम’ और रोमों से वनस्पति-रूप ‘औषधियां’ प्रकट हुईं। उसके बाद ‘हृदय’, हृदय से ‘मन, ‘मन से ‘चन्द्र’ उदित हुआ। तदुपरान्त नाभि, नाभि से ‘अपान’ और अपान से ‘मृत्यु’ का प्रादुर्भाव हुआ। फिर ‘जननेन्द्रिय, ‘जननेन्द्रिय से ‘वीर्य’ और वीर्य से ‘आप:’ (जल या सृजनशीलता) की उत्पत्ति हुई।

यहाँ वीर्य से पुन: ‘आप:’ की उत्पत्ति कही गयी है। यह आप: ही सृष्टिकर्ता का आधारभूत प्रवाह है। वीर्य से सृष्टि का ‘बीज’ तैयार होता है। उसी के प्रवाह में चेतना-शक्ति पुन: आकार ग्रहण करने लगती है। सर्वप्रथम यह चेतना-शक्ति हिरण्य पुरुष के रूप में सामने आयी। इस प्रकार प्रथम खण्ड में सृष्टि की उत्पत्ति और उसकी विकास-प्रक्रिया का बीजारोपण अत्यन्त वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

द्वितीय खण्ड / मानव-शरीर की उत्पत्ति
द्वितीय खण्ड में, मानव-शरीर की रचना का उल्लेख किया गया है। परमेश्वर द्वारा रचे गये अग्नि आदि देवता इस महासृष्टि के अनन्त सागर में डूबने-उतराने लगे। परमात्मा ने उन्हें भूख-प्यास से मुक्त कर दिया। तब देवों की याचना पर परमात्मा ने मानव-शरीर की रचना की। यह मानव-शरीर उनके लिए आश्रयस्थल बन गया। अग्निदेव वाकेन्द्रिय के माध्यम से मनुष्य के मुख में प्रविष्ट हो गये। वायु ने प्राण वायु के रूप में नासिका के छिद्रों में अपना आश्रयस्थल बना लिया। सूर्य देवता ने नेत्रों में अपना स्थान ग्रहण किया। दिक्पाल, अर्थात दिशाओं के स्वामी मनुष्य के कानों में प्रवेश कर गये। औषधियों व वनस्पतियों ने त्वचा के रोमों में अपना स्थान बना लिया। चन्द्रमा मन के रूप में हृदय में प्रविष्ट कर गया और मृत्यु देवता अपानवायु के रूप में गुदामार्ग से शरीर में प्रवेश करके नाभिप्रदेश पर स्थित हो गया तथा जल देवता वीर्य के रूप में जननेन्द्रियों में प्रवेश कर गये। इस प्रकार ईश्वर द्वारा उत्पन्न सृष्टि के सभी देवता और लोकपाल मानव-शरीर पर अपना अधिकार जमाकर बैठ गये। ठीक उसी प्रकार, जैसे ‘हिरण्य पुरुष’ से उनका जन्म हुआ था, मानव-शरीर में वे उन्हीं स्थानों पर समाविष्ट हो गये। उनकी भूख-प्यास भी उन्हीं अंगों के माध्यम से पूरी होने लगी। वस्तुत: भूख-प्यास का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। वह विभिन्न अंगों-अवयवों में स्थित देव-शक्तियों के साथ ही संयुक्त है।

तृतीय खण्ड / अन्न की उत्पत्ति
तृतीय खण्ड में देवताओं, अर्थात लोकपालों के लिए अन्न की व्यवस्था करने का उल्लेख है। साथ ही ‘आत्मा’ के मानव-शरीर में प्रवेश का मार्ग बताया गया है। परमात्मा ने देवताओं की भूख-प्यास की सन्तुष्टि के लिए अन्न की उत्पत्ति का निर्णय किया। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, इन पंच महाभूतों को पकाकर अन्न का सृजन किया गया। प्रारम्भ में इस अन्न को देवताओं ने मनुष्य की विभिन्न इन्द्रियों द्वारा ग्रहण करने का प्रयत्न किया, परन्तु वे इसे स्वीकार नहीं कर सके। तब अन्त में मुख के द्वारा इसे ग्रहण करना सम्भव हो सका। तभी परमात्मा को लगा कि इसमें उसका अंश कहां है। तब ब्रह्म ने मानव-शरीर के सिर की कठोर सीमा को चीरकर उसमें प्रवेश किया। उसके प्रवेश करते ही सम्पूर्ण शरीर और शरीर में स्थित सभी देवगण चैतन्य हो उठे। बालक के सिर में जो कोमल स्थान है, उसे ही आत्मा के प्रवेश का मार्ग कहा जाता है। कपाल के इसी स्थल पर ‘ब्रह्मरन्ध्र’ का स्थान है, जहां पहुंचने के लिए योगी योग-साधना करते हैं। इसे सहस्त्रार, अर्थात दल कमल भी कहते हैं। इसे ‘विदृति’ नाम से भी जाना जाता है; क्योंकि इस स्थल को विदीर्ण करके ही परमात्मा ने अपने प्रवेश का मार्ग बनाया था। तब मानव-देह में उत्पन्न हुए उस जीव ने परब्रह्म परमेश्वर का सूक्ष्म रूप पहचाना और कहा ‘इदन्द्र’ (इदम्+द=इसको मैंने देख लिया), अर्थात परमात्मा से साक्षात्कार को ही ‘इदन्द्र’ कहा गया। इसी का दूसरा रूप ‘इन्द्र’ है, अर्थात ऐसी अगोचर वस्तु, जिसे आंखों से देखा न जा सके, केवल हृदय में जिसका अनुभव किया जा सके। यह शरीर निश्चित रूप से परमात्मा का आवास है। इस शरीर में तीन स्वचालित तन्त्र और तीन ग्रन्थियों में आत्मा का सीधा नियन्त्रण रहता है- मस्तिष्क में सहस्त्रार, हृदय तथा नाभि ग्रन्थि। इन्हें ही शरीर, ब्रह्माण्ड और परम व्योम, स्थूल, सूक्ष्म तथा पालन का आधार माना जा सकता है।

द्वितीय अध्याय

द्वितीय अध्याय में एक ही खण्ड है। इसमें जीव के तीन जन्मों का विवरण प्राप्त होता है।

जिस प्रकार पक्षी को ‘द्विज’ कहा जाता है, अर्थात दो बार जन्म लेने वाला। एक बार वह अण्डे के रूप में माता के गर्भ से बाहर आता है, फिर वह अण्डे से बाहर आता है।

ऐसे ही मनुष्य के भी तीन जन्म होते हैं।

मनुष्य के तीन जन्म
पुरुष के शरीर में स्थित वीर्य में जो शुक्राणु हैं, वे पुरुष की जीवनी-शक्ति के पुंज हैं पहले पुरुष उन्हें अपने शरीर में ही पोषित करता है। तदुपरान्त वह उस वीर्य को स्त्री के गर्भ में प्रवेश कराता है। गर्भ में प्रवेश करने पर जीव का यह ‘प्रथम जन्म’ होता है।

पुरुष के गर्भ में पुरुष का परिपाक, यह उपनिषद की दृष्टि है। इसे मौलिक दृष्टि कहा जा सकता है।

स्त्री के गर्भ में स्थापित पुरुष पुरुष का वीर्य-रूप जीवात्मा शनै:-शनै: पोषित होकर आकार ग्रहण करता है। पूर्ण पोषित होने पर स्त्री प्रसव द्वारा बालक को जन्म देती है। यह जीव का ‘दूसरा जन्म’ होता है।

यह जीव अपने पिता के प्रतिनिधि के रूप में संसार में आयु-भर अपने सम्पूर्ण दायित्वों को पूर्ण करता है। तदुपरान्त वह वयोवृद्ध होकर, अपने समस्त लौकिक कर्तव्यों को पूर्ण करके इस लोक से प्रस्थान करता है। संसारी लोग इसे मृत्यु का नाम देते हैं, परन्तु उपनिषद इसे जीव का पुनर्जन्म, अर्थात ‘तीसरा जन्म’ मानते हैं। यही बात ऋषि वामदेव ने कही थी-‘मैंने गर्भ में ही देवताओं के जन्म रहस्य को जान लिया था। मैं सैकड़ों लोहे की सलाखों वाले पिंजरे में बन्द था। अब मुझे तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया है। अत: मैं बाज पक्षी की भांति उस पिंजरे को भेदकर बाहर आ गया हूं।’ ऋषि वामदेव यह तत्त्वज्ञान प्राप्त करके स्वर्ग में समस्त सुखों को भोगते हुए अमर हो गये थे।

तृतीय अध्याय

तृतीय अध्याय में उपास्य देव के स्वरूप को निश्चित किया गया है। जिस आत्मा की हम उपासना करते हैं, वह कौन है? जिसके द्वारा यह प्राणी देखता है, सुनता है, विविध ग्रन्थों को सूंघता है, बोलता है तथा स्वाद का रसास्वादन करता है, वह आत्मा कौन है?

आत्मा का स्वरूप

यह आत्मा हृदय और मन का ही रूप है। सम्यक ज्ञान, विज्ञान, आदेश, त्वरित जान लेने की शक्ति, बुद्धि, दृष्टि, धैर्य, मनीषा, वेग, स्मृति, संकल्प-शक्ति, मनोरथ, भोग, प्राण-शक्ति, ये सभी उसी एक परमात्म-शक्ति का संज्ञान कराते हैं, जिसे ‘आत्मा’ कहा गया है।

यह आत्मा ही ब्रह्म का स्वरूप है। यही इन्द्र है और प्रजापति है। यही समस्त देवगण हैं और यही पंच महाभूत (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) हैं। यही समस्त जड़-चेतन में समाहित है। समस्त लोक उसी के आश्रित हैं। प्रज्ञा ही उसका विलयस्थल है। अत: प्रज्ञान ही ब्रह्म है।

जो व्यक्ति परमेश्वर को इस प्रकार जान लेता है, वह इस लोक से सीधे स्वर्गलोक जाकर दिव्य भोगों को प्राप्त कर, अन्त में अमरत्व प्राप्त करता है।

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