सोमनाथ मन्दिर

धरती का सबसे पहला ज्योतिर्लिंग सौराष्ट्र में काठियावाड़ नाम की जगह पर स्थित है. इस मंदिर में जो सोमनाथ देव हैं उनकी पूजा पंचामृत से की जाती है.
पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष की 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से हुआ था,मगर चंद्रमा उनमें से केवल रोहिणी पर ही आसक्त था. इससे नाराज होकर दक्ष ने उसे श्राप दे दिया कि जिस आभामंडल पर उसे इतना घमंड है, वह उसके पास रहेगा ही नहीं। चंद्रमा ने इस श्राप से मुक्त होने के लिए रोहिणी के साथ इसी स्थान पर शिव को प्रसन्न करने के लिए स्पर्श लिंग की पूजा की थी.
शिव पुराण में कथा है कि जब शिव सोमनाथ के रूप में यहां निवास करने लगे तो देवताओं ने यहां एक कुंड की स्थापना की। उस कुंड का नाम रखा गया सोमनाथ कुंड.
कहते हैं कि कुंड में भगवान शिव और ब्रह्मा का साक्षात निवास है। इसलिये जो भी उस कुंड मे स्नान करता है उसके सारे पाप धुल जाते हैं। असाध्य से असाध्य रोग भी कुंड मे स्नान करने के बाद खत्म हो जाते हैं। शिव पुराण मे यह भी वर्णित है कि अगर किसी वजह से आप सोमनाथ के दर्शन नही कर पाते है तो सोमनाथ की उत्पत्ति की कथा सुनकर भी वही पौराणिक लाभ उठा सकते है। यह तीर्थ बारह ज्योतिर्लिंगो मे सबसे अधिक मह्त्वपूर्ण है।

पौराणिक कथा के अनुसार इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव सोमराज ने किया था। भगवान ब्रह्मा के पुत्र “दक्ष” थे और दक्ष की 27 पुत्रियां थी। उनका विवाह सोमराज के साथ हुआ था। महाराज दक्ष की पुत्रियों ने उनसे शिकायत की चन्द्रदेव सिर्फ रोहिनी को ही स्नेह करते है बाकि किसी पर भी ध्यान नही देते।

इस बात पर क्रोधित होकर राजा दक्ष ने चन्द्रदेव को श्राप दे दिया कि वह कान्तिहीन हो जाये। जब सच मे चन्द्रदेव का भास धुमिल होने लगा तब उनकी पुत्रियों ने उनका श्राप वापस लेने की अपने पिता से प्रार्थना की तो उन्होने कहा कि सरस्वती के मुहाने पर समुद्र मे स्नान करने से श्राप के प्रकोप को रोका जा सकता है। तब सोमराज ने सरस्वती के मुहाने पर स्थित सिंधु सागर मे स्नान करके भगवान शिव की आराधना की। जिस से प्रभु शिव ने यहाँ उपस्थित होकर उनका उद्धार किया।

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