वैवस्वत मनु के वंशजों का वर्णन

लोमहर्षणजी कहते हैं – वैवस्वत मनु के नौ पुत्र उन्हीं के समान हुए; उनके नाम इस प्रकार हैं-इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रांशु, अरिष्ट, करूष, तथा पृषघ्र। एक समय की बात है, प्रजापति मनु पुत्र की इच्छा से मैत्रावरुण्याग कर रहे थे। उस समय तक उन्हें कोई पुत्र नहीं हुआ था। उस यज्ञ में मनु ने मित्रावरुण के अंश की आहुति डाली। उसमे से दिव्य रूपवाली इला नाम की कन्या उत्पन्न हुयी। महाराज मनु ने उसे ‘इला’ कहकर सम्भोधित किया और कहा – ‘कल्याणी! तुम मेरे पास आओ।’ तब इला ने पुत्र की इच्छा रहने वाले प्रजापति मनु से यह धर्मयुक्त वचन कहा – ‘महाराज! मैं मित्रावरुण के अंश से पैदा हुयी हूँ, अतः पहले उन्हीं के पास जाऊंगी। आप मेरे धर्म में बढ़ा न डालिये।’ यों कहकर वह सुंदरी कन्या मित्रावरुण के समीप गयी और हाथ जोड़कर बोली-‘भगवन! मैं आप दोनों के अंश से उत्पन्न हुयी हूँ। आप लोगों की किस आज्ञा का पालन करूँ। मनु ने मुझे अपने पास बुलाया है।’

मित्रावरुण बोले – सुंदरी! तुम्हारे इस धर्म, विनय, इन्द्रिय संयम और सत्य से हम लोग प्रसन्न है। महाभागे! तुम हम दोनों की कन्या के रूप में प्रसिद्द होगी तथा तुम्हीं मनु के वंश का विस्तार करने वाला पुत्र हो जाओगी। उस समय तीनों लोकों में सुद्युम्न के नाम से तुम्हारी ख्याति होगी।

यह सुनकर वह पिता के समीप से लौट पड़ी। मार्ग में उसकी बुद्ध से भेंट हो गयी। बुद्ध ने उसे मैथुन के लिए आमंत्रित किया। उनके वीर्य से उसने पुरूरवा को जन्म दिया। तत्पश्चात वह सद्युम्न के रूप में परिणत हो गयी। सुद्युम्न के तीन बड़े धर्मात्मा पुत्र हुए – उत्कल, गय और विंताश्व। उत्कल की राजधानी उत्कला (उड़ीसा) हुयी। विनताश्व को पश्चिम दिशा का राज्य मिला तथा गय पूर्व दिशा के राजा हुए। उनकी राजधानी गया के नाम से प्रसिद्द हुयी। जब मनु भगवान् सूर्य के तेज में प्रवेश करने लगे, तब उन्होंने अपने राज्य को दस भागों में बाँट दिया। सुद्युम्न के बाद उनके पुत्रों में इक्ष्वाकु सबसे बड़े थे, इसलिए उन्हें मध्यदेश का राज्य मिला। सुद्युम्न कन्या के रूप में उत्पन्न हुए थे, इसलिए उन्हें राज्य का भाग नहीं मिला। फिर वसिष्ठ जी के कहने से प्रतिष्ठानपुर में उनकी स्थिति हुयी। प्रतिष्ठानपुर का राज्य पाकर महायशस्वी सुद्युम्न ने उसे पुरूरवा को दे दिया। मनु-कुमार सुद्युम्न क्रमशः स्त्री और पुरुष दोनों के लक्षणों से युक्त हुए, इसीलिए इला और सुद्युम्न दोनों नामों से उनकी प्रसिद्धि हुयी। नरिष्यन्त के पुत्र शक हुए। नाभाग के राजा अंबरीष हुए। धृष्ट से धार्ष्टक नाम वाले क्षत्रियों की उत्पत्ति हुयी, जो युद्ध में उन्मत्त होकर लड़ते थे। करूष के पुत्र कारुष नाम से विख्यात हुए। वे भी रणोन्मत्त थे। प्रांशु के एक ही पुत्र थे, जो प्रजापति के नाम से प्रकट हुए। शर्याति के दो जुड़वीं संताने हुयी। उनमे अनर्त नाम से प्रसिद्द पुत्र तथा सुकन्या नाम वाली कन्या थी। यही सुकन्या महर्षि च्यवन की पत्नी हुयी। अनर्त के पुत्र का नाम रैव था। उन्हें अनर्त देश का राज्य मिला। उनकी राजधानी कुशस्थली (द्वारिका) हुयी। रैव के पुत्र रैवत हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे। उनका दूसरा नाम ककुद्मी था। अपने पिता के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण उन्हें कुशस्थली का राज्य मिला। एक बार वे अपनी कन्या को साथ ले ब्रह्मा जी के पास गए और वहाँ गन्धर्वों के गीत सुनते हुए दो घडी ठहरे रहे। इतने में ही समय में मानवलोक में अनेक युग बीत गए। रैवत जब वहाँ से लौटे, तब अपनी राजधानी कुशस्थली में आए, परन्तु अब वहाँ यादवों का अधिकार हो गया था। यदुवंशियों ने उसका नाम बदल कर द्वारवती रख दिया था। उसमें बहुत से द्वार बने थे। वह पुरी बड़ी मनोहर दिखायी देती थी। भोज, वृष्णि और अंधक वंश के वासुदेव आदि यादव उसकी रक्षा करते थे। रैवत ने वहाँ का सब वृत्तांत ठीक-ठीक जानकार अपनी रेवती नाम की कन्या बलदेव जी को ब्याह दी और स्वयं मेरुपर्वत के शिखर पर जाकर वे तपस्या में लग गए। धर्मात्मा बलराम जी रेवती के साथ सुखपूर्वक विहार करने लगे।

पृषघ्र ने अपने गुरु की गाय का वध किया था, इसलिए वे शाप से शुद्र हो गए। इस प्रकार ये वैवस्वत मनु के नौ पुत्र बताये गए है। मनु जब छींक रहे थे, उस समय इक्ष्वाकु की उत्पत्ति हुयी थी। इक्ष्वाकु के सौ पुत्र हुए। उनमे विकुक्षि सबसे बड़े थे। वे अपने पराक्रम के कारण अयोध्य नाम से प्रसिद्द हुए। उन्हें अयोध्या का राज्य प्राप्त हुआ। उनके शकुनि आदि पांच सौ पुत्र हुए, जो अत्यंत बलवान और उत्तर-भारत के रक्षक थे। उनमें से वशती आदि अट्ठावन राजपुत्र दक्षिण दिशा के पालक हुए। विकुक्षि का दूसरा नाम शशाद था। इक्ष्वाकु के मरने पर वे ही राजा हुए। शशाद के पुत्र ककुत्स्थ के अनेना, अनेना के पृथु, पृथु के विष्टराश्व, विष्टराशव के आर्द्र, आर्द्र के युवनाश्व और युवनाश्व के पुत्र श्रावस्त हुए। उन्होंने ही श्रावस्तीपूरी बसायी थी। श्रावस्त के पुत्र बृहदश्व और उनके पुत्र कुवलाश्व हुए। ये बड़े धर्मात्मा राजा थे। इन्होने धुन्धु नामक दैत्य का वध करने के कारण धुन्धुमार नाम से प्रसिद्धि प्राप्त की।

मुनि बोले – महाप्राज्ञ सूतजी! हम धुन्धुवद्ध का वृतांत ठीक-ठीक सुनना चाहते हैं।, जिससे कुवलाश्व का नाम धुन्धुमार हो गया।

कुवलाश्व के सौ पुत्र थे। वे सभी अच्छे धनुर्धर, विद्याओं में प्रवीण, बलवान और दुर्धर्ष थे। सबकी धर्म में निष्ठां थी। सभी यज्ञकर्ता तथा प्रचुर दक्षिणा वाले थे। राजा बृहदश्व ने कुवलाश्व को राजपद पर अभिषिक्त किया और स्वयं वैन में तपस्या करने के लिए जाने लगे। उन्हें जाता डेक ब्रह्मर्षि उत्तंक ने रोका और इस प्रकार कहा – ‘राजन! आपका कर्तव्य है प्रजा की रक्षा, अतः वही कीजिये। मेरे आश्रम के समीप मधु नामक राक्षस पुत्र महान असुर धुन्धु रहता है। वह सम्पूर्ण लोकों का संहार करने के लिए कठोर तपस्या करता और बालू के भीतर सोता है। वर्ष भर में एक बार वह बड़े जोर से सांस छोड़ता है। उस समय वहाँ की पृथ्वी डोले लगती है। उसके श्वास की हवा से बड़े जोर की धुल उड़ती है और सूर्य का मार्ग ढक लेती है। लगातार सात दिनों तक भूकम्प होता रहता है। इसलिए अब मैं अपने उस आश्रम में नहीं रह सकता। आप समस्त लोकों के हित की इच्छा से उस विशालकाय दैत्य को मार डालिये। उसके मरे जाने पर सब सुखी हो जायेगें।

बृहदश्व बोले -भगवन!मैंने तो अब अस्त्र शास्त्रों का त्याग कर दिया है। यह मेरा पुत्र है। यही धुन्धु का वध करेगा।

राजर्षि बृहदश्व अपने पुत्र कुलाश्व को धुन्धु के वध की आज्ञा दे स्वयं पर्वत के समीप चले गए। कुवलाश्व अपने सब पुत्रों को साथ ले धुन्धु को मारने चले। साथ में महर्षि उत्तंक भी थे। उत्तंक के अनुरोध से समपूर्ण लोकों का हित करने के लिए साक्षात् भगवान् विष्णु ने कुवलाश्व के शरीर में अपना तेज प्रविष्ट किया। दुर्धर्ष कुवलाश्व जब युद्ध के लिए प्रस्थित हुए, तब देवताओं का यह महान शब्द गूंज उठा – ‘ये श्रीमान नरेश अवध्य हैं। इनके हाथ से आज धुन्धु अवश्य मारा जायेगा।’ पुत्रों के साथ वहाँ जाकर वीरवर कुवलाश्व ने समुद्र को खुदवाया खोदने वाले राजकुमारों ने बालू के भीतर धुन्धु का पता लगा लिया। वह पश्चिम दिशा को घेरकर पड़ा था। वह अपने मुख की आग से सम्पूर्ण लोकों का संहार- सा करता हुआ जलो का स्त्रोत बहाने लगा। जैसे चंद्रमा के उदयकाल में समुद्र में ज्वार आता है, उसकी उत्ताल तरंगे बढ़ने लगती है, उसी प्रकार वहाँ जल का वेग बढ़ने लगा। कुवलाश्व के पुत्रों में से तीन को छोड़कर शेष सभी धुन्धु की मुखाग्नि से जलकर भस्म हो गए। तदनन्तर महातेजस्वी रजा कुवलाश्व ने उस महाबली धुन्धु पर आक्रमण किया। वे योगी थे; इसलिए उन्होंने योग शक्ति के द्वारा वेग से प्रवाहित होने वाले जल को पी लिया और आग को भी बुझा दिया। फिर बलपूर्वक उस महाकाय जलचर राक्षस को मारकर महर्षि उत्तंक का दर्शन किया। उत्तंक ने उन महात्मा राजा को वर दिया कि ‘तुम्हारा धन अक्षय होगा और शत्रु तुम्हें पराजित न कर सकेंगे। धर्म में सदा तुमारा प्रेम बना रहेगा तथा अंत में स्वर्गलोक का अक्षय निवास प्राप्त होगा। युद्ध में तुम्हारे जो पुत्र राक्षस द्वारा मारे गए है, उन्हें भी स्वर्ग में अक्षयलोक प्राप्त होंगे।’

धुन्धुमार के जो तीन पुत्र युद्ध से जीवित बच गए थे, उनमे दृढाश्व सबसे ज्येष्ठ थे और चंद्राश्व तथा कपिलाश्व उनके छोटे भाई थे। दृढाश्व के पुत्र का नाम हर्यश्व था। हर्यश्व का पुत्र निकुम्भ हुआ, जो सदा क्षत्रिय धर्म में तत्पर रहता था। निकुम्भ का युद्ध विशारद पुत्र संहताश्व के दो पुत्र हुए – अकृशाश्व और कृशाश्व। उसके हेमवती नाम की कन्या थी, जो आगे चल कर दृषद्वती के नाम से प्रसिद्द हुयी। उसका पुत्र प्रसेनजित हुआ, जो तीनों लोकों में विख्यात था। प्रसेनजित ने गौरी नाम वाली पतिव्रता स्त्री से ब्याह किया था, जो बाद में पति के शाप से बाहुदा नाम की नदी हो गयी। प्रसेनजित के पुत्र रजा युवनाश्व हुए, युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए। वे त्रिभुवन विजयी थे। शशबिन्दु की सुशीला कन्या चैत्ररथि, जिसका दूसरा नाम बिन्दुमती भी था, मान्धाता की पत्नी हुयी। इस भूतल पर उसके सामान रूपवती स्त्री दूसरी नहीं थी। बिन्दुमती बड़ी पतिव्रता थी। वह दस हजार भाइयों की ज्येष्ठ भगिनी थी। मान्धाता ने उसके गर्भ से धर्मज्ञ पुरुकुत्स और राजा मुचुकुन्द – ये दो पुत्र उत्पन्न किये। पुरुकुत्स के उनकी स्त्री नारदा के गर्भ से राजा त्रसदस्यु उत्पन्न हुए, उनसे सम्भूत का जन्म हुआ। सम्भूत के पुत्र शत्रुदमन त्रिधन्वा हुए। राजा त्रिधनवा से विद्वान त्र्य्यारुण हुए। उनका पुत्र महाबली सत्यव्रत हुआ। उसकी बुद्धि बड़ी खोटी थी। उसने वैवाहिक मन्त्रों में विघ्न डाल कर दूसरे की पत्नी का अपहरण कर लिया था। बालस्वभाव, कामासक्ति, मोह, साहस और चंचलतावश उसने ऐसा कुकर्म किया था। जिसका अपहरण हुआ था, वह उसके किसी पुरवासी की ही कन्या थी। इस अधर्मरूपी शङ्कु (कांटे) के कारण कुपित होकर त्रय्यारुण ने अपने उस पुत्र को त्याग दिया। उस समय उसने पूछा – ‘पिताजी! आपके त्याग देने पर मैं कहाँ जाऊँ?’ पिता ने कहा -‘ओ कुलकलंक! जा, चाण्डालों के साथ रह। मुझे तेरे जैसे पुत्र की आवश्यकता नहीं है।’ यह सुनकर वह पिता के कथनानुसार नगर से बाहर निकल गया। उस समय महर्षि वशिष्ठ ने उसे मना नहीं किया। वह सत्यव्रत चंडाल के घर के पास रहने लगा। उसके पिता भी वन में चले गए। तदनन्तर उसी अधर्म के कारण इंद्र ने उस राज्य में वर्षा बंद कर दी। महातपस्वी विश्वामित्र उसी राज्य में अपनी पत्नी को रखकर स्वयं समुद्र के निकट भारी तपस्या कर रहे थे। उनकी पत्नी ने अकालग्रस्त हो अपने मझले औरस पुत्र के गले में रस्सी डाल दी और शेष परिवार के भरण-पोषण के लिए सौ गायें लेकर उसे बेच दिया। राजकुमार सत्यव्रत ने देखा कि विक्रय के लिए इसके गले में रस्सी बंधी हुयी है; तब उस धर्मात्मा में दया करके महर्षि विश्वामित्र के उस पुत्र को छुड़ा लिया और स्वयं ही उसका भरणपोषण करने लगे। ऐसा करने में उनका उद्देश्य था महर्षि विश्वामित्र को संतुष्ट करके उनकी कृपा प्राप्त करना। महर्षि का वह पुत्र गले में बंधन पड़ने के कारण महातपस्वी गालव के नाम से प्रसिद्द हुआ।

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