पुराण

यदि आपको पाँच-दस हजार साल का ही लेखा-जोखा लिखना हो और वह भी सिर्फ राजाओं की बेवकूफियाँ तो कोई दिक्कत वाली बात नहीं लेकिन यदि आपको लाखों सालों को कुछ ही पन्नों पर समेटना हो और वह भी इस तरह कि कोई भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम छूट न जाए तो निश्चित ही यह आपके लिए कठिन कार्य होगा।

पुराण का अर्थ होता है सबसे पुरातन या प्राचीन। पुराण में हजारों नहीं लाखों साल की परम्परा, इतिहास, संस्कृति और वैदिक ज्ञान को समेटने का प्रयास किया गया। शैव पंथियों ने शिव को आधार बनाकर, वैष्णव पंथियों ने विष्णु को आधार बनाकर, शाक्तों ने शक्ति को आधार बनाकर, एकेश्वरवादियों ने निराकार ईश्वर को आधार बनाकर और कृष्ण भक्तों ने कृष्ण को आधार बनाकर सृष्टि उत्पत्ति, मानव इतिहास, परम्परा, धर्म और दर्शन का विस्तार किया। इसीलिए सब कुछ भ्रमपूर्ण या कहें कि होच-पोच लगता है। फिर भी वेद व्यास कहते हैं कि जहाँ ऐसा लगता है वहाँ वेद की बातों को ही प्रमाण मानना चाहिए।

वेदों और पुराणों के हजारों पन्ने तो काल-कवलित हो गए हैं और जितने पन्ने समय खा गया उससे कहीं अधिक तो श्रुति और स्मृति की बातें विस्मृत हो गई हैं, फिर भी जो बचा है उसे जब संग्रहित किया गया तो निश्चित ही वह क्रमबद्ध नहीं रहा सब कुछ होच-पोच था। परंतु इतने के ही अर्थ निकाल लिए तो जो छूट गया है उसे इतने से ही पकड़ा जा सकता है।

आज के पाश्चात्य नजरिए से प्रभावित लोगों को पुराण की कोई समझ नहीं है। आज हवा का रुख है इतिहास की ओर। लोग यह नहीं जानते कि जीवन रहस्यमय है जिसकी परतों पर परतें हैं। यदि वर्तमान धार्मिकों के पास थोड़ी-सी वैज्ञानिक समझ होती तो वे पुराण में छिपे इतिहास और विज्ञान को पकड़ना जानते। लेकिन पोथी-पंडितों को कथाएँ बाँचने से फुरसत मिले तब तो कहीं वे पुराण को इतिहास करने में लगेंगे। तब तो कहीं उन पर शोध किया जाएगा।

पुराण का अर्थ है इतिहास का सार, निचोड़ और इतिहास का अर्थ है जो घटनाक्रम हुआ उसका तथ्‍यपरक विस्तृत ब्योरा। जरूरत है कि हम पुराण की कथाओं को समझें और उन्हें इतिहास अनुसार लिखें। कब तक पुराण की कथाओं को उसी रूप में सुनाया जाएगा जिस रूप में वे काल्पनिक लगती हैं। जरूरत है कि उसके आसपास जमी धूल को झाड़ा जाए।

पुराणों के नाम : अग्नि, भागवत, भविष्य, ब्रह्म, ब्रह्मांड, गरुड़, कूर्म, लिंग, मार्कंडेय, मत्स्य, नारद, पद्म, शिव, स्कंद, ब्रह्मवैवर्त, वामन, वराह, और विष्णु। उक्त अट्ठारह के अट्ठारह ही उप-पुराण हैं।

अनिरुद्ध जोशी ‘शतायु’

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