मुण्डकोपनिषद

शान्तिपाठ

हे देवगण! हम कानों से कल्याणमय वचन सुने; यज्ञकर्म में समर्थ होकर नेत्रों से शुभ दर्शन करें; अपने स्थिर अंग और शरीरों से स्तुति करने वाले हम लोग देवताओं के लिए हितकर आयु का भोग करें। त्रिविध ताप की शांति हो।
महान कीर्तिमान इंद्र हमारा कल्याण करें, परम ज्ञानवान पूषा हमारा कल्याण करें, अरिष्टों के लिए चक्र्रूप गरुड़ हमारा कल्याण करे तथा वृहस्पति जी हमारा कल्याण करे। त्रिविध ताप की शांति हो।

प्रथम मुण्डक

प्रथम खंड

आचार्य परंपरा
सम्पूर्ण देवताओं में पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुआ। वह विश्व का रचयिता और त्रिभुवन का रक्षक था। उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को समस्त विद्याओं की आश्रयभूत ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया।
अथर्वा को ब्रह्मा ने जिसका उपदेश किया था वह ब्रह्मविद्या पूर्वकाल में अथर्वा ने अंगी को सिखायी। अंगी ने उसे भरद्वाज के पुत्र सत्यवह से कहा तथा भरद्वाजपुत्र (सत्यवह) ने इस प्रकार श्रेष्ठ से कनिष्ठ को प्राप्त होती हुई वह विद्या अंगिरा से कही।

शौनक की गुरुपसत्ति और प्रश्न
शौनक नामक प्रसिद्ध महागृहस्थ ने अंगीरा के पास विधिपूर्वक जाकर पूछा – ‘भगवन! किस के जान लिए जाने पर यह सब कुछ जान लिया जाता है?

अंगिरा का उत्तर-विद्या दो प्रकार की है
उससे उस ने कहा – ‘ब्रह्मवेत्ताओं ने कहा है कि दो विद्याएँ जानने योग्य है – एक परा और दूसरी अपरा॥

परा और अपरा विद्या का स्वरूप
उनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष-यह अपरा है तथा जिससे उस अक्षर परमात्मा का ज्ञान होता है वह परा है।

परविद्या प्रदर्शन
वह जो अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण और चक्षु: श्रोत्रादिहीन है, इसी प्रकार अपाणिपाद, नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यंत सूक्षम और अव्यय है तथा जो सम्पूर्ण भूतों का कारण है उसे विवेकी लोग सब और देखते है।

अक्षर ब्रह्म का विश्व – कारणत्व
जिस प्रकार मकड़ी जाले को बनाती और निगल जाती है, जैसे पृथिवी में ओषधियाँ उत्पन्न होती है और जैसे सजीव पुरुष से केश एवं लोम उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार उस अक्षर से यह विश्व प्रकट होता है।

सृष्टिक्रम
तप के द्वारा ब्रह्म कुछ उपचय (स्थूलता) – को प्राप्त हो जाता है, उसी से अन्न उत्पन्न होता है। फिर अन्न से क्रमशः प्राण, मन सत्य, लोक, कर्म और कर्म से अमृत संज्ञक कर्मफल उत्पन्न होता है।

प्रकरण का उपसंहार
जो सबको (सामान्य रूप से) जानने वाला और सबका विशेषज्ञ है तथा जिस का ज्ञानमय ताप है उस (अक्षर ब्रह्म) – से ही यह ब्रह्म (हिरण्यगर्भ), नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होता है।

द्वितीय खंड

बुद्धिमान ऋषियों ने जिन कर्मों का मन्त्रों में साक्षात्कार किया था वही यह सत्य है, त्रेतायुग में उन कर्मों का अनेक प्रकार विस्तार हुआ। सत्य (कर्मफल)- की कामना से युक्त होकर उनका नित्य आचरण करो; लोक में यही तुम्हारे लिए सुकृत (कर्मफल की प्राप्ति) का मार्ग है।

अग्निहोत्र का वर्णन
जिस समय अग्नि के प्रदीप्त होने पर उसकी ज्वाला उठने लगे उस समय दोनों आज्य भागों के मध्य में (प्रातः और सायंकाल) आहुतियाँ डाले।

विधिहीन कर्म का कुफल
जिस का अग्निहोत्र दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य और अग्रयण – इन कर्मों से रहित, अतिथि – पूजन से वर्जित, यथासमय किये जाने वाले हवन और वैश्वदेव से रहित अथवा अविधिपूर्वक हवन किया होता है, उसकी मानो सात पीढ़ियों का वह नाश कर देता है।

अग्नि की सात जिह्वाएं
काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुची देवी- ये उस (अग्नि) – की लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं।

विधिवत अग्निहोत्रादि से स्वर्गप्राप्ति
जो पुरुष इन देदीप्यमान अग्निशिखाओं में यथासमय आहुतियाँ देता हुआ (अग्निहोत्रादि कर्म का) आचरण करता है उसे ये सूर्य की किरणें होकर वहां ले जाती है जहाँ देवताओं का एकमात्र स्वामी रहता है।
वे दिप्तिमती आहुतियाँ ‘आओ, आओ, यह तुम्हारे सुकृत से प्राप्त हुआ पवित्र ब्रह्मलोक है’ ऐसी प्रिय वाणी कहकर यजमान का अर्चन (सत्कार) करती हुई उसे ले जाती है।

ज्ञान रहित कर्म की निंदा
जिनमें (ज्ञान बाह्य होने से) अवर – निकृष्टकर्म आश्रित कहा गया है, वे [सोलह ऋत्विक तथा यजमान और यजमानपत्नी] ये अठारह यज्ञरूप (यज्ञ के साधन) अस्थिर एवं नाशवान बतलाये गए हैं। जो मूढ़ ‘यही श्रेय है’ इस प्रकार इन का अभिनन्दन करते हैं, वे फिर भी जरा – मरण को प्राप्त होते हैं।

अविद्याग्रस्त कर्मठों की दुर्दशा
अविद्या के मध्य में रहने वाले और अपने को बड़ा बुद्धिमान तथा पंडित मानने वाले वे मूढ़ पुरुष अंधे से ले जाये जाते हुए अंधे के समान पीड़ित होते सब और भटकते रहते हैं।

बहुधा अविद्या में ही रहने वाले वे मूर्ख लोग ‘हम कृतार्थ हो गए हैं’ इस प्रकार अभिमान किया करते हैं। क्योंकि कर्मठ लोगों को कर्म फल विषयक राग के कारण तत्त्व का ज्ञान नहीं होता, इसलिए वे दुःखार्त्त होकर (कर्मफल क्षीण होने पर) स्वर्ग से च्युत हो जाते हैं।

इष्ट और पूर्त कर्मों को ही सर्वोत्तम मानने वाले वे महामूढ किसी अन्य वस्तु को श्रेयस्कर नहीं समझते। वे स्वर्गलोक के उच्च स्थान में अपने कर्मफलों का अनुभव कर इस (मनुष्य) लोक अथवा इससे भी निकृष्ट लोक में प्रवेश करते हैं।

किन्तु जो शांत और विद्वान् लोग वन में रहकर भिक्षावृत्ति का आचरण करते हुए तप और श्रद्धा का सेवन करते हैं वे पापरहित होकर सूर्यद्वार (उत्तरायण मार्ग) – से वहां जाते हैं जहाँ वह अमृत और अव्ययस्वरूप पुरुष रहता है।

ऐहिक और पारलौकिक भोगों की असारता देखने वाले पुरुष के लिए संन्यास और गुरुपसदन का विधान
कर्म द्वारा प्राप्त हुए लोकों की परीक्षा कर ब्राह्मण निर्वेद को प्राप्त हो जाये, (क्योंकि संसार में) अकृत (नित्य पदार्थ) नहीं है, और कृत से (हमें प्रयोजन क्या है?) अतः उस नित्य वस्तु का साक्षात ज्ञान प्राप्त करने के लिए तो हाथ में समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के ही पास जाना चाहिए।

गुरु के लिए उपदेश प्रदान की विधी
वह विद्वान् गुरु अपने समीप आये हुए उस पूर्णतया शांतचित्त एवं जितेन्द्रिय शिष्य को उस ब्रह्म विद्या का तत्त्वतः उपदेश करें जिससे उस सत्य और अक्षर पुरुष का ज्ञान होता है।

द्वितीय मुण्डक

प्रथम खण्ड

अग्नि से स्फुलिंगों के समान ब्रह्म से जगत की उत्पत्ति
वह यह (अक्षरब्रह्म) सत्य है। जिस प्रकार अत्यंत प्रदीप्त अग्नि से उसी के समान रूपवाले हजारों स्फुलिंग (चिंगारियां) निकलते हैं, हे सोम्य! उसी प्रकार उस अक्षर से अनेकों भाव प्रकट होते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं।

ब्रह्म का पारमार्थिक स्वरुप
(वह अक्षरब्रह्म) निश्चय ही दिव्य, अमूर्त, पुरुष, बाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, अप्राण,मनोहीन, विशुद्ध एवं श्रेष्ठ अक्षर से भी उत्कृष्ट हैं।

ब्रह्म का सर्वकारणत्व
इस (अक्षर पुरुष) – से ही प्राण उत्पन्न होता है तथा इससे ही मन, सम्पूर्ण इन्द्रियां, आकाश, वायु, तेज, जल और सारे संसार को धारण करने वाली पृथ्वी [उत्पन्न होती है]।

सर्वभूतान्तरात्मा ब्रह्म का विश्वरूप
अग्नि (द्युलोक) जिसका मस्तक है, चंद्रमा और सूर्य नेत्र है, दिशाएँ कर्ण हैं, प्रसिद्द वेद वाणी हैं, वायु प्राण है, सारा विश्व जिसका हृदय है और जिसके चरणों से पृथ्वी प्रकट हुयी है वह देव सम्पूर्ण भूतों का अंतरात्मा है।

अक्षर पुरुष से चराचर की उत्पत्ति का क्रम
उस पुरुष से ही, सूर्य जिसका समिधा है वह अग्नि उत्पन्न हुआ है। [उस द्युलोकरूप अग्नि से निष्पन्न हुए] सोम से मेघ और (मेघ से) पृथिवीतल में औषधियां उत्पन्न होती है। पुरुष स्त्री में (औषधियों से उत्पन्न हुआ) वीर्य सींचता है; इस प्रकार पुरुष से ही यह बहुत -सी प्रजा उत्पन्न हुयी है।

कर्म और उनके साधन भी पुरुष प्रसूत ही है।
उस पुरुष से ही ऋचाएं, साम, यजु, दीक्षा, सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु, दक्षिणा, संवत्सर, यजमान, लोक और जहाँ तक चन्द्रम पवित्र करता है तथा सूर्य तपता है वे लोक उत्पन्न हुए हैं।

उससे ही (कर्म के अंगभूत) बहुत-से देवता उत्पन्न हुए तथा साध्यगण, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण-अपान, व्रीही, यव, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधि [ये सब भी उसी से उत्पन्न हुए हैं]

इन्द्रिय, विषय और इन्द्रिय-स्थनादि भी ब्रह्मजनित ही हैं
उस पुरुष से ही सात प्राण (मस्तकस्थ सात इन्द्रियां) उत्पन्न हुए हैं। उसी से उनकी सात दीप्तियाँ, सात समिधा (विषय), सात होम (विष्यज्ञान) और जिनमे वे संचार करते हैं वे सात स्थान प्रकट हुए हैं। (इस प्रकार) प्रति देह में स्थापित ये सात-सात पदार्थ (उस पुरुष से ही हुए हैं)

पर्वत, नदी और ओषधि आदि का ब्रह्मजन्यत्व
इसी से समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं; इसी से अनेक रूपों वाली नदिया बहती है; इसी से सम्पूर्ण ओषधियाँ और रस प्रकट हुए हैं, जिस (रस)-से भूतों से परिवेष्टित हुआ यह अंतरात्मा स्थित होता है।

ब्रह्म और जगत का अभेद तथा ब्रह्मज्ञान से अविद्याग्रंथि का नाश
यह सारा जगत, कर्म और तप (ज्ञान) पुरुष ही है। वह पर और अमृतरूप ब्रह्म है। उसे जो सम्पूर्ण प्राणियों के अन्तःकरण में स्थित जानता है, हे सोम्य! वह इस लोक में अविद्या की ग्रंथि का छेदन कर देता हैं।

द्वितीय खंड

यह ब्रह्म प्रकाशस्वरूप सबके हृदय में स्थित, गुहाचर नामवाला और महत्पद है। इसी में चलने वाले, प्राणन करने वाले और निमेशोंमेष करने वाले ये सब समर्पित हैं। तुम इसे सदसद्रुप, प्रार्थनीय, प्रजाओं के विज्ञानं से परे और सर्वोत्कृष्ट जानो।

ब्रह्म में मनोनिवेश करने का विधान
जो दिप्तिपान और अणु से भी अणु है तथा जिसमें सम्पूर्ण लोक और उनके निवासी स्थित है वहीँ यह सत्य और अमृत है। हे सोम्य! उसका (मनोनिवेश द्वारा) वेधन चाहिए; तू उसका वेधन कर।

ब्रह्मवेधन की विधि
हे सोम्य! उपनिषद्वेद्य महान अस्त्ररूप धनुष लेकर उस पर उपासना द्वारा तीक्षण किया हुआ बाण चढ़ा; और फिर उसे खींचकर ब्रह्मबभावानुगत चित्त से उस अक्षररूप लक्ष्य का ही वेधन कर।

वेधन के लिए ग्रहण किये जाने वाले धनुशादि का स्पष्टीकरण
प्रणव धनुष है, [सोपाधिक] आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। उसका सावधानतापूर्वक वेधन करना चाहिए और बाण के समान तन्मय हो जाना चाहिए।

आत्मसाक्षात्कार के लिए पुनः विधि
जिसमें द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और सम्पूर्ण प्राणों के सहित मन ओतप्रोत है उस एक आत्मा को ही जानो, और सब बातों को छोड़ दो यही अमृत (मोक्ष प्राप्ति) – का सेतु (साधन) है।

ओंकार रूप से ब्रह्म चिंतन की विधि
रथ चक्र की नाभि में जिस प्रकार अरे लगे होते है उसी प्रकार जिसमें सम्पूर्ण नाड़ियाँ एकत्रित होती है उस (हृदय) के भीतर यह अनेक प्रकार से उत्पन्न हुआ संचार करता है। उस आत्मा का ‘ॐ’ इस प्रकार ध्यान करो। अज्ञान के उस पार गमन करने में तुम्हारा कल्याण हो [अर्थात तुम्हें किसी प्रकार का विघ्न प्राप्त न हो]

अपर ब्रह्म का वर्णन तथा उसके चिंतन का प्रकार
जो सर्वज्ञ और सर्ववित है और जिसकी यह महिमा भूर्लोक में स्थित है वह यह आत्मा दिव्या ब्रह्मपुर आकाश (हृदयाकाश) में स्थित है। वह मनोमय तथा प्राण और [सूक्षम] शरीर को [एक देह से दुसरे देह में] ले जाने वाला पुरुष हृदय को आश्रित कर अन्न (अन्नमय देह) में स्थित है। उसका विज्ञानं (अनुभव) होने पर ही विवेकी पुरुष, जो आनंद स्वरूप अमृत ब्रह्म प्रकाशित हो रहा है, उसका सम्यक साक्षात्कार करते हैं।

ब्रह्मसाक्षात्कार का फल
उस परावर (कारण कार्य रूप) का साक्षात्कार कर लेने पर इस जीव की हृदयग्रंथि टूट जाती है; सारे संशय नष्ट हो जाते हैं और इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं।

ज्योतिर्मय ब्रह्म
वह निर्मल और कलाहीन ब्रह्म हिरण्मय (ज्योतिर्मय) परम कोष में विद्यमान है। वह शुद्ध और सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थों की ज्योति है और वह है जिसे कि आत्मज्ञानी पुरुष जानते हैं।

वहां (उस आत्म स्वरूप ब्रह्म में) न सूर्य प्रकाशित होता है और न चंद्रमा या तारे। वहां यह बिजली भी नहीं चमकती फिर यह अग्नि किस गिनती में है? उसके प्रकाशित होने से ही सब प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसी के प्रकाश से प्रकाशमान है।

ब्रह्म का सर्व व्यापकत्व
यह अमृत ब्रह्म ही आगे है, ब्रह्म ही पीछे है, ब्रह्म ही दायीं-बायीं और है तथा ब्रह्म ही नीचे-ऊपर फैला है। यह सारा जगत सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है।

तृतीय मुण्डक

प्रथम खंड

समान वृक्ष पर रहने वाले दो पक्षी
साथ-साथ रहने वाले तथा समान आख्यान वाले दो पक्षी एक ही वृक्ष का आश्रय करके रहते हैं। उनमें एक तो स्वादिष्ट (मधुर) पिप्पल (कर्मफल) का भोग करता है और दूसरा भोग न करके केवल देखता रहता है।

ईश्वर दर्शन से जीव की शोक निवृति
[ईश्वर के साथ] एक ही वृक्ष पर रहने वाला जीव अपने दीन स्वभाव के कारण मोहित होकर शोक करता है। वह जिस समय (ध्यान द्वारा) अपने से विलक्षण योगी सेवित ईश्वर और उसकी महिमा (संसार) दो देखता है उस समय शोक रहित हो जाता है।
जिस समय दृष्टा सुवर्ण वर्ण और ब्रह्मा के भी उत्पत्ति स्थान उस जगत्कर्ता ईश्वर पुरुष को देखता है उस समय वह विद्वान पाप-पुण्य दोनों को त्यागकर निर्मल हो अत्यंत समता को प्राप्त हो जाता है।

श्रेष्ठतम ब्रह्मज्ञ
यह, जो सम्पूर्ण भूतों के रूप में भासमान हो रहा है प्राण है। इसे जानकार विद्वान अतिवादी नहीं होता। यह आत्मा में क्रीडा करने वाला और आत्मा में ही रमण करने वाला क्रियावान पुरुष ब्रह्म वेत्ताओं में श्रेष्ठतम है।

आत्मदर्शन के साधन
यह आत्मा सर्वदा सत्य, तप, सम्यग्ज्ञान और ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जिसे दोषहीन योगिजन देखते हैं वह ज्योतिर्मय शुभ्र आत्मा शरीर के भीतर रहता है।

सत्य की महिमा
सत्य ही जय को प्राप्त होता है, मिथ्या नहीं। सत्य से देवयानमार्ग का विस्तार होता है, जिसके द्वारा आत्मकाम ऋषि लोग उस पद को प्राप्त होते हैं जहाँ वह सत्य का परम निधान (भण्डार) वर्तमान है।

परम पद का स्वरूप
वह महान दिव्य और अचिन्त्य रूप है। वह सूक्षम से भी सूक्षमतर भासमान होता है तथा दूर से भी दूर और इस शरीर में अत्यंत समीप भी है। वह चेतनावान प्राणियों में इस शरीर के भीतर उनकी बुद्धिरूप गुहा में छिपा हुआ है।

आत्म साक्षात्कार का असाधारण साधन – चित्तशुद्धि
(यह आत्मा) न नेत्र से ग्रहण किया जाता है, न वाणी से, न अन्य इन्द्रियों से और न तप अथवा कर्म से ही। ज्ञान के प्रसाद से पुरुष विशुद्ध चित्त हो जाता है और तभी वह ध्यान करने पर उस निष्कल आत्म तत्त्व का साक्षात्कार करता है।

शरीर में इन्द्रियरूप से अनुप्रविष्ट हुए आत्मा का चित्त शुद्धि द्वारा साक्षात्कार
वह सूक्ष्म आत्मा, जिस (शरीर) में पांच प्रकार से प्राण प्रविष्ट है उस शरीर के भीतर ही विशुद्ध विज्ञान द्वारा जानने योग्य है। उससे इन्द्रियों द्वारा प्रजा वर्ग के सम्पूर्ण चित्त व्याप्त है, जिसके शुद्ध हो जाने पर यह आत्म स्वरूप से प्रकाशित होने लगता है।

आत्मज्ञ का वैभव और उसकी पूजा का विधान
वह विशुद्ध चित्त आत्मवेत्ता मन से जिस-जिस लोक की भावना करता है और जिन-जिन भोगों को चाहता है वह उसी-उसी लोक और उन्हीं-उन्हीं भोगों को प्राप्त कर लेता है। इसलिए एश्वर्य की इच्छा करने वाला पुरुष आत्मज्ञानी की पूजा करे।

द्वितीय खण्ड

आत्मवेत्ता की पूजा का फल
वह (आत्मवेत्ता) इस परम आश्रय रूप ब्रह्म को जिसमें यह समस्त जगत अर्पित है और जो स्वयं शुद्ध रूप से भासमान हो रहा है, जानता है। जो निष्काम भाव से उस आत्मज्ञ पुरुष की उपासना करते हैं, वे बुद्धिमान लोग शरीर के बीज भूत इस वीर्य का अतिक्रमण कर जाते हैं। अर्थात इसके बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

निष्कामता से पुनर्जन्म निवृत्ति
(भोगों के गुणों का) चिंतन करने वाला जो पुरुष भोगों की इच्छा करता है वह उन कामनाओं के योग से तहां-तहां (उनकी प्राप्ति के स्थानों मे) उत्पन्न होता रहता है। परंतु जिसकी कामनाएं पूर्ण हो गयी हैं उस कृतकृत्य पुरुष की तो सभी कामनाएं इस लोक मे ही लीन हो जाती हैं।

आत्मदर्शन का प्रधान साधन-जिज्ञासा
यह आत्मा ना तो प्रवचन से प्राप्त होने योग्य है और न मेधा (धारणशक्ति) तथा अधिक श्रवण करने से ही मिलने वाला है। यह(विद्वान) जिस परमात्मा की प्राप्ति की इच्छा करता है उस (इच्छा) के द्वारा ही इसकी प्राप्ति हो सकती है। उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूप को व्यक्त कर देता है।

आत्मदर्शन मे अन्य साधन
यह आत्मा बलहीन पुरुष को प्राप्त नहीं हो सकता और न प्रमाद अथवा लिंग (सन्यास) रहित तपस्या से ही(मिल सकता है)। परंतु जो विद्वान इन उपायों से (उसे प्राप्त करने के लिये) प्रयत्न करता है उसका यह आत्मा ब्रह्मधाम मे प्रविष्ट हो जाता है।

आत्मदर्शी की ब्रह्मप्राप्ति का प्रकार
इस आत्मा को प्राप्त कर ऋषिगण ज्ञानतृप्त, कृतकृत्य, विरक्त और प्रशांत हो जाते हैं। वे धीर पुरुष उस सर्वगत ब्रह्म को सब और प्राप्त कर (मरणकाल में) समाहितचित्त हो सर्वरूप ब्रह्म मे ही प्रवेश कर जाते हैं।

ज्ञातज्ञेय की मोक्षप्राप्ति
जिन्होने वेदांतजनित विज्ञान से ज्ञेय अर्थ का अच्छी तरह निश्चय कर लिया है वे सन्यासयोग से यत्न करने वाले समस्त शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोक मे देहत्याग करते समय परम अमरभाव को प्राप्त हो सब ओर से मुक्त हो जाते हैं।

मोक्ष का स्वरूप
(प्राणादि) पंद्रह कलाएं अपने आश्रयों मे स्थित हो जाती है, (चक्षु आदि इन्द्रियों के अधिष्ठाता) समस्त देवगण अपने प्रति देवता (आदित्यादि) मे लीन हो जाते हैं तथा उसके (संचितादि) कर्म और विज्ञानमय आत्मा आदि सब-के-सब पर अव्यय देव मे एकीभाव को प्राप्त हो जाते हैं।

ब्रह्म प्राप्ति मे नदी आदि का दृष्टांत
जिस प्रकार निरंतर बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूप को त्यागकर समुद्र मे अस्त हो जाती हैं उसी प्रकार विद्वान नाम-रूप से मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुष को प्राप्त हो जाता है।

ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है
जो कोई उस परब्रह्म को जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुल मे कोई अब्रह्मवित नहीं होता। वह शोक को तर जाता है, पाप को पार कर लेता है और हृदय ग्रंथियों से विमुक्त होकर अमरत्व प्राप्त कर लेता है।

विद्याप्रदान की विधि
जो अधिकारी क्रियावान, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ और स्वयं श्रधापूर्वक एकर्षि नमक अग्नि मे हवन करने वाले हैं तथा जिन्होने विधिपूर्वक शिरोव्रत का अनुष्ठान किया है उन्हीं से यह ब्रह्म विद्या कहनी चाहिये।

उपसंहार
उस इस सत्य का पुरकाल मे अंगिरा ऋषि ने (शौनकजी को) उपदेश किया था। जिसने शिरोव्रत का अनुष्ठान नहीं किया वह इसका अध्ययन नहीं कर सकता। परमर्षियों को नमस्कार है, परमर्षियों को नमस्कार है।

ॐ भद्रं कर्णेभी श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा।
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा सस्तनूभि र्व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्ताक्ष् र्योऽरिष्टनेमी: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्ति! शान्ति! शान्ति!

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