तीर्थ

हमारा देश भारत में यूँ तो अनेकों तीर्थ है पर इनमें जो सबसे प्रमुख माने जाते है वो है इक्यावन शक्ति पीठ, बारह ज्योतिर्लिंग, सात सप्तपुरी और चार धाम। आज हम अपनी इस पोस्ट में आपको इन सभी जगहों के बारे में जानकारी देंगे तथा इक्यावन शक्ति पीठों के राज्यवार नाम बताएँगे।

12 ज्योतिर्लिंग :
धरती पर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग माने गए हैं। हिंदू धार्मिक पुराणों के अनुसार इन्हीं 12 जगहों पर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए।

1. सोमनाथ
यह शिवलिंग गुजरात के सौराष्ट्र में स्थापित है।

2. श्री शैल मल्लिकार्जुन
मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित है श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग।

3. महाकाल
उज्जैन में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, जहां शिवजी ने दैत्यों का नाश किया था।

4. ओंकारेश्वर ममलेश्वर
मध्यप्रदेश के धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर वरदान देने यहां प्रकट हुए थे शिवजी। जहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हो गया।

5. नागेश्वर
गुजरात के दारूका वन के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग।

6. बैद्यनाथ
झारखंड के देवघर में बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग।

7. भीमशंकर
महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग।

8. त्र्यंम्बकेश्वर
नासिक (महाराष्ट्र) से 25 किलोमीटर दूर त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग।

9. घुष्मेश्वर
महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग।

10. केदारनाथ
हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग। उत्तराखंड में स्थित है।

11. विश्वनाथ
बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग।

12. रामेश्वरम्‌
त्रिचनापल्ली (मद्रास) समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

7 सप्तपुरी :
सनातन धर्म सात नगरों को बहुत पवित्र मानता है जिन्हें सप्तपुरी कहा जाता है।
1. अयोध्या,
2. मथुरा,
3. हरिद्वार,
4. काशी,
5. कांची,
6. उज्जैन
7. द्वारका

चारधाम
चारधाम की स्थापना आद्य शंकराचार्य ने की। उद्देश्य था उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चार दिशाओं में स्थित इन धामों की यात्रा कर मनुष्य भारत की सांस्कृतिक विरासत को जाने-समझें।

1. बदरीनाथ धाम
कहां है- उत्तर दिशा में हिमालय पर अलकनंदा नदी के पास
प्रतिमा- विष्णु की शालिग्राम शिला से बनी चतुर्भुज मूर्ति। इसके आसपास बाईं ओर उद्धवजी तथा दाईं ओर कुबेर की प्रतिमा।

2. द्वारका धाम
कहां है- पश्चिम दिशा में गुजरात के जामनगर के पास समुद्र तट पर।
प्रतिमा- भगवान श्रीकृष्ण।

3. रामेश्वरम
कहां है- दक्षिण दिशा में तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में समुद्र के बीच रामेश्वर द्वीप
प्रतिमा- शिवलिंग

4. जगन्नाथपुरी
कहां है- पूर्व दिशा में उड़ीसा राज्य के पुरी में।
प्रतिमा- विष्णु की नीलमाधव प्रतिमा जो जगन्नाथ कहलाती है। सुभद्रा और बलभद्र की प्रतिमाएं भी।

51 शक्तिपीठ :
ये देश भर में स्थित देवी के वो मंदिर है जहाँ देवी के शरीर क़े अंग या आभूषण गीरे थे। सबसे ज्यादा शक्ति पीठ बंगाल में है। शक्तिपीठों के बारे में सम्पूर्ण जानकारी आप हमारे पिछले लेख 51 शक्ति पीठ पर प्राप्त कर सकते है।

बंगाल के शक्तिपीठ
1. काली मंदिर – कोलकाता
2. युगाद्या- वर्धमान (बर्दमान)
3. त्रिस्त्रोता- जलपाइगुड़ी
4. बहुला- केतुग्राम
5. वक्त्रेश्वर- दुब्राजपुर
6. नलहटी- नलहटी
7. नन्दीपुर- नन्दीपुर
8. अट्टहास- लाबपुर
9. किरीट- बड़नगर
10. विभाष- मिदनापुर

मध्यप्रदेश के शक्तिपीठ
12. हरसिद्धि- उज्जैन
13. शारदा मंदिर- मेहर
14. ताराचंडी मंदिर- अमरकंटक

तमिलनाडु के शक्तिपीठ
15. शुचि- कन्याकुमारी
16. रत्नावली- अज्ञात
17. भद्रकाली मंदिर- संगमस्थल
18. कामाक्षीदेवी- शिवकांची

बिहार के शक्तिपीठ
19. मिथिला- अज्ञात
20. वैद्यनाथ– बी. देवघर
21. पटनेश्वरी देवी- पटना

उत्तरप्रदेश के शक्तिपीठ
22. चामुण्डा माता- मथुरा
23. विशालाक्षी- मीरघाट
24. ललितादेवी मंदिर- प्रयाग

राजस्थान के शक्तिपीठ
25. सावित्रीदेवी- पुष्कर
26. वैराट- जयपुर

गुजरात के शक्तिपीठ
27. अम्बिक देवी मंदिर- गिरनार
11. भैरव पर्वत- गिरनार

आंध्रप्रदेश के शक्तिपीठ
28. गोदावरीतट- गोदावरी स्टेशन
29. भ्रमराम्बादेवी- श्रीशैल

महाराष्ट्र के शक्तिपीठ
30. करवीर- कोल्हापुर
31. भद्रकाली- नासिक

कश्मीर के शक्तिपीठ
32. श्रीपर्वत- लद्दाख
33. पार्वतीपीठ- अमरनाथ गुफा

पंजाब के शक्तिपीठ
34. विश्वमुखी मंदिर- जालंधर

उड़ीसा के शक्तिपीठ
35. विरजादेवी- पुरी

हिमाचल प्रदेश के शक्तिपीठ
36. ज्वालामुखी शक्तिपीठ- कांगड़ा

असम के शक्तिपीठ
37. कामाख्यादेवी- गुवाहाटी

मेघालय के शक्तिपीठ
38. जयंती- शिलांग

त्रिपुरा के शक्तिपीठ
39. राजराजेश्वरी त्रिपुरासुंदरी- राधाकिशोरपुर

हरियाणा के शक्तिपीठ
40. कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ- कुरुक्षेत्र
41. कालमाधव शक्तिपीठ- अज्ञात

नेपाल के शक्तिपीठ
42. गण्डकी- गण्डकी
43. भगवती गुहेश्वरी- पशुपतिनाथ

पाकिस्तान के शक्तिपीठ
44. हिंगलाजदेवी- हिंगलाज

श्रीलंका के शक्तिपीठ
45. लंका शक्तिपीठ- अज्ञात

तिब्बत के शक्तिपीठ
46. मानस शक्तिपीठ- मानसरोवर

बांगलादेश के शक्तिपीठ
47. यशोर- जैशौर
48. भवानी मंदिर- चटगांव
49. करतोयातट- भवानीपुर
50. उग्रतारा देवी- बारीसाल

51 वीं पंचसागर शक्तिपीठ है। यह कहां स्थित है इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।

इसके अतिरिक्त अनेक तीर्थ भारतवर्ष मे स्थित है जिनका वर्णण निम्न है:-

स्वर्ण मंदिर
स्वर्ण मंदिर या श्री हरमंदिर साहिब जिसे दरबार साहिब भी कहा जाता है सिखों का सबसे पावन धार्मिक स्थल या सबसे प्रमुख गुरुद्वारा है। यह पंजाब के अमृतसर शहर में स्थित है। पूरा अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है। स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। इसे सिखों के पांचवे गुरु अर्जुन देव ने 16वीं शताब्दी में बनवाया था। गुरु अर्जुन सिंह ने आदिग्रंथ पूरा कर इसी गुरुद्वारे में रखवाया था।

अमरनाथ गुफा
अमरनाथ गुफा हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल है जो जम्मू कश्मीर में स्थित है। यह भगवान शिव को समर्पित है। यह गुफा श्रीनगर से 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह गुफा चारों ओर से बर्फ से ढकी है। यह साल के ज्यादातर समय बर्फ से ढकी रहती है सिवाय गर्मियों की एक छोटी सी अवधि के।

मीनाक्षी अम्मां मंदिर
मीनाक्षी अम्मां मन्दिर या केवल मीनाक्षी मन्दिर तमिलनाडु के मदुरई नगर में स्थित एक ऐतिहासिक मन्दिर है। यह हिन्दू देवता शिव और उनकी पत्नी देवी पार्वती को समर्पित है। यह ध्यान योग्य है कि मछली पांड्य राजाओं का राजचिह्न है। यह मन्दिर 2500 वर्ष पुराने मदुरई नगर की जीवनरेखा है।

हजरत ख्वाजा मोईनुद्‍दीन चिश्ती की दरगा
अजमेर शरीफ की दरगाह या हजरत ख्वाजा मोईनुद्‍दीन चिश्ती की दरगाह काफी प्रसिद्ध दरगाह है। माना जाता है कि ख्वाजा की दरगाह से कोई खाली हाथ नहीं लौटता। इस दरगाह में हर धर्म के लोग आते हैं। यह अंतरराष्ट्रीय प्रेम और सौहार्द की मिसाल है।

हजरत ख्वाजा मोईनुद्‍दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह एक सूफ़ी संत थे। उन्होंने १२वीं शताब्दी में अजमेर में चिश्ती परंपरा की स्थापना की। वे मानव-प्रेम व मानव सेवा को ही अपने जीवन का उद्देश्य मानते थे। ५० वर्ष की आयु में ख्वाजा जी ने भारत का रुख किया और बाकी उम्र अजमेर में गुजारी। वे हमेशा से ईश्वर से दुआ करते कि वह उनके सभी भक्तों का दुख-दर्द उन्हें दे दे तथा उनके जीवन को खुशियों से भर दे। एक बार बादशाह अकबर ने दरगाह शरीफ में दुआ मांगी कि उन्हें पुत्र-रत्न प्राप्त होगा तो वे पैदल चलकर जियारत पेश करने आएंगे। सलीम को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के बाद अकबर ने आमेर से अजमेर शरीफ तक की यात्रा नंगे पैर चलकर की।

बोध गया
बिहार की राजधानी पटना के दक्षिणपूर्व में लगभग १०० किलोमीटर दूर स्थित बोधगया गया जिले से सटा एक छोटा शहर है। कहते हैं बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे तपस्या कर रहे गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। तभी से यह स्थल बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस स्थल को महाबोधि मंदिर के नाम से जाना जाता है।

हरिद्वार
हिंदू श्रद्धालुओं के लिए हरिद्वार काफी अहम तीर्थ नगरी है। हरिद्वार, हरिद्वार जिला, उत्तराखण्ड, भारत में एक पवित्र नगर है। हिन्दी में, हरिद्वार का अर्थ हरि यानी ईश्वर का द्वार होता है। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है। 3139 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गौमुख (गंगोत्री हिमनद) से 253 किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में गंगा के मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को गंगाद्वार के नाम सा भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ पर गंगा मैदानों में प्रवेश करती हैं।

वाराणसी
वाराणसी को ‘बनारस’ और ‘काशी’ भी कहते हैं। इसे हिन्दू धर्म में सर्वाधिक पवित्र शहर माना जाता है और इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। इसके अलावा बौद्ध एवं जैन धर्म में भी इसे पवित्र माना जाता है। यह संसार के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक और भारत का प्राचीनतम बसा शहर है। काशी नरेश (काशी के महाराजा) वाराणसी शहर के मुख्य सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी धार्मिक क्रिया-कलापों के अभिन्न अंग हैं। वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है। ये शहर सैकड़ों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है।

केदारनाथ मंदिर
केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है। यहां की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्‍थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जन्मेजय ने कराया था। यहां स्थित स्वयंभू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया।

गंगोत्री मंदिर
गंगोत्री गंगा नदी का उद्गम स्थान है। गंगाजी का मंदिर, समुद्र तल से 3042 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। भागीरथी के दाहिने ओर का परिवेश अत्यंत आकर्षक एवं मनोहारी है। यह स्थान उत्तरकाशी से 100 किमी की दूरी पर स्थित है। गंगा मैया के मंदिर का निर्माण गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्वारा 18 वीं शताब्दी की शुरुआत में किया गया था। वर्तमान मंदिर का पुननिर्माण जयपुर के राजघराने द्वारा किया गया था। प्रत्येक वर्ष मई से अक्टूबर के महीनों के बीच पतित पावनी गंगा मैया के दर्शन करने के लिए लाखों श्रद्धालु तीर्थयात्री यहां आते हैं। यमुनोत्री की ही तरह गंगोत्री का पतित पावन मंदिर भी अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर खुलता है और दीपावली के दिन मंदिर के कपाट बंद होते हैं।

गिरनार के मंदिर
गुजरात के जूनागढ़ जिले स्थित पहाड़ियां गिरनार नाम से जानी जाती हैं। यह एक पवित्र स्थान है जो हिंदुओं और जैन धर्मावलम्बियों दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ है। इन पहाड़ियों की औसत ऊंचाई 3,500 फुट है पर चोटियों की संख्या अधिक है। इनमें अंबामाता, गोरखनाथ, औघड़ सीखर, गुरू दत्तात्रेय और कालका प्रमुख हैं। गिरनार का प्राचीन नाम उज्जयंत अथवा गिरिवर था।

उडुपी मंदिर
उडुपी श्री कृष्ण मठ कर्नाटक राज्य के उडुपी शहर में स्थित भगवान श्री कृष्ण को समर्पित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। मठ का क्षेत्र रहने के लिए बने एक आश्रम जैसा है, यह रहने और भक्ति के लिए एक पवित्र स्थान है। श्री कृष्ण मठ के आसपास कई मंदिर है, सबसे अधिक प्राचीन मंदिर 1500 वर्षों के मूल की बुनियादी लकड़ी और पत्थर से बना है।

वैष्णो देवी मंदिर
वैष्णो देवी मंदिर शक्ति को समर्पित सबसे पवित्र हिंदू मंदिर है, जो भारत के जम्मू और कश्मीर में वैष्णो देवी की पहाड़ी पर स्थित है। हिंदू धर्म में वैष्णो देवी, जो माता रानी और वैष्णवी के रूप में भी जानी जाती हैं, देवी मां का अवतार हैं। मंदिर, जम्मू और कश्मीर राज्य के जम्मू जिले में कटरा नगर के समीप अवस्थित है। यह उत्तरी भारत में सबसे पूजनीय पवित्र स्थलों में से एक है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 12 किलोमीटर (7.45 मील) की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थयात्री मंदिर का दर्शन करते हैं और यह भारत में तिरूमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थ-स्थल है।

देवी कन्याकुमारी
देवी कन्या कुमारी को भागवती अमां के नाम से जाना जाता है। कन्या कुमारी, तमिलनाडु सुदूर दक्षिण तट पर बसा एक शहर है। यह हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर का संगम स्थल है, जहां भिन्न सागर अपने विभिन्न रंगों से मनोरम छटा बिखेरते हैं। भारत के सबसे दक्षिणी छोर पर बसा कन्याकुमारी वर्षों से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्व है। दूर-दूर फैले समुद्र के विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा बेहद आकर्षक लगता हैं। समुद्र बीच पर फैले रंग बिरंगी रेत इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देता है।

राजिम
छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम रायपुर से 47 किमी. की दूरी पर स्थित है। यह महानदी के तट पर स्थित है। यहॉ पैरी और सोंढू नदियॉ महानदी में आकर मिलती हैं। माघ पूर्णिमा पर यहॉ प्रतिवर्ष मेला लगता है। जहॉ बड़ी संख्या में धर्मालु पवित्र महानदी में स्नान का पुण्य कमाते हैं। यहॉ भगवान राजीव लोचन का बेहद सुन्दर, प्राचीन मन्दिर है। इसके साथ ही मंदिरों के समूह भी हैं। जिनका विशेष धार्मिक महत्व है।]]

राजीव लोचन मन्दिर के अतिरिक्त यहॉ कुलेश्वर महादेव, राजेश्वर मंदिर, जगन्नाथ मन्दिर, पंचेश्वर महादेव मन्दिर, भूलेश्वर महादेव मन्दिर, नरसिंह मन्दिर, बद्रीनाथ मन्दिर, वामन वराह मन्दिर, राजिम तेलीन का मन्दिर, दानेश्वर मन्दिर, रामचन्द्र मन्दिर, सोमेश्वर महादेव मन्दिर, शीतला मन्दिर प्रमुख दर्शनीय हैं, जो अपनी वास्तुकला का परिचय देते है।

प्राचीन कथानुसार राजिम का प्राचीन नाम कमल क्षेत्र या पद्मपुर था, जो इसका संबंध राजीव तेलीन, राजीव लोचन तथा जगपाल से जोड़ता है। कथानुसार राजीव तेलीन के पास काले पत्थर की मूर्ति थी। जगपाल ने राजीव तेलीन को सोना देकर मूर्ति प्राप्त कर राजीव लोचन नामक मन्दिर बनवाया। राजीव लोचन मन्दिर जगन्नाथपुरी जाने वाले तीर्थयात्रियों के रास्ते में आने वाले महत्वपूर्ण मन्दिरों में से एक है।]]

राजिम के लिये नियमित बस सेवा, रेल्वे लाइन (रायपुर-धमतरी छोटी रेल्वे लाइन) एवं टैक्सयाँ भी रायपुर व अभनपुर से उपलब्ध हैं। राजिम के पास महानदी पर लंबा पुल बन जाने पर बारहमासी सड़क संपर्क स्थापित हो गया है।

अन्य स्थल
चंपारण्य – रायपुर से 60 किलोमीटर दूर चम्पारण्य वैष्णव सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य जी की जन्म-स्थली होने के कारण यह उनके अनुयायियों का प्रमुख दर्शन स्थल है। यहॉ चम्पकेश्वर महादेव का पुराना मन्दिर है। इस मन्दिर के शिवलिंग के मध्य रेखाएँ हैं। जिससे शिवलिंग तीन भागों में बँट गया है, जो क्रमशः गणेश, पार्वती व स्वयं शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं।

डोंगरगढ़ – डोंगरगढ़ हावड़ा-मुंबई रेल्वे मार्ग पर स्थित राजनांदगॉव से 59किमी. दूर है। यहॉ पहाड़ी के ऊपर मॉ बम्लेश्वरी का विशाल मन्दिर है। नवरात्रि में यहॉ अपार जन-समूह माता जी के दर्शन के लिये आते हैं। इस मन्दिर का निर्माण राजा कामसेन ने करवाया था।

दन्तेवाड़ा – बस्तर की आराध्या देवी मॉ दंतेश्वरी की पावन नगरी दंतेवाड़ा है। यह डंकिनी-शंखिनी नदी के संगम पर स्थित है। यह जगदलपुर से 85 किमी. की दूरी पर स्थित है। इसका निर्माण रानी भाग्येश्वरी देवी द्वारा कराया गया था। पुरातात्विक महत्व के इस मन्दिर में मॉ दन्तेश्वरी के दर्शन के लिये भक्तों को सात दरवाजों से होकर गुजरना पड़ता है। माता के दर्शनार्थी युवकों को धोती पहनना अनिवार्य होता है। धोती की व्यवस्था मन्दिर में ही रहती है।

दन्तेवाड़ा में भैरव बाबा का एक प्रमुख मन्दिरशंखिनी नदी के दूसरे तट पर स्थित है। संगम स्थल पर एक विशाल शिलाखण्ड में एक पद चिह्न माना जाता है। दंतेश्वरी मन्दिर के पास ही आदिवासी समाज के प्रमुख देव भीमा देव जो कि अकाल और बाढ़ से बचाने वाले माने गये हैं। उनकी विशेष प्रतिमा स्थित है।

बारसूर – बस्तर की ऐतिहासिक नगरी बारसूर को नागवंशीय राजाओं की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। यह जगदलपुर दन्तेवाड़ा मार्ग में गीदम से 23किमी. दूर है। यहॉ 11वीं, 12वीं शताब्दी के बत्तीसगा मन्दिर, देवरली मन्दिर, चन्द्रादित्य मन्दिर, मामा-भांजा मन्दिर प्रसिद्ध मन्दिर है। बारसूर की विशाल गणेश भगवान की प्रतिमा प्रसिद्ध है। नारायण गुड़ी मन्दिर का गरुड़ स्तम्भ व पेद्दम्मा गुड़ी की दुर्गा मूर्ति दन्तेवाड़ा के दंतेश्वरी मन्दिर में सुरक्षित है।

तुलार – अबूझमाड़ के माड़ क्षेत्र में दो पहाड़ियों के मध्य स्थित शिवलिंग पर सारे समय स्वच्छ, निर्मल जल टपकता रहता है। यहां का प्रसिद्ध शिलिंग तुलार के नाम से जाना जाता है। यह प्रसिद्ध बारसूर नगरी से 42किमी. दूर स्थित है।

गुप्तेश्वर – दक्षिण बस्तर में शबरी नदी के किनारे स्थित इस स्थान पर पुरातात्विक उत्खनन के उपरान्त 5वीं, 6वीं शताब्दी के कल्चुरी शासनकाल की मूर्तियां, मन्दिर व बावड़ी आदि मिली हैं। टीलों की खुदाई के उपरान्त शिव मन्दिरों का विशाल समूह निकला है।

ढोंढरेपाल – दरभा विकासखण्ड में स्थित यह प्राचीन भारतीय मन्दिर कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। त्रिरथ शैली में निर्मित तीन मन्दिरों के समूह के आज मात्र अवशेष रह गये हैं, मगर खण्डहर का हर पत्थर अतीत की सुन्दरता का गुणगान करता परिलक्षित होता है।

आरंग – रायपुर से संबलपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर रायपुर से 36 किमी. दूरी पर स्थित आरंग एक प्राचीन नगरी है। सजिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। बाद्य देवल मन्दिर एवं महामाया मन्दिर यहां के पौराणिक मन्दिरों में से एक हैं।

रतनपुर – आराध्य मां महामाया शक्तिपीठ की सीपना यहां कल्चुरी नरेश रत्नसेन ने की थी। यहां अनेकों सुन्दर पुराने मन्दिर, जलाशय तथा प्राचीन किले के अवशेष हैं।

खल्लारी – महासमुन्द जिले से लगभग 22 किमी. दूर स्थित है। यहां पास की एक पहाड़ी पर एक शिलाखण्ड है, जो सती स्तम्भ का एक भाग प्रतीत होता है। यह सिन्दूर से पुता हुआ है और खल्लारी माता के रुप में पूजनीय है। चैत्र माह में पूर्णिमा को खल्लारी ग्राम में देवी के सम्मान में एक मेला लगता है।

सिरपुर – राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर आरंग से 24 किमी. आगे बांयी ओर लगभग 16 किमी. पर सिरपुर स्थित है। प्राचीन काल में इसे श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। 5 वी, से 8 वीं सदी के मध्य यह दक्षिण कोशल की राजधानी था। 7 वीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था। लगभग 1000 वर्ष पुराना पूर्णतः ईटों से निर्मित यहां का लक्ष्मण मन्दिर, गंधेश्वर महादेव मन्दिर तथा बौद्ध विहार पर्यटकों को विशेष रुप से आकर्षित करता है।

शिवरीनारायण – महानदी और जोंक नदी के संगम पर बसा, जांजगीर जिले में स्थित शिवरीनारायण बिलासपुर से 63 किमी. पर स्थित है। यहां प्रसिद्ध विष्णु मन्दिर है। यह शिवरीनारायण से 3 किमी. दूरी पर स्थित है। खरोद में प्रसिद्ध लक्ष्मणेश्वर मन्दिर है।

जगदलपुर – चौहानों का प्रसिद्ध नगर जगदलपुर संभागीय व जिला मुख्यालय है। पुरात्व के दृष्टिकोण से जगदलपुर का इतिहास काफी समृद्ध है। वहीं जगदलपुर का प्रसिद्ध राजमहल और उसमें स्थित माई दंतेश्वरी देवी का मन्दिर जगदलपुर का सबसे पवित्र स्थल है। आदिवासी संस्कृति की राजधानी जगदलपुर अपने सांस्कृतिक आयामों के कारण और भी ख्यातिलब्ध है। जगदलपुर का बस्तर दशहरा अपनी विशेष प्राचीन आदिवासी परम्परा का निर्वहन करने के कारण विश्व स्तरीय आदिम उत्सव में स्थान रखता है। इस प्रकार इस प्राचीन नगरी का महत्वपूर्ण स्थान है।

नारायणपाल का विष्णु मंदिर – इन्द्रावती और नारंगी के संगम के आस-पास अवस्थित नारायणपाल ग्राम जो कि जगदलपुर जिले से लगभग 23 मील दूर है। नागवंशीय वास्तुकला में पल्लवित यह भव्य मन्दिर भगवान विष्णु का है। इसका निर्माण नरेश जगदेक् भूषण की पत्नी ने सन् 1111 में नारायणपाल नामक स्थान में करवाया था। मन्दिर अपने आदर्श बनावट के लिये सुविख्यात है।

जांजगीर – बिलासपुर जिले में यह स्थित है। यहां पर भगवान विष्णु का अपूर्ण मन्दिर स्थित है। धमधा (दुर्ग)- यहां पर प्राचीन किला एवं मन्दिर पाया गया है।

नागपुरा – दुर्ग जिले में स्थित नागपुरा जैनियों का धार्मिक स्थल है। यहां पर श्री उवसंम्हार पार्श्वतीर्थ का प्राचीन जैन मन्दिर स्थित है।

बालोद – यह भी दुर्ग जिले में स्थित है। यहां का सती का चबूतरा एवं प्राचीन किला प्रसिद्ध है। इसी के पास में झलमला स्थित है। जहां पर गंगा मैया का प्रसिद्ध मन्दिर है। हर 6 महीने में यहां पर नवरात्रि में मेला भरता है।

खरखरा – यह दुर्ग जिले में स्थित है। यहां का 1128 मीटर लम्बा मिट्टी का बना बांध प्रसिद्ध है।

देव-बालौदा – यहां का प्राचीन शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।

सिंघोड़ा – यह सरायपाली, महासमुंद जिले में स्थित है। यहां सिंघोड़ा देवी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।

तुरतुरिया – यह महासमुंद जिले में है। यहां बहरिया ग्राम के पास बाल्मीकी आश्रम स्थित है। यहां का काली मन्दिर भी प्रसिद्ध है।

पलारी – यह बलौदा बाजार के पास स्थित है। यहां का ईंटों से बना सिद्धेश्व मन्दिर प्रसिद्ध है।

गिरोधपुरी – यह संत घासीदास की जन्म-स्थली है।

दामाखेड़ा – यह सिमगा, रायपुर के पास स्थित है। यहां कबीरपंथियों की पीठ स्थित है।

सिहावा – यह नगरी से 8 किमी. दूर स्थित है। श्रृंगी ऋषि पर्वत से छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी महानदी का उद्गम हुआ है। यहां के अन्य प्रसिद्ध मन्दिरों में कर्णेश्वर महादेव, मातागुड़ी, मोखला मांझी एवं भिम्बा महाराज है।

चंदखुरी – यह रायपुर के पास स्थित है। यहां का प्राचीन शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।]]

रविशंकर जलाशय – यह धमतरी से 13 किमी. दूर स्थित महानदी पर बना विशालकाय बांध है। इसे गंगरेल के नाम से भी जानते हैं। यह एक पिकनिक स्थल के पुर में भी विकसित हो चुका है।

केशकाल घाटी – यह बस्तर जिले में स्थित है। 5 किमी. लम्बी सर्पाकार घाटी, राष्ट्रीय स्मारक गढ़धनोरा, कोपेन कोन्हाड़ी में चौथी शताब्दी की प्राचीन गणेश मूर्ति इसकी प्रसिद्धि का कारण हैं। घाटी की समाप्ति पर उपर स्थित पंचवटी घाटी की मनोरम छंटा बिखेरता हैं।

ऋषभ तीर्थ गुंजी व शक्ति – बिलासपुर जिले में स्थित है। यहां का तमउदहरा झरना, पंचवटी एवं गिद्ध पर्वत प्रसिद्ध है।

पाली – यह बिलासपुर जिले में स्थित है। यहां का 9 वीं शताब्दी का शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।

लाफागढ़ – यह बिलासपुर जिले में स्थित है। मेकाल पर्वत की उंची चोटी पर किला व जटाशंकरी नदी का उद्गम स्थल प्रसिद्ध है। यह कलचुरियों की प्रथम राजधानी रही है।

धनपुर – बिलासपुर जिले में स्थित धनपुर जैन तीर्थकर की मूर्ति एवं प्राचीन मन्दिर के लिये विख्यात है।

बिलाई माता – धमतरी नगर में स्थित बिलाई माता का मन्दिर प्रसिद्ध मन्दिर है। प्रत्येक नवरात्रि में यहां मेला लगता है।

बिरकोनी – महासमुंद जिले में स्थित है। यहां का चण्डीमाता का मन्दिर प्रसिद्ध है।

चंडी-डोंगरी – बागबाहरा के पास स्थित चण्डी-डोंगरी चण्डीमाता की विशाल प्रतिमा के कारण प्रसिद्ध है।

ब्राह्मनी – यह महासमुंद जिले में स्थित है। यहां पर बह्नेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर व श्वेत गंगा नामक जल-कुण्ड प्रसिद्ध है।

श्री काली माता जी मन्दिर (मुरादाबाद) – मुरादाबाद शहर के लाल बाग नामक स्थान पर श्री काली माता जी का पुराना मन्दिर स्थित है । लगभग 150 वर्ष पूर्व इस स्थान पर नागा बाबा मिस्री गिरी जी ने पूजा – पाठ के लिए एक मठ का निर्माण करवाया । कालान्तर में नागा बाबा मिस्री गिरी जी की मृत्यु के उपरान्त यह स्थान काली देवी के मन्दिर के रुप में विकसित हुआ । वर्तमान में इस स्थान पर काली माता के दो मन्दिर स्थित हैं जिन्हें क्रमश: छोटी काली तथा बड़ी काली नाम से जाना जाता है । इन मन्दिरों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ काली के अन्य मन्दिरों की भाँति पशु – बलि इत्यादि कर्मकाण्डों का प्रचलन नहीं है। यहाँ की पूजा सात्विक है ।
इन दोनों मन्दिरों के निकट प्राचीन समय में हुए 21 महात्माओं की समाधियाँ हैं । लाल बाग स्थित काली मन्दिर में बारे में मान्यता है कि भक्तगण यदि पवित्र हृदय से माँ की उपासना करें , तो उन्हें मनवांछित फल प्राप्त होता है । इसी मान्यतावश यहाँ विभिन्न पर्वों पर हजारों की संख्या में लोग काली की उपासना के लिए आते हैं ।

ii ) चौरासी घण्टा मन्दिर (मुरादाबाद) – मुरादाबाद नगर में स्थित चौरासी घण्टा मन्दिर या कामेश्वर नाथ मन्दिर लगभग 500 वर्ष पुराना है । इस मन्दिर के बारे में यह धारणा है कि किसी समय लोगों ने अपनी इच्छा पूर्ण होने पर यहाँ घण्टे चढ़ाने प्रारम्भ किये । धीरे – धीरे इन घण्टों की संख्या चौरासी लाख तक पहुँच गई । इसी कारण इस मन्दिर का नाम चौरासी (लाख) घण्टा मन्दिर पड़ा । इस मन्दिर में आज भी असंख्य घण्टे टंगे देखे जा सकते हैं । हांलाकि इनकी संख्या चौरासी लाख नहीं है । चौरासी घण्टा मन्दिर में एक प्राचीन शिवलिंग स्थित है जिसे कामेश्वर नाथ शिवलिंग के नाम से पुकारा जाता है । आज भी इस मन्दिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण आते हैं और मनौती पूर्ण हो जाने पर घण्टे चढ़ाते हैं ।

iii ) श्री झारखण्ड शिव मन्दिर (मुरादाबाद) – मुरादाबाद नगर में स्थित श्री झारखण्ड शिव मन्दिर भी अत्यन्त प्राचीन मन्दिरों में एक है । इस मन्दिर में स्थित शिवलिंग के बारे में लोक धारणा यह है कि यह शिवलिंग झाडियों के बीच से प्रकट हुआ था। इस घटना को एक दिव्य घटना मानकर लोगों ने शिवलिंग को वर्तमान स्थान पर स्थापित किया और इसके ऊपर मन्दिर का निर्माण कराया । तब से आज तक असंख्य लोग प्रतिदिन इस मन्दिर में आकर शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से झारखण्ड बाबा प्रसन्न होंगे और उन्हें मनवांछित फल की प्राप्ति होगी ।

iv ) श्री मन्दिर बगिया जोकी राम (रामपुर) – 2016 सम्वत् में निर्मित श्री मन्दिर बगिया जोकी राम का मन्दिर रामपुर में स्थित है। इस मन्दिर की विशेषता इसमें स्थित प्राचीन शिवलिंग है । शिवरात्रि तथा अन्य अवसरों पर लोग बड़ी संख्या में हरिद्वार से गंगा जल लाकर इस शिवलिंग पर प्रतिवर्ष चढ़ाते हैं ।

मन्दिर बगिया जो कि राम के निकट ही 200 वर्ष पूर्व हुए महापुरुष परशुराम की समाधि है। इस समाधि के प्रति लोगों में प्रगाढ़ आस्था है । श्रद्धालुओं की मान्यता हैे कि बाबा परशुराम की आत्मा अमर हैं और वह अपने भक्तों की समस्याओं का समाधान जरुर करते हैं ।

v ) कोसी मन्दिर (रामपुर) – रामपुर नगर में स्थित रामलीला मैदान के निकट पुराना कोसी मन्दिर है । इस मन्दिर में एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है । लोग यहाँ आकर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने के लिए उपासना करते हैं ।

vi) गौरी शंकर मन्दिर (गुलहड़िया – जिला बरेली) – गौरी शंकर मन्दिर रुहेलखण्ड क्षेत्र के प्राचीनतम धार्मिक स्थानों में से एक है । यह मन्दिर आँवला तहसील (जिला बरेली) के गुलहड़िया नामक ग्राम में स्थित हैं । यद्यपि मन्दिर का भवन अधिक पुराना नहीं है लेकिन इसमें स्थापित पत्थर का शिवलिंग लोक मान्यता के अनुसार कई हजार वर्ष पुराना है । कुछ स्थानीय लोग इस शिवलिंग को द्वापर युगीन बताते हैं। संरचना की दृष्टि से इस शिवलिंग की विशेषता यह है कि इस पर पार्वती का मुख भी उकेरा गया है। स्थानीय लोगों के अतिरिक्त रुहेलखण्ड के सभी इलाकों के लोगों की इस मन्दिर और इसमें स्थापित शिवलिंग में दृढ़ आस्था है । वास्तव में यह गुप्तकालिन शिवलिंग है।

vii) पुरैना मन्दिर (आॅवला – जिला बरेली) – आंवला तहसील (जिला बरेली) के पुरैना नामक स्थान पर में स्थित हैं । इस मन्दिर में स्थित शिवलिंग अत्यन्त प्राचीन है जिस पर पीतल का नक्काशी युक्त सुन्दर कवच चढ़ा हुआ हैं । शिवरात्रि तथा सावन के सोमवार के अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण यहाँ एकत्र होते हैं ।

viii) सम्भल के विभिन्न मन्दिर तथा तीर्थ (सम्भल – जिला मुरादाबाद) – मुरादाबाद जिले की तहसील सम्भल यहाँ स्थित असंख्य तीर्थों के कारण दूर -दूर तक प्रसिद्ध है । इस स्थल की मान्यता एक बड़े तीर्थ स्थल के रुप में स्थापित है । पौराणिक कथाओं में सम्भल के बारे में प्रचुर मात्रा में वर्णन मिलता है । पौराणिक कथाओं में सम्भल में स्थित 68 तीर्थ स्थलों का उल्लेख मिलता है।

यह तीर्थ आज भी किसी न किसी रुप में सम्भल में विद्धमान हैं । इन तीर्थों के नाम इस प्रकार हैं –
क्रमांक तीर्थों का नाम पर्व स्नानादि का समय
1. अवन्तीसार हस्त नक्षत्र ,अष्टमी
2. अंगारक प्रत्येक मंगलवार
3. अत्रिका श्रम ॠषि पंचमी
4. आन्नदसर बृधाष्टमी ,भाद्रपद चतुर्थी
5. कान्ति भाद्रपद , कृष्ण तृतीया
6. अर्ध्वरेता अष्टमी
7. सूर्यकुण्ड सप्तमी युक्त रविवार
8. हंसतीर्थ चैत्र अष्टमी चैत्र कृष्ण अष्टमी
9. कृष्णतीर्थ एकादशी
10. सन्निहित वनयात्रा में स्वेच्छा से नियमपूर्वक
11. कुरुक्षेत्र संक्रान्ति – सूर्यग्रहण
12.. पादोदक कार्तिक मास ,कृष्ण द्वादशी
13. श्वेत द्वीप वैशाख शुक्ल चतुर्दशी
14. ताक्ष्र्यकिश्व गणेश चौथ
15. चन्द्रेश्वर चन्द्र ग्रहण
16. लोलार्क भाद्रपद शुक्लअष्टमी
17. शंखमाधव मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी
18. दशाश्वमेघ ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से दशमी तक
19. पिशाचमोचन श्रावण शुक्ल चतुर्दशी
20. नैमि साख्य कार्तिकशुक्ल चतुर्दशी
21. विजयतीर्थ विजय दशमी दशहरा
22. धर्म हद मंगलवार चर्तुथी
23. चतुस्सागर वन यात्रा में स्वेच्छानुसार
24. यमतीर्थ कार्तिक शुक्ल द्वितीय
25. मणि कर्णिका सोवती अमावस्या
26. माहिष्मति नही बुद्धवार युक्तनवमी
27. ॠण मोचन बृहस्पतिवार अष्टमी
28. पापमोचन मार्गशीर्ष शुक्ल अष्टमी
29. कालोदक दीपावली के दिन
30. सोमतीर्थ सोमवती अमावस्या
31. गोतीर्थ गोवर्धन, कार्तिक शुक्ल अष्टमी
32. सुदर्शन तीर्थ वन यात्र में स्वेच्छानुसार
33. रत्न प्रयाग माघ मास तथा सप्तमी
34. क्षेमक प्रयाग कृष्ण जन्माष्टमी
35. गन्धर्व प्रयाग वन यात्रा में स्वेच्छानुसार
36. तारक प्रयाग वन यात्रा में स्वेच्छानुसार
37. मृत्युतीर्थ कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा
38. ज्येष्ठ पुष्कर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा
39. मध्य पुष्कर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा
40. कनिष्ठ पुष्कर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा
41. वृहमवर्त वैशाख शुक्ल तृतीया
42. नर्मदा तीर्थ सूर्य सिंह संक्रान्ति
43. नन्दा कार्तिक मास प्रत्येक सोमवार व रविवार
44. सुनन्दा कार्तिक मास प्रत्येक सोमवार व रविवार
45. सुमना कार्तिक मास प्रत्येक सोमवार व रविवार
46. सुशीला कार्तिक मास प्रत्येक सोमवार
47. सुरभि कार्तिक मास प्रत्येक सोमवार
48. विमलातीर्थ कार्तिक मास प्रत्येक सोमवार
49. गोमती तीर्थ संक्रांति
50. गोदावरी तीर्थ भाद्र पद द्वाद्शी
51. भारती तीर्थ श्रवण मास की चतुर्दशी
52. रेवा कुण्ड वैशाख मास की तृतीया व चतुर्थी
53. गोपाल तीर्थ मार्गशीर्ष की पंचमी
54. मत्स्योदारी कार्तिक शुक्ल नवमी
55. देवखात प्रत्येक पूर्णिमा
56. विष्णुखात वन यात्रा में स्वेच्छानुसार
57. भागीरथ प्रत्येक अष्टमी
58. त्रिसंध्यतीर्थ मेष की सूर्य संक्रान्ति
59. मलहानि दुर्गाष्टमी
60. शर द्वीप तीर्थ प्रत्येक शुक्ल की तृतीया
61. चक्रतीर्थ प्रत्येक एकादशी
62. रत्नयुग्म तीर्थ आश्विन कृष्ण नवमी
63. पुष्प दन्त पुष्प नक्षत्र युक्त नवमी
64. कर्म मोचन चैत्र शुक्ल त्रयोदशी
65. गुप्त संज्ञक प्रत्येक द्वादशी
66. गया तीर्थ सम्पूर्ण श्राद्धुपक्ष
67. मोक्ष तीर्थ प्रत्येक पूर्णमासी

सम्भल स्थित उपरोक्त सभी तीर्थों के साथ कोई न कोई लोक मान्यता या लोकश्रुति अवश्य ही सम्बद्ध है। समस्त तीर्थों के साथ प्राय: एक सामान्य लोकश्रुति यह जुड़ी है कि इनमें से कुछ का निर्माण स्वयं किसी देवता ने किया था तथा कुछ तीर्थों का निर्माण अतीत में हुए किन्हीं दिव्य पुरुषों द्वारा स्वयं करवाया गया था। एक लोक श्रुति के अनुसार इन सभी तीर्थों का निर्माण स्वयं विष्णु ने एक ही रात में किया था।

प्राचीन काल से यह माना गया है कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए गया के पश्चात् सम्भल का ही प्रमुख स्थान था। सम्भल के समस्त तीर्थों के बारे में यह धारणा है कि दीपावली पर्व को दो दिन उपरान्त सम्भल के इन तीर्थ स्थलों की परिक्रमा करने से हर मनोकामना पूरी होती है।

ix ) शीतला देवी मन्दिर (जिला – शाहजहाँपुर) – शाहजहाँपुर नगर में स्थित छोटा चौक नामक स्थान पर अनेक छोटे बड़े मन्दिर स्थित हैं।इनमें शीतला देवी मन्दिर का विशेष धार्मिक महत्व है इस प्राचीन मन्दिर के बारे में यह मान्यता है कि सच्चे हृदय से माँगी गई कोई भी मनोकामना पूर्ण होती है ।

x ) काली देवी मन्दिर ( जिला – शाहजहाँपुर) – काली देवी मन्दिर शाहजहाँपुर नगर के निकट स्थित खन्नौत नदी के तट पर स्थित है। यह मन्दिर अत्यन्त प्राचीन है। यहाँ नवरात्र तथा रामनवमी के अवसर पर असंख्य श्रद्धालु एकत्र होते हैं और देवी की उपासना करते हैं। मन्दिर में स्थित काली देवी की प्राचीन प्रतिमा लोगों की श्रद्धा का केन्द्र है।

xi ) अलखनाथ मन्दिर (जिला- बरेली) – बरेली स्थित अलखनाथ का मन्दिर यहाँ के प्राचीनतम मन्दिरों में से एक है। यहां अति प्राचीन शिवलिंग स्थित है। यह मन्दिर शैव सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है। शिवरात्रि तथा सावन के प्रत्येक सोमवार को यहां मेलों का आयोजन होता है। सावन के समस्त सोमवारों को श्रद्धालु यहां बड़ी मात्र में गरीबों को भोजन इत्यादि का दान देते हैं। इस मन्दिर की एक अन्य विशेषता है पानी में तैरता हुआ एक प्रस्तर खण्ड । ऐसी मान्यता है कि यह प्रस्तर खण्ड रामायण युगीन उन खण्डों में से एक है जिनकी सहायता से श्री राम के नेतृत्व में हनुमान इत्यादि ने समुद्र पर पुल का निर्माण किया था।

xii ) धोपेश्वर नाथ मन्दिर (बरेली) – बरेली नगर में स्थित धोपेश्वर नाथ के शिव मन्दिर के बारे में मान्यता है कि इसका निर्माण ॠषि धूम (तिथि अज्ञात) ने करवाया था। उन्हीं के नाम पर इसका प्राचीन नाम धूमेश्वरनाथ मन्दिर था। कालान्तर में इसे धोपेश्वर नाथ मन्दिर नाम दिया गया । यहाँ अवध के नवाब आसफउद्दौला के द्वारा एक विशाल जलाशय का निर्माण करवाया गया, जो आज भी विद्यमान है। शिवरात्रि तथा सावन के प्रत्येक सोमवार के अवसर पर असंख्य भक्तगण यहां शिव के दर्शन हेतु आते हैं। मन्दिर का प्रांगण अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहारी है।

xiii ) बनखण्डी नाथ मन्दिर (बरेली) – बनखण्डी नाथ मन्दिर भी बरेली के ऐसे मन्दिरों में है जिसका धार्मिक तथा प्राचीन महत्व है। इस मन्दिर का निर्माण 1857 की क्रान्ति के प्रर्सिद्ध नेता दीवान शोभाराम ने करवाया था। इस प्राचीन मन्दिर का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यहाँ महापिण्ड का निर्माण द्रौपदी ने करवाया था। इस मन्दिर में प्रतिवर्ष शिवरात्रि तथा सावन के सोमवारों के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।

xiv ) लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बरेली) – यह मन्दिर बरेली शहर के मध्य में स्थित है । यहाँ देवी लक्ष्मी तथा भगवान विष्णु की सुन्दर प्रतिमाएं स्थापित हैं। मन्दिर की वास्तुकला अनूठी है। इस मन्दिर की प्रमुख विशेषता यह है कि इसका निर्माण चुन्ना मियां नामक एक मुसलमान व्यक्ति ने करवाया था। इस रुप में यह मन्दिर हिन्दू मुस्लिम एकता की एक अद्वितीय मिसाल है।

xv ) टीबरीनाथ मन्दिर (बरेली) – टीबरी नाथ मन्दिर बरेली नगर के उत्तरी क्षेत्र में स्थित है। इस मन्दिर की स्थापना के विषय में एक लोकोक्ति है। इसके अनुसार — बाबा प्रमोदगिरी के शिष्य ने इस मन्दिर की स्थापना की थी । पहले यहाँ एक पीपल का पेड़ था, जिसकी जड़ से सूत निकलता था। बाबा प्रमोद गिरी ने पीपल की जड़ के पास वह नीम की टहनी गाड़ दी, जिससे उन्होंने दातून किया था । तभी से इस मन्दिर का नाम टीबरी नाथ पड़ा। वर्तमान में इस स्थान का जीर्णोद्धार किया गया है, जिसके फलस्वरुप यह स्थल अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होता है।

xvi ) नीलकण्ठ महादेव का मन्दिर (बदायूँ) – बदायूं जिले में स्थित इल्तुतमिश कालीन (1202-1209 ई०) इस शिव मन्दिर का निर्माण राजा लखनपाल ने करवाया था। लखनपाल बदायूं नगर के राज अजयपाल के परिवार के सदस्य थे। इस रुप में यह मन्दिर रुहेलखण्ड क्षेत्र के प्राचीनतम मन्दिरों में एक है। इस मन्दिर में प्रतिवर्ष शिवरात्रि की भव्य मेला आयोजित होता है।

मध्यप्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थल

ओंकरेश्वर – द्वादश ज्योर्तिलिंगों में एक लिंग ओकारेश्वर नर्मदा नदी के तट पर स्थित एक कस्बा है। यहां ओंकारेश्वर मंदिर के अलावा सिद्धनाथ मंदिर और 24 अवतार मंदिर देखने लायक हैं। इंदौर से 77 किलोमीटर दूर स्थित उक्त स्थल पर इंदौर या महेश्वर से सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता हैं।

चित्रकूट – पौराणिक महत्व है कि यहां भगवान राम ने वनवास के 14 में से 11 साल पचमढ़ी में ही व्यतीत किए थे। मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित रामघाट धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र हैं। यहां कामदगिरी में भरत मिलाप मंदिर, सती अनुसुया का मंदिर, श्रीराम के चरणों के निशान से युक्त स्फटिक शिला, एवं चित्रकूट से 18 किमी दूर स्थित गुप्त गोदावरी में एक छोटी गुफा के बीच नदी के बहाव दर्शनीय हैं। श्रीराम के यहां रहने से इसका महत्व कई गुना अधिक बढ़ जाता हैं। मंदाकिनी के घाट पर ही गोस्वामी तुलसीदासजी ने पवित्र ग्रंथ रामायण की रचना रची थी। कहा जाता है चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़, तुलसीदास चंदन घिसें और तिलक करें रघुवीर। चित्रकूट से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो हैं। यह रेल और सड़क मार्ग से झांसी से जुड़ा हैं।

मैहर: सतना जिले में मैहर एक दिव्य आलौकिक स्थान है जहां शारदा देवी का मंदिर और आल्हा ऊदल का अखाड़ा देखने लायक स्थल हैं। पहाड़ी पर सीढ़ियों द्वारा चढ़ा जाता हैं। यहां कटनी से बस मार्ग से जाया जा सकता है। जबलपुर निकटस्थ वायुमार्ग हैं। वर्तमान में यहां यात्रियों को रोप-वे भी प्रारम्भ कर दिया गया है। जिससे यात्री आसानी से पहुंच सकते हैं। यहां मंदिर पर ऊपर नारियल फोड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया हैं।
उज्जैन: बारह ज्योर्तिलिंगों में प्रमुख कालों के काल स्वयंभू महाकालेश्वर का मंदिर इसी नगर में स्थित हैं। उज्जैन का प्राचीन नाम अवंतिका, उज्यिनी हैं। हिंदू नववर्ष का प्रारंभ भी इसी नगर से हुआ था। राजा विक्रमादित्य की इसी नगरी में भगवान श्रीकृष्ण ने षिक्षा ग्रहण की थी। मदिरापान करते कालभैरव का मंदिर, बड़े गणेष का मंदिर, हरसिद्धी देवी का मंदिर, क्षिप्रा नदी दर्शनीय स्थल हैं। महाकालेष्वर मंदिर विश्व की आस्थाओं का प्रमुख केन्द्र होने से जहां दर्शक वर्षभर निरंतर आते जाते रहते हैं। 12 सालों में लगने वाला कुम्भ एवं अर्धकुम्भ भी यहां लगता है जिसमें लाखों की तादाद में आकर श्रद्धालु संत-महात्माओं के साथ क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाते हैं। गगनचुंभी मंदिरों के शिखरों पर उकरी प्राचीन कलाकृतियां, महाकाल मंदिर प्रांगढ़ में बना सरोबर पर्यटकों को यहां रोके रखते हैं। उज्जैन में हवाई, रेल, वायुयान द्वारा जाया जा सकता हैं। रुकने के पर्याप्त साधन हैं। महाकालेश्वर महादेव की प्रातः 4 बजे होने वाली भस्मा आरती को देखने से सारे पापों का षमन हो जाता हैं। काल भैरव मंदिर प्रांगढ़ में बनी देषी मदिरा की दुकानों से मदिरा खरीद कर लोग कालभैरव को चढ़ाते हैं।

संगमरमरों की संस्कारधानी है जबलपुर – मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग तीन सौ तीस किलोमीटर की दूरी पर महाभारत एवं रामायण की कथाओं से जुड़ा एवं म.प्र. की जीवनरेखा कहलाने वाली पुण्य सलिला नर्मदा नदी के तट पर स्थित है जबलपुर संस्कारधानी के नाम विख्यात है। शैल-शिखरों से परिपूर्ण जबलपुर में संगमरमर से कलकल करती नर्मदा नदी, गगनचुंभी आसमान को छूता हुआ प्रतीत होता मदन महल किले से इस संस्कारधानी को देखा जा सकता है।

मंदसौर में भी है पशुपतिनाथ – नेपाल में तो विश्व प्रसिद्ध भगवान पशुपति नाथ का मंदिर तो दुनिया जानती है। लेकिन आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि भारत के हृदय मध्यप्रदेश के मंदसौर में भी एक ऐसा स्थान है जहां भगवान शैशवकाल से लेकर सभी अवस्थाओं को परिलक्षित करने वाली अष्टमुखी प्रतिमा विराजमान है। शिवना नदी मं से अवतरित ये प्रतिमा आज नदी के किनारे विशाल मंदिर में स्थापित है। यहा प्रतिदिन देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन कर अपनी मनोकामनायें पूरी करते है।
यदि आपने भगवान शिव के इन मनोहारी रूपों के दर्शन नहीं किये तो एक बार अवश्य ही म.प्र. के मंदसौर शहर में जाकर भगवान पशुपतिनाथ के अवश्य दर्शन कर मनोवांछित फल प्राप्त करें। मध्यप्रदेश के मालवांचल का प्राचीन नगर दशपुर वर्तमान में मन्दसौर के नाम से प्रसिद्ध है।
ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टिकोण से भारत के अन्य प्राचीन नगरों के समान के अवन्तिका (उज्जैन), महिष्मति (महेष्वर), विदिषा एवं धार नगरी के अनुरूप अपना स्वतंत्र एवं महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जबकि इसका धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप भी अपने आप में विषिष्ट उवं उल्लेखनीय रहा है।

मंदिरों और महलों का नगर ओरछा – प्राचीन वैभव की कहानी बयां करती इमारतें, मंदिर और महल का नगर ओरछा 16वीं सदी में बुंदेला राजा रुद्रप्रताप के द्वारा बसाय गया था। उनके बाद के राजाओं ने भव्य सौन्दर्य से परिपूर्ण कलात्मक इमारतें और भवन बनवायें ये भवन बाहर से दिखने में जितने सुन्दर दिखते हैं उतने ही खूबसूरत भीतर से। इनकी नक्कासी दार कलाकारी छतों के ऊपर का दृष्य देखते ही बनता हैं।

यहां देखने लायक अन्य स्थानों में
जहागीर महल: इस महल का निर्माण राजा वीरसिंह जूदेव ने 17 वीं सदी में जहांगीर के ओरछा आने के पूर्व करवाया था। इसकी ठोस दीवारें, नाजुक छत्रियां पर्यटकों को दांत तले उंगली चबाने को विवष कर देती हैं।
राजमहल: चतुर्भुज आकार का राजमहल भी उसी सदी में मधुकर षाह ने बनवाया था। अनोखी षिल्प कला अंदर धार्मिकता को अपने में समेंटे हुए हैं।
रायप्रवीन महल: राजा इन्द्रमणि के दरबार में कवियित्री और संगीतकार राय प्रवीन थीं। षहंषाह उनसे प्रेम करने लगा और उन्हें दिल्ली बुलवा लिया लेकिन राजा इंद्रमणि के लिए राय प्रवीन का स्नेह देखकर अकबर भी आष्चर्यचकित हो गए और उन्हें पुनः ओरछा वापिस भेज दिया गया। पेड़ों और प्राकृतिक वातावरण को देखकर उनके लिए दो मंजिला छोटा महल बनवा दिया।
चर्तुभुज मंदिर: कमल की आकृति और अन्य आकृतियों से परिपूर्ण पत्थर के बड़े चबूतरे पर बना यह भगवान श्रीराम का यह मंदिर रामराजा मंदिर की याद दिला देता है। यहां कुछ सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता हैं। मंदिर की गगनचुंभी दीवारें और षिखर इसके विषाल स्वरूप को बयां करती हैं।
लक्ष्मीनारायण मंदिर: मंदिर किले और मंदिर के मिले-जुले स्वरूप को दर्षाते इस मंदिर में रामराजा मंदिर से निकलने वाले रास्ते से पहुंचा जा सकता हैं। धार्मिक कल्पनाओं को अधारा बनाकर किया गया षिल्प और आज भी अपने चटख रंग को बरकरार रखे हुए चित्रकला के नमूने दीवारों और छतों पर बने षिल्प आर्कषण हैं।

नर्मदा के सौंदर्य की गवाह भेड़ाघाट – उद्गम से लेकर सागर सगम, अठखेलिया और अदाओं से पर्यटकों को आकर्षित करती जबलपुर में मा नर्मदा की हठ क्षेत्र जहां नर्मदा जिन्हें रेवा के नाम से भी संबोधित किया जाता है ने अपनी तपस्या से इसी क्षेत्र में दुर्लभ सौन्दर्य की प्राप्ति की थी। यहां नर्मदा के हठ और तप से रास्ता भी बदला था पहले वह धुआंधार जलप्रपात से उत्तर की मुड़कर सपाट चौड़े मैदान की ओर बहती थी। उसकी धार के ठीक सामने सौन्दर्य संभवतः नर्मदा को स्वयं ही अपनी ओर आकर्षित करता होगा। तभी तो अठखेलियां करती नर्मदा की लहरें चट्टानों का सीना चीरकर हजारों वर्ष से संघर्ष करते हुए असीम प्राकृतिक सौन्दर्य का खजाना प्राप्त कर पाईं जिसे देखने के लिए पर्यावरण के प्रति संकल्पित पर्यटक देश ही नहीं अपितु विदेशों से आने से अपने आप को नहीं रोक पाते। संगमरमरी चट्टानों के बीच बिखरा नर्मदा का अद्वितीय सौंदर्य देखते ही बनता हैं आखे भी एकटक दृष्टि से देखते रहती हैं।
भेड़ाघाट तिलवाराघाट का इतिहास करीब 180 करोड़ वर्ष पुराना हैं भेड़ाघाट को लेकर अनेक किवदंतियां प्रचलन में हैं प्राचीन काल में भृगुऋषि का आश्रम भी इसी क्षेत्र में होना बताया जाता है संभवतः इसी कारण इस घाट का नाम भेड़ाघाट जाना गया। एक अन्य मान्यता यह भी है कि इसी स्थल पर नर्मदा का बावनगंगा के साथ मिलन हुआ था। लोकभाषा में भेड़ा का अर्थ भिड़ना या मिलना है इस मत के प्रति आस्था रखने वालों के मतानुसार इसी गंगा-नर्मदा के संगम के कारण इस स्थान का नाम भेड़ाघाट प्रचलन में आया।
एक अन्य मत के अनुसार लगभग 1700 वर्ष पूर्व यह स्थान शक्ति का प्रमुख केन्द्र था। शैवमत वालों के अलावा शक्ति के उपासक भी यहां साधना हेतु आते थे भैरव की पूजा के बिना शक्ति की पूजा अधूरी रहती हैं संभवतः इस स्थान का नाम प्राचीनकाल में भैरवीघाट रहा होगा जो वर्तमान में भेड़ाघाट के नाम से प्रचलन में आया। गुप्तेतर काल में शायद इस मंदिर का विस्तार किया गया एवं यहसं सप्तघृत मातृकाओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई ये प्रतिमाएं वर्तमान में चौंसठयोगिनी मंदिर में स्थापित हैं। लगभग 10वीं सदी में त्रिपुरी के कल्चुरी राजाओं के शासनकाल में इस मंदिर का विकास किया गया। इन सभी मतों के पीछे तार्किक प्रमाण थे इनमें तो सत्य यह था कि इस स्थान को नर्मदा ने असीम सुन्दरता का वरण किया। 748 हेक्टेयर क्षेत्र में फेला यह क्षेत्र आज शैव, वैष्णव, जैन मत के मानने वालों के अलावा विभिन्न मत और संप्रदायों की आस्था का मुख्य केन्द्र बन गया है।
भेड़ाघाट से नौकाबिहार करते समय दर्शक नर्मदा के दिव्य दर्शन करने के साथ ही रंग-बिरंगे संगमरमरी पत्थरों के साथ नर्मदा के असीम सौन्दर्य का दर्शन कर अपने आप में दिव्यता का अनुभव करता हैं। यही स्थित शिव को समर्पित है दो सौ वर्ष पुराना पचमढ़ा मंदिर जिसका सौंदर्य एवं आभा अपने आप में अद्वितीय हैं। अन्य स्थलों में ग्वारीघाट, तिलवाराघाट, लम्हेघाट, गोपालपुरघाट, घुधुआ फाल, चैसठ योगिनी मंदिर और पंचवटी घाट के सौनदर्य का बखान शब्दों से नहीं किया जा सकता इसके लिए आपको स्वयं ही इन स्थलों की सैर करना होगी।
स्ध्या के समय होने वाले दीपदान से मानो ऐसा प्रतीत होता है कि गगन पृथ्वी पर उतर आया हो, यहां नर्मदा के जल में तैरते असंख्य मद्धिम लहरों में झिलमिलाते दीपों का प्रकाश मन को आलौकिक आनन्द से सराबोर कर देता हैं। इस क्षेत्र के आसपास प्राचीन ऋषियों के आश्रम होने के कारण इस क्षेत्र का महत्व ओर अधिक बढ़ जाता हैं। षास्त्रों में कहा गया है कि नर्मदा के दर्शन मात्र से मनुष्य पापों से मुक्ति पा जाता है। ग्वारीघाट पर नौकाबिहार की सुविधा उपलब्ध है। दूसरे महत्वपूर्ण घाट के रूप में तिलवाराघाट को सम्मान प्राप्त हुआ यहां मकर संक्रांति पर लगने वाले प्राचीन मैला लोकप्रिय है जिसमें देश विदेश से अनेक धर्मावलंबी आकर अपने जीवन को धन्य करते हैं। यहां का प्राचीन गोपाल मंदिर भी पौराणिकता से साथ संस्कृतियों का अपने में समाया हुआ है।

उज्जैन के प्रमुख पर्यटन स्थल – उज्जैन के महाकालेश्वर की मान्यता भारत के प्रमुख ज्योर्लिंगों में है। महाकालेश्वर मंदिर का माहत्म्य विभिन्न पुराणों में विस्तृत रूप से वर्णित है।महाकवि तुलसीदास से लेकर संस्कृत साहित्य के अनेक प्रसिद्ध कवियों ने इस मंदिर का वर्णन किया है।महाकाल की भस्मारती का आनन्द जिसने नहीं लिया मानों उसका जीवन अधूरा है।यहां फिल्मी हस्तियों से लेकर देष के दिग्गज नेता महाकाल का आषीर्वाद लेने के लिए समय-समय पर आते रहते हैं।महाकालेश्वर की दक्षिणामुखी प्रतिमा हैं। तांत्रिक परंपरा में प्रसिद्ध दक्षिण मुखी का महत्व बारह ज्योतिर्लिंगों सिर्फ महाकालेष्वर को ही प्राप्त हैं।
हरसिद्धि की नगरी भी है उज्जैन:-उज्जैन को महाकाल की नगरी के अलावा राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी हरसिद्धि की नगरी के रूप में पवित्र नगर की मान्यता प्राप्त है।नवरात्रि के दिनों में देवी मंदिर में विषाल मैला लगता है। इस नगर के प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में हरसिद्धी देवी का मंदिर प्रमुख है। चिन्तामन गणेष मंदिर से थोड़ी दूर और रूद्र सागर तालाब के किनारे स्थित इस मंदिर में सम्राट विक्रमादित्य द्वारा हरसिद्धि देवी की पूजा की जाती थी।
शिवपुराण के अनुसार दक्ष यज्ञ के बाद सती की कोहनी इस स्थल पर गिरी थी।देवी हरसिद्धी को तंत्र-मंत्र और यंत्र वाली सारी मनोकामनाएं पूरी करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।

बड़े गणेश की विराट प्रतिमा: श्री महाकालेष्वर मंदिर के निकट हरसिद्धि मार्ग पर बड़े गणेश की भव्य और कलापूर्ण मूर्ति प्रतिष्ठित है। मंदिर परिसर में सप्तधातु की पंचमुखी हनुमान प्रतिमा के साथ-साथ नवग्रह मंदिर तथा कृष्ण यशोदा आदि की प्रतिमाएं भी स्थापित है। उज्जेन नगर के धार्मिक स्वरूप में क्षिप्रा नदी के घाटों का भी अपना स्थान है। नदी के दाहिने किनारे, जहां नगर है, पर बने ये घाट अपने आप में नगर की धार्मिक महत्ता के परिचायक है। क्षिप्रा के इन घाटों का गौरव सिंहस्थ के दौरान देखते ही बनता है। गोपाल मंदिर उज्जैन नगर का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर नगर के मध्य व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित है। मंदिर का निर्माण महाराजा दौलतराव सिंधिया ने की महारानी बायजा बाई ने 1833 में कराया था।

कालीदास की आरध्य थी गढ़कालिका देवी:– गढ़कालिका देवी का यह मंदिर आज के उज्जैन नगर में प्राचीन अवंतिका नगरी क्षेत्र है। कालजयी कवि कालीदास गढऋकालिका देवी के उपासक थे। इस प्राचीन मंदिर का सम्राट हर्षवर्धन द्वारा जीर्णोद्धार कराने का उल्लेख मिलता है। भतृहरि की गुफा ग्यारहवीं सदी के एक मंदिर का अवषेष है, जिसका उत्तरवर्ती दौर में जीर्णोद्धार होता रहा। काल भैरव मंदिर भी अवंतिका क्षेत्र में स्थित है। मंदिर के अंदर काल भैरव की विषाल प्रतिमा है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण प्राचीनकाल में हुआ था। उज्जैन नगर के लिए देश् के सभी बड़े शहरों से रेल और बस द्वारा आया जा सकता है। मौसम यहां का सामान्य है, खासतौर पर गर्मियों और सर्दियों में श्रद्धालुओं का तांता यहां हर पर्व पर लगा रहता है।

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