रामेश्वरम

हिन्दुओं के चार सर्व प्रमुख तीर्थों मे से एक रामेश्वर धाम मन्दिर तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले के एक समुद्री द्वीप मे स्थित है। यह द्वीप एक रेल पुल द्वारा मुख्य भूमि से जुडा हुआ है। हिन्दुओं का विश्वास है कि इस स्थान पर भगवान राम ने लंका पर चढाई करने से पूर्व शिवलिंग स्थापित कर पूजा की थी। रामायण महाकाव्य मे इस स्थान का नाम ‘गंध मार्दन पर्वत’ मिलता है। इसे दक्षिण भारतीय वास्तु शैली का प्रतिनिधि शिव मन्दिर भी कहा जाता है। मूल रूप से ग्यारहवीं बारहवीं शताब्दी मे निर्मित इस मन्दिर के अन्तराल के चारों कोनों मे नन्दी मूर्तीया स्थापित है।

इस मन्दिर मे रक्षाभित्तियों के पांच घेरे एवं चार गोपुर हैं। परन्तु रामेश्वर मन्दिर की सबसे बडी विशेषता इसकी स्तंभ युक्त लम्बी वीथियां है, जो न केवल उसे घेरती है, वरन उसके अन्दर पहुंचने का मार्ग भी बनाती है। इन विधियों की लम्बाई का कुल योग 915 मीटर से अधिक है। विथियों के दोनों ओर के स्तंभ सुन्दर अनुपातों व स्मृद्ध नक्काशी से युक्त हैं। इन्हें बहुत पास-पास लगाया गया है। स्तंभो की लम्बाई 3.65 मीटर है तथा ये 1.5 मीटर ऊंची, गढतों से युक्त आधार भित्ति पर खडे किये गये हैं। इस प्रकार प्रत्येक दिशा मे स्तंभ पंक्तियो का अन्तहीन विस्तार पडता है। उत्तर दक्षिण दिशाओं मे यह विशेष रूप से प्रभावशाली है, यहां यह एक ही दिशा मे 214 मीटर तक चला गया है। इस मन्दिर का आज दृष्टिगत अधिकांश भाग एक ही समय मे बना, यद्यपि इसे बारहवीं शताब्दी मे निर्मित प्राचीन मन्दिर भूमि पर बनाया गया है। मन्दिर की पूर्वी दिशा मे निर्मित गोपुर अत्यन्त ललित्यपूर्ण है। यह ग्यारह मन्जिल या 45.80 मीटर ऊँचा है।

एक ऐसा अनूठा ऐतिहासिक शिव मंदिर, जहां पर मौजूद है स्वंय भू शिवलिंग तथा जहां पर स्वंय भगवान श्रीराम ने अपने भाईयों के साथ लंका की ओर प्रस्थान करते वक्त इस शिवलिंग की पूजा कर आर्शीवाद प्राप्त किया, इतना ही नहीं इस स्थान पर गंगा रूपी जलधारा भी मौजूद है।

जी हां यह अद्भुत मंदिर है सिरोही जिले के मोरस गांव में तथा इस शिव मंदिर का नाम है रामेश्वर धाम मंदिर।

– अरावली की सुरम्य पहाडियों के बीच घनघोर जंगल में स्थित है रामेश्वर धाम मंदिर , जहां पर स्वंय भू शिवलिंग मौजूद है। दंत कथा है कि जब भगवान राम अपने भाईयों के साथ लंका की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब रास्तें में उन्होंने यहां कुछ समय के लिए विश्राम किया था तथा इस शिवमंदिर में शिवलिंग की पूजा कर आर्शाीवाद प्राप्त किया था, तभी से यह रामेश्वर धाम मंदिर के नाम से पहचाना जाता हैं।

वहीं इस मंदिर में अदभुत विशेषता यह है कि यहां गंगा रूपी जलधारा मौजूद हैं तथा भक्त इस धारा को गंगा मानकर इसकी पूजा भी करते है। यह जलधारा पूरे वर्ष भर इसी तरह अनवरत रूप से जारी रहती है तथा अकाल के समय भी यहां इस धारा का जल कभी नहीं सूखता है। आज तक इस धारा के स्त्रोत का यहां किसी को भी पता नहीं लग सका हैं।
यहां मंदिर में राजस्थान के अलावा अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पंहुचते है। भक्तों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी हर इच्छा यहां पूरी होती है। सावन मास में यहां अनेक श्रद्धालू महीने भर तक यहां रूककर पूजा अर्चना करते है।

इस ऐतिहासिक शिव मंदिर में देशभर के श्रद्धालू यहां दर्शन करने के लिए पंहुचते है। इस मंदिर से श्रद्धालूओं की गहरी आस्था जुडी होने के कारण यहां वर्षभर मेला जैसा माहौल बना रहता हैे तथा सावन में यहां श्रद्धालुओं की संख्या ओर अधिक हो जाती है।

काशी के बाद अगर कोई दर्शन पात्र स्थान है तो वो रामेश्वर मंदिर है. यह स्थान रामायण के अंश का परिचय कराता है. राम-रावण युद्ध के बाद जब राम ने रावण का वध किया तो श्रीराम पर ब्राहमण वध का आरोप लगने लगे. उनकी सलाह के अनुसार इस पाप को धोने के लिए श्रीराम ने यहाँ पर शिव की पूजा करने का निर्णय लिया था. लेकिन रेत से लिंग कैसे बने इस दुविधा के लिए उन्होंने हनुमान को कैलाश पर्वत (हिमालय) से शिवलिंग लाने को कहा. जब हनुमान के लिंग लाने में देर हुई तो सीता जी ने रेत का लिंग बना दिया और राम जी ने उसकी आराधना की. हनुमान जब वापस आए तो ग़ुस्सा हुए, समझाने के लिए श्रीराम ने पुराने लिंग के स्थान पर हनुमान द्वारा लाए लिंग को लगाने को कहा. हनुमान के लाख प्रयास करने के बाद भी लिंग न हिला. इसलिए श्रीराम ने ये विधि स्थापित की कि पहले इस (रेत के) लिंग की पूजा होगी तब जाकर कैलाश पर्वत वाले लिंग की. इसके बाद से ऐसा ही होता आ रहा माना जाता है. कहते हैं,हनुमानजी ने इसी पर्वत से समुद्र को लांघने के लिए छलांग मारी थी. बाद में राम ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए यहीं पर विशाल सेना संगठित की थी. इस पर्वत पर एक सुंदर मंदिर बना हुआ है. यहा हर वर्ष करोड़ो लोग दर्शन करने आते है और अपना जीवन सफल करते है.

रामेश्वरम् दक्षिण भारत के तट पर स्थित एक द्वीप-शहर है. रामेश्वरम् मद्रास से 600 किमी दक्षिण में है. रामेश्वरम् एक सुन्दर टापू भी है. हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी इसको चारों ओर से घेरे हुए है. यहाँ पर रामायण से संबंधित अन्य धार्मिक स्थल भी हैं. यह तमिळनाडु के रामनाथपुरम ज़िले का तीसरा सबसे बड़ा शहर है जिसकी देखरेख १९९४ में स्थापित नगरपालिका करती है. पौराणिक कथाओं के अतिरिक्त यहाँ पर श्रीलंका के जाफ़ना के राजा, चोळ और अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर की भी उपस्थिति रही है.

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