शिल्पशास्त्र

श्री विश्वकर्मा शतकम

धीमतो द्दिजवरस्य महर्ष: शिल्पशास्त्र रचनानिपुणस्य ।
विश्वकर्मविबुधस्य मुदेहि स्वागतां वितनुम: शतकेन ।।1।।
शिल्पशास्त्र के रचयिता, धीमान् ब्राह्मण, महर्षि विश्वकर्मा के आविर्भाव का इन 100 संस्कृत श्लोकों द्वारा
स्वागत करता हैं।

(क) रतोद्धता वृत्तम्
प्रक्रियां रचियता रथोद्धतां येन वेदविदुषा विजन्मना ।
शिल्पतल्यमविकल्पि कल्पितं विश्वकर्मविबुधं तमीड्महे ।।2।।
वेद् के विद्वान् जिस ब्राह्मण ने स्थादि निर्माण की प्रक्रिया को रचते हुए असंदिग्ध शिल्पशास्त्र को प्रकट क्या है,
उस विश्वकर्मा धीमान् की हम स्तुति करते है।

तस्योपचारात् तदपत्यामादौ शरीरधारी कुशलस्तपस्वी ।
शिल्पक्रियाकाण्डविशेषविज्ञः पुमानपि स्यादिह विश्वकर्मा ।।33।।
उस देव के उपलक्षण से उसको आदिम सतांन, कुशल, तपस्वी, शिल्पशास्त्र का विशेष विद्वान,
देहधारी पुरूष भी विश्वकर्मा कहाता है।

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