Patanjalya Darshan पातन्जल्य दर्शन

patanjaliसम्प्रति सेश्वर सांख्य शास्त्र प्रवर्तक पतंजलि प्रभृति के मत कहते है – इसके लिए सांख्य प्रवचनापर नामक योग शास्त्र पादचतुष्टयात्मक और पतंजलि प्रणीत है प्रथम पाद में योग शास्त्र आरम्भ की प्रतिज्ञा कर चित्त वृत्ति निरोधात्मक योग लक्षण तथा सविस्तार समिधा स्वरूप को भगवान् पतंजलि ने कहा। द्वितीय पाद में व्युत्थित चित्त को क्रिया योग यमादी पांच बहिरंग साधन, तृतीय में धारण ध्यान समाधयादि विभुतिजात और चतुर्थ में सिद्धि पंचक का प्रदर्शन पुरस्सर और परम पद कैवल्य का निर्देश किया। (1)

प्रक्रित्यादी २५ तत्त्व पूर्व तंत्रोक्त है २६ मा तत्त्व क्लेश आदि शुन्य स्वेच्छा से निर्माण कार्य को अधिष्ठान कर लौकिक और वैदिक संप्रदाय प्रवर्तक संसाराग्नि से दग्ध प्राणियों पर अनुग्रह कर्ता पुरुष विशेष ईश्वर है। (2)

कमल के पत्ते के सामान निर्लेप पुरुष को तक ही कैसे हो सकते हैं जिससे अनुग्राहक परमेश्वर की उपेक्षा हों सो कहते हैं (सत्त्वमेवेति) तापकर जो गुण के तप्य सत्त्व गुण ही बुद्धि रूप से परिणत होता है अतः सत्त्व तप्त होने पर तमोगुणवश सत्त्व के साथ अभेद से प्रतीयमान पुरुष भी तप्त कहा जाता है। “बुद्धिरूप से परिणत सत्त्व तप्य है राजस भाव सब तापक है तप्य के साथ अभेद ग्रह करने वाली तामस वृत्ति होने से आत्मा भी तप्य कहाता है।(3)

पतंजलि ने भी कहा है कि स्वयं अपरिणामी और असंक्रमणशील चिच्छाक्ति (आत्मा) परिणामी बुद्धि तत्त्व में प्रतिबिंबित होने पर अर्थात बुद्धि में प्रतिबिंबित चिच्छक्ती बुद्धि छाया से बुद्धि वृत्ति को अनुसरण करती है। तथा पुरुष शुद्ध हो तो भी बुद्धि का भोग भोगता है उसको अनुभव करते हुए बुध्यात्मा पुरुष तत्तद्वीषयाभेद से प्रतीत होता है।(4)

इस प्रकार तप्यमान पुरुष को दीर्घकालतक निरंतर आदरातिशयपूर्वक यमनियमाद्यष्टांग योग के अनुष्ठान से परमेश्वर आराधन वश प्रकृति पुरुषान्यत्व दृढ हो जाने पर अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश रूप क्लेश पंचक समूल उच्छिन्न होता है अतंतर निर्लेप पुरुष को कैवल्य लक्षण मोक्ष होता है।(5)

प्रथम सूत्र से विचारशील कि प्रवृति के उपयोगी अवश्यपेक्षित विषय, प्रायोजन, सम्बन्ध और अधिकारी रूप अनुबंध चतुष्टय का प्रतिपादन किया इसी सूत्र में अथशब्द को अधिकारार्थक मानते है।(6)

शंका – अथशब्द के मंगल, अनंतर, आरम्भ प्रश्न और कात्र्न्य आदि अनेक अर्थ का कोशकारों ने प्रतिपादन किये हैं तब केवल आरम्भार्थ कही है इस प्रकार का पक्षपात कैसा संगत होगा।(7)

यद्यपि प्रश्न और कात्रंर्यरूप अर्थ असंभव है अवशिष्ट अर्थ का संभव हो सकते है एवंच केवल आरंभ अर्थकत्व कथन अयुक्त है। समाधान – आनंतर्य अथ शब्द का अर्थ है तो क्या नहीं कहीं से आनंतर्य है या पूर्व वृत्त साधारण कारण से आनंतर्य है। कोई एक क्षण भी बिना कर्म के नहीं रह सकता है इस न्याय से प्राणी मात्र कुछ करके कुछ करते रहेंगे उसमें विधि के विनापि आनंतर्य प्राप्त रहेगा अतः तथा अथशब्द का आरम्भ व्यर्थ है। क्योंकि “अनन्यलभ्यो हि शब्दार्थ:” इस न्याय से जो प्रकारांतर से प्राप्त न हो सके वही शब्द का अर्थ हो सकता है। आनंतर्य स्वतः सिद्ध है। द्वितीय पक्ष में शमदमाद्यनंतर योग शास्त्र प्रवृत्त होने पर भी योगानुशासन में शमादिक अनुबंध कोटि प्रविष्ट होने से अनुशासनधान्य होने के कारण शब्दतः योग में प्राधान्य नहीं रहेगा।(8)

यदि कहो शब्दतः प्रधानभूत अनुशासन का शमाद्यानंतर्य अथशब्दार्थ क्यों न होगा सो नहीं कह सकते क्योंकि लक्षणभेद, उपाय फलसहित योग का व्याख्यान जिससे न किया जाये इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न अनुशासन शब्द शास्त्र को कहता है अनुशासन की तत्त्वज्ञान प्रकटनेच्छा उत्तरकालिक होने से शमदमाद्यानंतर्य नियम नहीं हो सकता है जिज्ञासा और ज्ञान के शमाद्यनंतरभावित्व का श्रुतिप्रतिपादन करती है कि शांत इति बाह्यांतर इन्द्रिय नियमपूर्वक तितिक्षु होकर हृदय में आत्मा को देखें इत्यादि तत्वज्ञान प्रकट ने इच्छा के अनंतर भी अथशब्दार्थ न हो सकता क्योंकि संभव हो तो भी श्रोता का विश्वास और प्रवृति के अनुपयोग होने से वैयथर्य प्रसंग है। (9)

(तथापीति) क्या मोक्ष साधनत्व योगानुशासन में ज्ञात है या नहीं? प्रथम पक्ष में अथ शब्दक विना भी उपादेय हो जायेगा। द्वितीय पक्ष में अथ शब्द रहने पर भी अनुपादेय हो जायेगा। ‘अध्यात्म योग द्वारा ध्यान करके धीर होगी पुरुष हर्ष शोक से छूट जाता है’ इत्यादि श्रुतियों से मोक्ष साधनत्व योग में प्रमित है। समाधि में निश्चल बुद्धि होने से योग प्राप्त होता है ऐसी स्मृति भी है इसी से शिष्य प्रश्न तपश्चरणाद्यानन्तर्य भी तिरस्कृत हो गया। (10)

ब्रह्म जिज्ञासा सूत्र में अथ जिस प्रकार आनंतर्यार्थक तीसी प्रकार योगानुशासन शास्त्र में भी क्यों णा होगा इस आशंका का परिहार करते है (अथात इति) अता तो ब्रह्म जिज्ञासा इत्यादि स्थल में ब्रह्म जिज्ञासा अनधिकार्य होने से अधिकारार्थ होने से अधिकारार्थ को त्याग कर शमदमादी साधन चतुष्टययुक्त अधिकारि विशेषद्योतनार्थ शमाद्यानंतर्यार्थकत्व शंकराचार्य ने कहा है।(11)

यद्यपि अथशब्द आनंतयर्यार्थक न हो तथापि मंगलार्थक क्यों न माना जाये? यह भी नहीं हो सकता मंगल का वाक्यार्थ में अन्वय ही नहीं होगा क्योकि अनिंदित और अभीष्ट प्राप्ति मंगल है तत्र दुःख परिहार पूर्वक सुख की प्राप्ति अभीष्ट है योगानुशासन सुख प्राप्ति दुःख निवृत्ति दोनों में से एक भी णा होने से मंगल नहीं हो सकता योगानुशासन मंगल है ऐसा वाक्यार्थ न हो सकता क्योंकि मृदंग ध्वनि के सामान अथशब्द का श्रवण कार्य होने से मंगलवाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ दोनों में से एक भी नहीं हो सकता जिस प्रकार आर्थिकार्थ वाक्यार्थ में निविष्ट नहीं होता है उसी प्रकार कार्य भी वाक्यार्थ में न मिल सकेगा पदार्थ ही वाक्यार्थ में संबद्ध होता है यदि आर्थिकार्थ को भी वाक्यार्थ में अन्वय मानो तो शब्द ही आकांक्षा शब्द ही से शांत होती है यह सिद्ध का भी भंग होगा।(12)

यदि कहो आरम्भ करने के अभिमत प्रबंध कि परिसमाप्ति के प्रतिबंधक दुरित पुंज का उपशमन के लिए एवं शिष्टाचार परिपालन के लिए भी शास्त्र का आरम्भ में मंगल अवश्य अनुष्ठेय है अतएव भाष्यकार ने भी कहा है कि जिस शास्त्र का आरम्भ में मंगल हो और मध्य तथा अंत में मंगल हो वह अत्यंत प्रसिद्ध होता है। ऐसे शास्त्र को बनाने वाले पुरुष आयुष्मान होते हैं, वीर होते हैं इत्यादि। अथशब्द के मंगलार्थकत्व स्मृति में भी कहा है “ओंकार और अथशब्द दोनों ब्रह्मा के कंठ को भेदन करके निकले हैं अतएव दोनों मांगलिक हैं” अतः वृद्धि शब्दवत अथशब्द भी मंगलार्थक होगा (13)

यह भी नहीं कह सकता अर्थान्तर तात्पर्य से प्रयुक्त भी अथशब्द श्रवण मात्र से मंगलार्थ हो सकता है यथा वीणा वंशी आदि का शब्द श्रवण मात्र से मंगल प्रद है यथा वा अन्यदीय दध्यादि का दर्शन मात्र से मंगल होता है। यदि कहो अर्थ अंतर आरंभक वाक्यार्थ ज्ञान फल का अथशब्द भी मंगल फलक कैसा होगा सो सुनो जिस प्रकार यात्रा आदि समय में दुसरे के जाते हुए भरे घट को देखने से शुभ होता है वैसे ही अथशब्द भी स्वरूपतः मंगल होगा। स्मृति विरोध भी नहीं होगा क्योकि उसमें मांगलिक मद है उसका अर्थ मंगल प्रोयोजन है पूर्वप्रकृतापेक्ष भी न होगा क्योंकि ऐसे होने से पूर्वोक्त विकल्प दोष तदवस्त होता है। (14)

यह अथशब्द क्या अधिकारार्थक है अथ आनंतर्यार्थक है? इत्यादि विचारस्थल में जो द्वितीय पक्ष का उपन्यास हो वहां प्रश्नार्थकत्व संभव होने पर भी यहाँ वह संभव नहीं है अतः परिशेष अधिकारपदबोध्य प्रराम्भार्थक अथशब्द है।(15)

अथ एष ज्योति इत्यादि स्थल में जिस प्रकार ऋतू विशेष प्रराम्भार्थक अथशब्द है जिस प्रकार अथ शब्द अनुशासन इत्यादि में अथशब्द व्याकरण शास्त्र का अधिकार अर्थक है तीसी प्रकार योग सूत्र विवरण पर योग भाष्य में भी अथ शब्द को अधिकारार्थक कहा है। वाचस्पति मिश्र ने भी इसी प्रकार व्याख्यान किया है अतः अथशब्द अधिकारार्थक और स्वरूपतः मंगलार्थक भी है यह सिद्ध हुआ।(16)

इस प्रकार अथशब्द अधिकारार्थक होने से आरम्भमाण योग शास्त्र का उपक्रम करके समस्त शास्त्र तात्पर्य व्याख्यान द्वारा शास्त्र का सुखावगम प्रवृत्ति भी सिद्ध हुई।(17)

शंका – याज्ञवल्क्य स्मृति में योग शास्त्र के प्रवर्तक हिरण्यगर्भ को कहा है उसके विपरीत पतंजलि को शास्त्र प्रवर्तक कैसे कहते हो? सो सुनो ब्रह्माजी ने तत्त्वपुराणों में प्रकीर्ण रूप से संक्षेप में कहा है इसलिए योग विशेष रूप से दुर्बोध होने के कारण परम दयालु शेषावतार पतंजलि ने सार को संग्रह करके अनुशासन(पश्चादुपदेश) किया है साक्षात् शासन(उपदेश) नहीं किया।(18)

(यदा यमथशब्द) इति अथ के अधिकार अर्थ पक्ष में योगानुशासन को आरब्ध जनन्ना ऐसा वाक्यार्थ होता है शास्त्र में व्युत्पाद्य माने से साधन और फल सहित योग इस शास्त्र का विषय है उसका व्युत्पादन अवांतर फल है व्युत्पादित योग का कैवल्य (मोक्ष) परम प्रयोजन है। शास्त्र और योग का प्रति पाद्य प्रति पादक भाव सम्बन्ध है कैवल्य और योग का साध्य साधन भाव सम्बन्ध है वह ‘अध्यात्म योगाधिगमेनेत्यादी’ पूर्वोक्त श्रुत्यादी सिद्ध है मोक्षार्थी श्रवण के अधिकारी है एवं अनुबंध चतुष्टय भी उत्पन्न हुआ।(19)

जिस प्रकार योग शास्त्र में अश्रुत भी कैवल्यभिलाशिरूप अधिकारी अर्थात लब्ध होता है उसी प्रकार ब्रह्म जिज्ञासादि में अधिकारी को अर्थतः सिद्धत्व नहीं कह सकते क्योंकि तहां पर अथ शब्द शमाद्यानंतर्य प्रतिपादक होने से शमादियुक्त अधिकारी समर्पण होता है अतः आर्थिकत्व शंका ही नहीं। श्रुति सिद्ध अर्थ में प्रकरणादि का अवकाश नहीं श्रुति से अर्थ न लब्ध हों वही प्रकरणादि नियामक होते हैं अन्यंत्र नहीं हैं। (20)

क्योंकि झटित्यर्थाव् बोधक श्रुति बोधित अर्थ से विरुद्ध अर्थ को प्रकरणादि का बोधन करते है या अविरुद्ध अर्थ का? बाधित होने से विरुद्धार्थ का बोधन नहीं कर सकते व्यर्थतापत्त्या अविरुद्धार्थ को भी नहीं बोधन कर सकते अतएव कहा कहा है श्रुति, लिंग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्या में पूर्व पूर्वक प्रति पर दुर्बल होते हैं क्योंकि उत्तरोत्तर से अर्थ बोधन में विलम्ब होता है श्रुति निरपेक्ष वेद शब्द होने से दुसरे के अपेक्षा नहीं करती लिंग श्रुति कि कल्पना कर श्रुति की कल्पना कर श्रुति द्वारा अर्थ बोधन करेगा वाक्य लिंग श्रुति दोनों की कल्पना करके एवं प्रकरणादिक भी पूर्व पूर्व को कल्पना करेगा इसी से उत्तरोत्तर में विलम्ब होता है।(21)

श्रुति नित्य ही बधिक बाध करने वाली होती है अर्थात श्रुति का बाधक कोई नहीं होता। समाख्या नित्य ही पूर्व पूर्व से बाधित रहती है लिंगादिक पूर्व पूर्व का बाध्य और उत्तरोत्तर का बाधक होते हैं। अतः विषय प्रयोजनादिक होने से ब्रह्म विचार शास्त्रवत योगानुशासन भी आरम्भणीय है। यह सिद्ध हुआ। (22)

यदि कहो विवेचनीय रूप से योग का प्रस्ताव किया है शास्त्र का नहीं पुनः शास्त्र का आरम्भणीयत कैसे कहते हो? उत्तर – सत्य है प्रधानतया योग ही प्रस्तुत है वह योग शास्त्र से व्युत्पादित होता है इसलिए योग प्रतिपादन में शास्त्र करण है करण गोचर है कर्तृ व्यापार कर्मगोचरपरक न हो सकता। जिस प्रकार छेदन करने वाले देवदत्त का व्यापारभूत उठाना गिराना कारणभूत कुठार गोचर है कर्म भूत वृक्षादि गोचर नहीं उसी प्रकार वक्ता पतंजलि का प्रवचन व्यापार आपेक्षा योग विषय अधिकृत है। करणभूत शास्त्र का अभिधान व्यापारापेक्षा योग अधिकृत है। यह विभाग है। अतो योग शास्त्र आरम्भ सम्भावनिक है। (23)

क्लिष्टाक्लिष्टादि पांच प्रकार की चित्त की वृत्ति को रोकना योग है। यदि कहो संयोगार्थक यजु धातु से निष्पन्न योग शब्द संयोगार्थक ही होगा न कि निरोधार्थक। अतएव याज्ञावल्क्य ने भी कहा है कि जीवात्मा और परमात्मा का संयोग को योग कहते है, इति। (24)

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