चिकित्सा शास्त्र

चिकित्सा शास्त्र आयुर्वेद का अभिन्न अंग है। यह क्षेत्र जीवन को स्वस्थ रखने मे मददगार है। सामान्य खान-पान सम्बन्धित पदार्थ, जडी-बूटी, रासायनिक कल्प, और विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार के लिये विभिन्न प्रकार की औषधियों के निर्मांण और सेवन विधि का वर्णन इस शास्त्र मे पढने को मिलता है। मानव और पशु-पक्षी आदि के रोगों की जांच से निवारण तक के प्रमुख कार्य इसी क्षेत्र से संबंधित है। विभिन्न प्रकार के पौधों की जानकारी और रोगों की जानकारी का वर्णन भी यहां मिलता है। जो रोगों का जानकार होता है उसे चिकित्सक कहते हैं।

भारत मे अंग्रेजो और मुगलों के आने से पूर्व जब मात्र आयुर्वेदिक दवाओ का ही उपयोग होता था तब इस क्षेत्र का कोई वर्गीकरण नही था। लेकिन उसके पश्चात युनानी दवायें और चिकित्सक आये, तदुपरांत होम्योपैथी ने यहां दस्तक दी और बाद मे ऎलोपैथी ने इस क्षेत्र पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया। आधुनिक चिकित्सको(डाक्टर) के अनुसार आयुर्वेदिक एवं युनानी दवाओं का असर बिमारी पर बहुत धीरे होने के कारण इनका प्रभाव समाज से लुप्त होता जा रहा है। और भारतीय व्यजनो मे अधिक सुगन्धित मसालो के इस्तेमाल के कारण होम्योपैथी दवा की जडे भी भारत मे नही जमी। यही कारण है दर्द का अहसास तुरंत समाप्त करने के समर्थ ऎलोपैथी दवाओं ने भारतीय चिकित्सा बाजार पर कब्जा कर लिया है।

लेकिन अब भारत मे ही नही अपितु सम्पूर्ण जगत मे ऎलोपैथी दवाओ से होने वाले दुष्परिमाणो के चलते बहुत सी दवाओं पर प्रतिबंध लगना आरंभ हो गया है। और पुनः जीवन प्राचीन चिकित्सा अर्थात आयुर्वेद एवं युनानी दवाओं की और चलने को मजबूर हो गया है। इसके साथ – साथ अब चिकित्सा क्षेत्र मे चुम्बकीय पद्दती(QRS) और एक्यूप्रैशर पद्दती भी शामिल हो रही है। चुम्बकीय पद्दती तो सभी दवाओं के साथ इस्तेमाल होने पर प्रभावशाली ढंग से कार्य करती देखी जा रही है जो शायद आने वाले समय में जीवन के लिये वरदान सिद्ध हो जाये।

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