पाक शास्त्र

पाक शास्त्र

इस शास्त्र का उद्देश्य है वातावरण और स्वास्थय के अनूरूप भोजन प्राप्त करना। आज के समय मे जबकि विग्यान अपनी चरम सीमा है और नित नए अविष्कार मानव को अचम्भित करने मे लगे है। वहीं रोजाना स्वयं के भोजन के लिये समय का अभाव भी सामान्य देखा जा रहा है। पूर्ण रूप से स्वस्थ मनुष्य अपनी भाग दोड की जिन्दगी मे इतना उलझ कर रह गया है कि उसे जो भी आसान भोजन नजर आता है उसे सहर्ष स्वीकार कर लेता है। उस खाने का उसके स्वास्थय पर कैसा भी असर डाले लेकिन वह उस खाने के साथ बंध जाता है। नतिजा आरंभ होता है पेट और यकृत मे होने वाली गडबडियां। जो आयुर्वेदिक, यूनानी, एलोपैथिक और होम्योपैथी दवाओं से भी काबू नही आती। लेकिन हम अपने स्वास्थय के लिये इतने बेइमान कैसे हो सकते है? क्या हमे जीने से अधिक अनिवार्य अन्य कार्य लगने लगे है। या हम अपने ही मायाजाल मे फंसते जा रहे है।

सावधान! भोजन वही सही है जो हमे स्वास्थ्य प्रदान करे। न कि मात्र स्वाद और भूख मिटाना।

भोजन मे यदि प्रयाप्त मात्रा मे खनिज पदार्थ एवं विटामिन नही है तो वह भोजन विष के ही समान है। अत्यधिक मात्रा मे या कम मात्रा मे किसी भी पदार्थ का सेवन हानिकारक है।

सैकडों वर्ष पुराना हिन्दु पाक शास्त्र आज भी अपनी पूर्णता पर खरा उतरता है। इसमे लेश मात्र भी शंका नही है। और अब इस बात को तो पूरी दुनिया मानने लगी है। भारतीय पाक शास्त्र की विधि के अनुसार बनाये गये भोजन मे पूर्णता समाहित है। इस तेज रफ्तार दुनिया मे भी जीवन को महत्व देना अनिवार्य है। अन्यथा बाजारी चिकनाई भरा खाना खाने से आपके चन्द मिनट तो बच सकते है, हो सकता है कि आपको अपनी इच्छा के स्वाद को पूर्ण करने का सहारा भी मिल जाता हो, लेकिन इसके साथ आपको मिलता है अपने शरीर मे बढा हुआ कोलेस्ट्राल, अनेको बिमारियों युक्त मोटापा, मधुमेह, हाइपर टेंशन आदि। इसलिये यह अनिवार्य है कि हम अपने रोजमर्रा मे शामिल करे अपने स्वास्थ्य के अनूरूप भोजन। जो उचित व विभिन्न खनिज पदार्थ एवं विटामिन से भरपूर हो। खाने के लिये एक बात का ध्यान अवश्य रखें कि हमारे खाने जितनी विभिन्नता होगी, हमारा स्वास्थ्य भी उतना बेहतर हो। हम जितना सिमित खाना ग्रहण करेंगे, उतने अधिक तत्वों के लिये हमे दवाओं आदि पर निर्भर रहना पडेगा।

मौसम के अनुसार खाना खाने की आदत का भी हमारे स्वास्थ्य से गहरा संबंध है। जैसे कि तेल युक्त भोजन बरसात मे अर्थात जब 100% नमी हो या शुश्क सर्दी व शुश्क गर्मी मे अर्थात जब मौसम मे नमी 0% हो तभी खाने मे आनन्द देता है। ऎसे समय मे यह भोजन शीघ्र पचता है। शेष मौसम मे साधारण भोजन (चिकनाइ एवं फैट रहित) ही सेहत के लिये बेहतर है। व्यायाम की कमी के कारण भी शरीर मे कोलेस्ट्राल का स्तर बढ जाता है और ऎसे मे हल्की सी भोजन की लापरवाही भयावह बिमारी को आमन्त्रित करने के लिये प्रयाप्त है। वसारहित भोजन को हमारी लार एवं अमाश्य से निकलने वाला द्रव आसानी से पचा सकता है। इसके लिये हृदय एवं यकृत को अधिक परीश्रम नही करना पडता। यही कारण है कि हम सामान्य जीवन जीते हुये भी बिमारियों से दूर रह कर लम्बे समय तक जीवित रह सकते हैं।

यह पूर्ण सत्य है कि प्रत्येक खाद्य पदार्थ मे तेल की मात्रा होती है। उसे और अधिक तेलयुक्त बनाने की आवश्यकता नही होती। तिल, खसखस, सरसों, दालचीनी, जायफल, धनिया, काली मिर्च, हल्दी, लौंग आदि मे उचित मात्रा मे तेल व वसा विद्यमान रहता है। लगभग प्रत्येक भारतीय व्यंजन मे इन मसालों की आवश्यकता होती है। लेकिन ऎसा नही कि इन मसालों का उपयोग ही बंद कर दिया जाऎ। उचित मात्रा मे प्रत्येक पदार्थ महत्वपूर्ण है। नारियल, काजू, बादाम, अखरोट, मूगफलई आदि मे भरपूर तेल होता है। बहुत सी दालों मे भी प्रचुर मात्रा मे तेल(वसा) विद्यमान है। यह तेल जब तक इन खाद्य पदार्थों मे है प्राकृतिक अवस्था मे है, यह शरीर के लिये उपयोगी है। लेकिन जब यही तेल रासायन व घोटन विधि द्वारा निकाल लिया जाता है तो यह दवा के रूप मे कार्य करता है। विभिन्न प्रकार के विटामिन व खनिज पदार्थ शरीर मे कम हो जाने के पश्चात यदि इन तेलो सहित अन्य तेलों का उचित मात्रा मे (चिकित्सक के परामर्श से) सेवन करने से शरीर को स्वास्थ्य प्राप्त होता है। अपनी मर्जी से जितना चाहा, खाने से बिमारियों को आमंत्रण का ही कार्य होता है।

शरीर मे उचित मात्रा मे वसा भी अनिवार्य है। शरीर मे त्वचा आदि कोशिकाओं के विकास के लिये, यकृत एवं अमाश्य के कार्य के लिये वसा की उचित मात्रा मे अनिवार्यता है। लेकिन विभिन्न प्रकार के भोजन करने से यह मात्रा पूर्ण हो जाती है। लगभग 30 प्रकार का भोजन हमारे शरीर मे मात्र घाव भरने, बालों एवं त्वचा द्वारा शरीर के दुषित द्रव को बाहर निकालने के अनिवार्य है। भोजन की विभिन्नता दिमाग के सभी तत्वो को पूर्ण कर अधिक सोचने की क्षमता प्रदान करने मे सहायक है।

एक ही प्रकार का निरन्तर भोजन करते रहने से शरीर को बहुत सी समस्याओं के घेराव का सामना करना पडता है। जैसे कि शुष्क एवं पपडीदार त्वचा, त्वचा मे विभिन्न अंगों मे खुजली, भद्दे और रूसी से भरे बाल, समयानुसार घाव न भरना, हृदय रोग, किडनी मे कमजोरी, पेशाब मे जलन, पेट मे दर्द, पेट व यकृत मे घाव, मोतियाबिंद, गठिया और खून मे विकार, रक्तकणिकाओं की कमी, एवं मधुमेह आदि। ऎसे ही अनेकों कारणों से इस शास्त्र की उपयोगिता बढ जाती है।

अन्य शास्त्रों के अनुसार भी:- “जीवेम शरदः शतम” को प्रमुख स्थान पर रखा गया है अर्थात सौ वर्ष तक जीएं। और यह तभी सम्भव है जब आप वातावरण के अनुरूप स्वच्छ एवं उचित भोजन ग्रहण करें और मिथ्या भोजन का बहिष्कार करें।

चरक सहिंता के अनुसार सुखाया हुआ मांस, खुश्बू या गंध युक्त भोजन, कुमुद आदि जलज औष्धियों के कंद, कमल नाल, भींस, रोगी पशुओं का मांस, पकी दही, फ़टे दूध का घना भाग आदि का सेवन त्याज्य है जबकि सांठी के चावल, शालिचावल, मूंग, सैंधानमक, आंवला, जौ, वर्षा जल, गोदुग्ध, गो घी, जांगलदेशीय पशु-पक्षियों का मांस, मधु आदि का सेवन आवश्यक है।

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