मेंहदीपुर के बालाजी

मेंहदीपुर के बालाजी –
हनुमान कलियुग के प्रत्यक्ष देवता हैं। ये कष्ट हरने वाले हैं। और समस्त सुखों को देने वाले भी हैं। यह स्थान बालाजी मोड से 3 किलोमीटर, डीसा रेलवे स्टेशन से 42 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां आने के लिये मथुरा, भरतपुर, अलवर से बस का निरंतर साधन है व सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन डीसा है। जयपुर से 109किमी व भरतपुर से 82 किमी की दूरी पर मेंहदीपुर के बालाजी नामक मन्दिर स्थित है।

मेहंदीपुर मे हनुमान जी के बाल रूप की अर्चना उपासना की जाती है। बालाजी के दरबार मे आकर प्रसाद के रूप मे अर्जी करते ही रोगी व्यक्ति चाहे वह कैसी भी बाहरी बाधा से पीडित क्यों न हो, का उपचार आरम्भ हो जाता है। और हवा से पीडित व्यक्ति दोषमुक्त हो जाता है।

जैसे इस स्थान पर आकर उपरी हवा से पीडित व्यक्ति ठीक हो जाता है, उसी प्रकार बालाजी के भक्तो पर भी इनकी असीम कृपा बनी रहती है। यहां बालाजी के भक्त अपनी मनोकामना की पूर्ती के लिये धागा बांधते है और मनोकामना पूरी होने पर वापिस आकर धागा खोल देते हैं। बहुत से भक्त यहां सर्वकामनाप्रद प्रतिष्ठित देवता की भक्ति भाव से नियमित आराधना- उपासना के लिये आते हैं। और गृहस्थ का सुख भोगते हुये खुशी से निर्वाह करते हैं।

कलियुग मे ये देव ही भक्तजनों की सहज आराधना से अतिप्रसन्न हो, उनके मनोरथों को पूर्ण करने मे सक्षम हैं।

भूत -प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहां आने वालो का तांता लगा रहता है। तंत्र-मंत्रादि, ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति भी यहां पर बिना किसी दवा-दारू और तंत्र क्रिया के स्वस्थ होकर लौटते हैं। सम्पूर्ण भारत से आने वाले बहुत से रोगी यहां नित्य ही डेरा डाले रहते हैं।

बालाजी का मंदिर मेंहदीपुर नामक स्थान पर दो पहाडियों के बीच स्थित है, इसलिये इन्हें घाटी वाले बाबा के नाम से भी पुकारा जाता है। इस मन्दिर मे स्थित बजरंग बली की बालरूप मूर्ती किसी कलाकार ने नही बनाई, बल्कि यह स्वयंभू है। यह मूर्ती पहाड के अखंड भाग के रूप मे मंदिर की पिछली दिवार का कार्य करती है। इस मूर्ती को प्रधान मानते हुये ही बाकी मन्दिर का निर्माण कराया गया है। इस मूर्ती के सीने के बाई ओर एक अत्यन्त सूक्ष्म छिद्र है, जहां से निरंतर जला धारा बह रही है। यह जल बालाजी के चरणों तले स्थित एक कुण्ड मे एकत्रित होता रहता है, जिसे भक्त चरणामृत के रूप मे अपने साथ ले जाते हैं।

यह बालाजी की मूर्ती लगभग हजारों वर्ष पुरानी बताई जाती है, किन्तु मन्दिर का निर्माण इसी सदी मे हुआ। मुस्लिम शासनकाल मे कुछ बादशाहों ने इस मूर्ती को नष्ट करने का बहुत प्रयत्न किया। लेकिन वे असफ़ल रहे। वे इसे जितना खुदवाते गये, मूर्ति की जड गहरी होती गई।

कहा जाता है सन 1920 मे बालाजी ने अपना प्राचीन चोला छोड दिया था। जिसे गंगा मे प्रवाहित करने जाने के लिये भक्त जब मंडावर रेलवे स्टेशन पर पहुंचे, तो ब्रिटिश अधिकारी रेलवे स्टेशन ने उसे सामान कहकर भाडा करने के लिये वजन करने को कहा। लेकिन बालाजी के चमत्कार से उस चोले का वजन न हो पाया। कभी बाट रखने से कभी वजन बढ जाता था तो कभी कम हो जाता था। असमंजस मे पडे स्टेशन मास्टर ने आखिर बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया और चोला निःशुल्क जाने दिया।

बालाजी महाराज के अलावा यहां श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान (भैरव) की मूर्तीयां भी हैं। प्रेतराज सरकार जहां दंडाधिकारी पद पर आसीन हैं, वहीं भैरवजी कोतवाल के पद पर।

यहां आने पर ही सामान्यजन को पता चलता है कि भूत-प्रेतादि किस प्रकार मनुष्य को कष्ट पहुंचाते हैं और यहां किस प्रकार मनुष्य को कष्ट पहुंचाते है और किस तरह इस स्थान पर पहुंच कर उन्हे मुक्ति मिल जाती है। दुःखी कष्टग्रस्त व्यक्ति को मंदिर पहुंचकर तीनों देवगण को प्रसाद चढाना होता है। यहां बालाजी को लड्डू, प्रेतराज सरकार को चावल और भैरव को उडद का प्रसाद लगाया जाता है। इस प्रसाद मे से दो लड्डू रोगी को खिला कर शेष पशु-पक्षियों को डाल दिया जाता है। ऎसा कहा जाता है कि पशु-पक्षी देवताओं के दूत के रूप मे इस प्रसाद को ग्रहण करते है।

बालाजी मन्दिर मे प्रातः और सायं 4-4 घंटे पूजा, भजन व आरती होती है। इस दौरान रोग से ग्रस्त प्राणी झूमता है, रोता-चीखता है, उलट-पलट होता है और विभिन्न प्रकार के कष्टों को भोगते हुये अपने कर्मों की माफ़ी मांगता है।

प्रेतराज सरकार

बालाजी मन्दिर परिसर मे ही प्रेतराज सरकार दंडाधिकारी पद पर आसीन है। प्रेतराज सरकार के विग्रह पर भी चोला चढाया जाता है। प्रेतराज सरकार को दुष्ट और भटकी आत्माओं को दंड देने वाले देवता के रूप मे पूजा जाता है। भक्तिभाव से आरती, भजन व पूजा की जाती है।

बालाजी के सहायक देवता के रूप मे ही प्रेतराज सरकार की आराधना की जाती है। पृथक रूप मे अन्य किसी स्थान पर भी इनकी पूजा-अर्चना के लिये मंदिर नही है। वेद, पुरांण आदि मे भी इनका कोई उल्लेख नही है। प्रेतराज श्रद्धा और भावना के देवता हैं। यहा आने पर नास्तिक भी आस्तिक होने को मजबूर हो जाता है। और बालाजी की कृपा पाकर स्वयं को धन्य मानने लगता है। प्रेतराज सरकार को चावल या बुंदी के लड्डू का भोग लगाया जाता है। जो यहां सहर्ष स्वीकार होता है।

कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव

कोतवाल कप्तान भगवान शिव के ही अवतार माने जाते हैं। लेकिन जहां भोले शंकर को प्रसन्न करने मे जीवन बीत जाते है वहीं इस रूप में थोडी से पूजा-अर्चना से ही भक्त मनवांछित फ़लों को प्राप्त कर लेते हैं। भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं। उनके हाथ मे त्रिशूल, डमरू, खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पांचवा कटा शीश रहता है। वे कमर मे बाघांबर नहीं लाल रंग के वस्त्र धारण करते हैं। भस्म लपेटते है। पूजा-अर्चना मे उनकी मूर्ती पर चमेली के सुगंध युक्त तिल का तेल में सिंधूर घोलकर चोला चढाया जाता है।

शास्त्र और लोककथाओं मे भैरव देव के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें एक दर्जन रूप प्रमाणिक है। श्री बाल भैरव, श्री बटुक भैरव, भैरव देव के बाल रूप हैं। भक्तजन सब रूपों मे इन देव की विभिन्न प्रकार से आराधना करते है। शास्त्र मे इन देव के समाप्य के लिये आराधना के बहुत से मार्ग प्रशस्त बताये हैं। भैरव देव के अन्य रूपों मे संहार भैरव, असितांग भैरव, चण्ड भैरव, भयंकर भैरव, तथा कपाली भैरव आदि भी शामिल हैं। इनमे स्वर्णाकर्षण भैरव साक्षात लक्ष्मी के समान धन व वैभव देने वाले है। यह देव भी महाकाल के समान ही प्रलयस्वरूप देवता है। इनका निवास स्थान भी महाकाल की भांति शमशान है। भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं। इन्हें ‘कोतवाल कप्तान’ भी कहा जाता है। भक्त बालाजी के साथ-साथ इनके भी भजन व आरती आदि गाते है और खुशी से झूमते-नाचते है।

प्रसाद मे यहां उडद की दाल के बडे और खीर का भोग लगाया जाता है। किन्तु भक्तजन बूंदी के लड्डू भी श्रद्धाभावना से इन देव को चढाते हैं। सामान्य साधक भी यदि भक्तिभाव इन देवताओं की आराधना करता है तो वह भी भूत-प्रेत बाधा को समाप्त करने मे सक्षम हो जाता है। इन देवताओं के दूत ऎसे साधक के सदा साथ रहते हैं और उन्हे उनके कार्य मे मदद करते हैं।

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