Charvak Darshan चार्वाक दर्शन

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चार्वाक आचार्य

विष्योंमुख चित्तिओं को देहात्माभिमानादिक स्वाभाविक होने से तत्प्रतिपादक तथा सब मत का निषेध्य होने के कारण प्रथम चार्वाक मत उपन्यास करते है – “अथेत्यादि” परमेश्वर को मोक्ष प्रद कैसे कहते हो। क्योंकि सुरगुरुमतानुयायी नास्तिक शिरोमणि, चार्वाक ने इसको अत्यंत दूषित किया है। चार्वाक मत का निराकरण भी अशक्य है। क्योंकि प्राय: सभी लोग “मृत्यु से कोई भी नहीं बच सकते अतः जब तक जीवे तब तक सुखपूर्वक जीवे। जलाकर भस्म किये हुए देह की पुनः उत्पत्ति कहाँ से होगी? इस लोकोक्तयनुसार नीति शास्त्र तथा काम शास्त्र में प्रातिपादित काम और अर्थ को ही पुरुषार्थ मानकर स्वर्गादि पारलौकिक सुख को निराकरण करने वाले चार्वाक मतावलंबी ही देख पड़ते है अतएव चार्वाक का लोकायत यह दूसरा नाम है। लोक प्रसिद्ध से अतिरिक्त पदार्थ न मानने से लोकायत कहाता है। 5

उनके मत में पृथ्वी, जल, तेज, वायु, चार ही तत्व हैं। देहरूप से परिणत इन्हीं तत्वों से चैतन्य उत्पन्न होता है। जैसे मादक द्रव्यों से मद शक्ति उत्पन्न होती है प्रत्येक द्रव्य में अविद्यमान भी मद्शक्ति समुदाय से उत्पन्न होती है। इन तत्त्वों का नाश होने पर देहरूप आत्मा स्वयं नष्ट हो जाता है। “विज्ञानं स्वरूप आत्मा इन तत्त्वों से उत्पन्न होकर उसी में नष्ट होता है मरने पर परलोक में कोई नाम नहीं रहता। चैतन्य विशिष्ट देह से अतिरिक्त आत्मा में कोई प्रमाण नहीं। केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। अनुमानादि प्रामाण्य में कोई युक्ति नहीं। 6

अंगन लिंगन आदि जन्य सुख ही पुरुषार्थ है। यदि कहो ताद्दश सुख दुःख मिश्रित होने से पुरुषार्थ नहीं हो सकता या भी नहीं, क्योंकि नान्त्रीयकतया अनिवार्य रूप से प्राप्त दुःख को परित्याग कर सुख मात्र का ग्रहण होता है। जिस प्रकार मत्स्यार्थी कांता और छिलका सहित मत्स्यों को पकड़ते है परन्तु जितना अंश उपयुक्त हो उतना लेकर बाकी को छोड़ देता है अथवा जैसे धान्यार्थी सपलाल धन्य को लाकर अपेक्षित अन्नमात्र को ग्रहण कर बाकी पलाल को छोड़ देता है। अतः दुःख के डर से सुख को छोड़ देना उचित नहीं, मृग के डर से धान ही न बोया जाये, भिक्षुकों के भय से पाक भी न किया जाये; यह तो संभव ही नहीं है। यदि कोई डरपोक दृष्ट सुख को त्याग दे तो उसको पशु के सामान मुर्ख ही समझना चाहिए। 7

कहा भी है- विषय भोग से जायमान सुख दुखमिश्रित होने से त्याज्य है यह मूर्खों का विचार है कौन विचारशील तुषकणों से आच्छादित होने के कारण उत्तम धवल तण्डुलों से युक्त धानों को छोड़ देगा। 8

यदि पारलौकिक स्वर्गादि सुख नहीं हो तो बहुत धन व्यय एवं शरीरश्रमसाध्य अग्नि होत्रादि कर्मों में बड़े बड़े विद्वान लोग क्यों प्रवृत्त होते हैं। यह भी प्रमाण पदवी में प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि वैदिकभिमानी धूर्तों ने ही परस्पर अनृत, व्याधात, पुर्नुक्त, दोषों से दूषित क्या है जैसे ज्ञानकाण्ड प्रामाण्यवादियों ने कर्मकांड और कर्मकांड प्रामान्यवादियों ने ज्ञानकाण्ड को दूषित किया है। ऋक यजु सामात्मक वेदत्रय धूर्तों के कल्पित हैं। अग्निहोत्रादिक भी जीविका के लिए है। अग्निहोत्र, वेदत्रय, सन्यास और भस्मलेपन यह सब बुद्धि और प्रक्रम से हीनों की जीविकामात्र है। यह वृहस्पति का कहना है। 9

संक्षेपतः इस मत का सिद्धांत है कि कंटकादि जन्य दुःख ही नरक है। लोक प्रसिद्ध रजा ही ईश्वर है देहोच्छेद अर्थात मरण ही मुक्ति है, देहात्मवाद में ही मैं कुश हूँ स्थूल हों श्याम हूँ इत्यादि सामानाधिकरण्य उसको कहते हैं कि जो विभिन्न धर्म विशिष्ट एक धर्मी का वाचक हो देहात्मवाद में मेरा देह इत्यादि व्यवहार भी राहू का शिर, शिलापुत्रक का शरीर इत्यादि मत औपचारिक हो सकता है। 10

उक्त बातों को चार्वाकों ने संग्रह करके कहा है- पृथिव्यादि चार ही तत्त्व है और इन्हीं तत्वों से मादक द्रव्य समुदाय से मदशक्तिवत चैतन्य उत्पन्न होता है। मैं स्थूल हूँ; कुश हूँ इत्यादि देहाभेद व्यवहार से देह ही आत्मा है। मेरा देह इत्यादि व्यवहार भी उपचार से होता है। 11

“स्यदेतत इति” यह मनोरथ तब सिद्ध हो जब अनुमानादि का प्रामाण्य ही न हो किन्तु अनुमान का प्रामाण्य अवश्य मानना होगा, अन्यथा धूम देखकर धूमध्वज अग्नि के विषय में बुद्धिमानों को प्रवृत्ति कैसे हो सकती है। एवं शब्द प्रमाण न मानने से नदी के किनारे पांच फल हैं इस वाक्य को सुनकर फलार्थियों की फलाहरण प्रवृत्ति भी कैसे होगी। यह भी मनोराज्य मात्र है। क्योंकि व्याप्ति प्रकारक पक्षधर्मताशाली लिंग ज्ञान को अनुमिति के प्रति कारण अनुमान प्रामाण्यवादियों ने माना है यथा जहाँ-जहाँ अग्नि है वहां-वहां धूम है यह व्याप्ति है वहि व्याप्ति प्रकारक ज्ञान है। वहिर्व्याप्य धूमवान पर्वत यह व्याप्ति प्रकारक पक्ष धर्मज्ञान है इसी को परामर्श भी कहते है। अनंतर “पर्वतों वहिर्मान धूमात” ऐसी अनुमिति होती है। शंकित निश्चित भेद से द्विविध उपाधि रहित सम्बन्ध व्याप्ति है। वह सम्बन्ध चक्षुरादि के समान स्वसत्तामात्र से कार्य साधक नहीं होता किन्तु ज्ञान होने से होता है। व्याप्ति ज्ञान का उपाय प्रत्यक्ष हो नहीं सकता क्योंकि बाह्य और आंतर भेद से प्रत्यक्ष दो प्रकार का है चक्षुरादि बहिरिन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष बाह्य है वह विषयेंद्रिय संयोग से होता है। विद्यमान विषय के साथ इन्द्रिय सम्बन्ध होने पर भी भूत भविष्य के साथ सम्बन्ध का असंभव होने से निखिल वहिर् धूम का अव्यभिचरित व्याप्ति ग्रह दुर्ज्ञेय होगा। यदि कहो निखिल धूम वहिर् का प्रत्यक्ष न होने पर भी धूमादिवृत्ति धूमत्वादि एक सामान्य द्वारा संबंध ज्ञान का संभव होगा यह भी नहीं क्योंकि सामान्यत्व धूमत्व वहीर्त्व का अविनाभाव गृहीत होने पर भी व्यक्ति कि व्याप्ति ग्रह का अभाव प्रसंग होगा।12

मानस प्रत्यक्ष भी नहीं कह सकते अंतःकरण स्वतंत्र रूप से बह्यार्थ का ज्ञान नहीं कर सकता किन्तु चक्षुरादि परतंत्र ही करता है यथा मनु को चक्षुरादि का संयोग और चक्षुरादि को विषय का संयोग होने पर प्रत्यक्ष होता है ऐसा नियम है। “चक्षुरादि के विषय को ग्रहण करने में मन चक्षुरादि परतंत्र ही प्रवृत्त होते है।” ऐसा कहा भी है। 13

अनुमान भी व्याप्ति ज्ञान का उपाय नहीं हो सकता एक व्याप्ति ज्ञान के लिए अनुमान करें तो उसमें भी व्याप्ति ज्ञान की अपेक्षा, उसके लिए अनुमानांतर; उसके लिए पुनः व्याप्ति ज्ञानापेक्षा, एवं क्रम से अनवस्था होगी। शब्द भी व्याप्ति ज्ञान का उपाय नहीं क्योकि वैशेषिक के मत में शब्द भी अनुमान से अंतर्भूत है।
शब्द को अनुमान कें अंतर्भाव न मानने पर भी वृद्ध व्यवहार रूप लिंग सापेक्ष होने से पूर्वोक्त अनवस्था तदवस्थ होगी। यथा एव वृद्ध ‘गौ को लावो’ ऐसा किसी भृत्य से कहते है उसको सुनकर भृत्य गौ को लाता है उसको देखकर समीपस्थ बालक को शक्तिग्रह होता है, यह शब्द की शक्तिग्रह का क्रम है। 14

केवल अग्नि के बिना दूम नहीं रहता यह वचन मनु वचन के समान विश्वासास्पद भी नहीं होगा। धूम-अग्नि के अबिनाबूत अर्थात अग्नि की सत्ता के बिना धूम की सत्ता नहीं रहती है इसी प्रकार जिस पुरुष को उपदेश नहीं हुआ हो उस पुरुष को धूम को देखकर अग्नि आदि अर्थान्तर का अनुमान भी संभव है एवं स्वार्थानुमानका अंजलि प्रदान हो जायेगा। तात्पर्य-अनुमान स्वार्थ परार्थ भेद से दो प्रकार है। स्वयं वहिर् धूम की व्याप्ति ग्रहण कर पश्चात् धूम देखकर व्याप्ति स्मरण पूर्वक पर्वत में वहिर् का अनुमान करें तो वह स्वार्थानुमान है जिसने स्वयं व्याप्ति ग्रह न किया हो उसको बोधन करने के लिए पंचावयव वाक्य का प्रयोग करता हो वह परार्थानुमान है प्रकृत में स्वयं व्याप्ति ग्रह न करने से स्वार्थानुमान परकीय वाक्य में विश्वास न होने से परार्थानुमान दोनों दूरतः पलावित हो गए। 15

उपमान भी व्याप्तिग्रह का उपाय नहीं हो सकता क्योंकि संज्ञा-संज्ञी-भाव सम्बन्ध को उपमान कहते है यथा गौ के सदृश गव्य है इस वाक्य को सुनकर वन में तादृश जंतु को देखने से यह गवय है ऐसा उपमान होता है गवयपद-संज्ञा तादृश वास्तु संज्ञी दोनों की शक्ति सम्बन्ध है परन्तु यह नही निरुपाधिक संबंध बोधन में असमर्थ है। 16

उपाधि का आभाव भी दुर्येज्ञ है क्योंकि पूर्वोक्त प्रकार समस्त उपाधि का प्रत्यक्ष संभव न होने से आभाव प्रत्यक्ष के प्रतियोगि प्रत्यक्ष कारण है, विद्यमान उपाधि के अभावव का प्रत्यक्ष होने पर भी अतीत अनागत और वर्धमान भी अप्रत्यक्ष उपाधि के अभाव का प्रत्यक्ष संभव नहीं है: अतः तादृश अभाव प्रत्यक्ष के लिए अनुमान की अपेक्षा करे तो उसमें भी व्याप्ति ज्ञान की अपेक्षा होगी उसके लिए उपाध्यायभाव ज्ञान की अपेक्षा एवं क्रम से अनवस्था तदवस्थ होगी। 17

उपाधि लक्षण में भी व्याप्तिज्ञान अपेक्षा कहते है “अपिचेति” साधना व्यापक त्वोति इनमें तीन पद है, साधना व्यापक तत्व १-साध्य २-सम ३-तीनो का प्रयोजन-“शब्दाऽनित्यः कृतकत्वात”- यह सद्धेतु है। यदि साधना व्यापकत्व नहीं कहता तो सकर्तृकत्व – कार्यकत्व का अव्यापक न हुआ जहाँ-जहाँ कार्यत्व है वहां सर्वत्र सकर्तृकत्व है अतः उसमें अति व्याप्ति वारण के लिए साधना व्यापकत्वरूप विशेषण चरितार्थ हुआ। साध्य व्यापकत्व नहीं कहते तो घटस्व में अति व्याप्ति होगी-क्योंकि घट्त्व घट मात्र ही में रहेगा, कार्यत्व अनित्य वास्तु मात्र में अरेगा अतः साधना व्यापकत्व हो गया साध्य व्यापक कहते है तो घटत्व अनित्यत्व का व्यापक नहीं हुआ सम नहीं कहते तो अश्रावनत्व में अति व्याप्ति होगी, साधन का अव्यापक और साध्य का व्यापक भी अश्रवाणत्व है, साध्य सम कहते हैं तो साध्य समनियत व्याप्ति नहीं हुई क्योंकि अश्रावनत्व अनित्यत्वरूप साध्य से अन्यव नित्य आकाशादि में भी रहता है। “वहिर्मान धूमात” इत्यादि में आर्द्रेन्धन संयोगरूप उपाधि में साधना व्यापकत्व साध्यसमव्यापकत्व होने से लक्षण समन्वय हुआ।

व्याप्ति दो प्रकार की है एक समव्याप्ति और दूसरी असमव्याप्ति यथा गंधवत्त्व पृथ्वीत्व दोनों की परस्पर व्याप्ति सम व्याप्ति है। दोनों में से एक की व्याप्ति हो दुसरे की नहीं हो वह असमव्याप्ति है यथा वहिर्धूम की व्याप्ति धूम की वहिर् के साथ व्याप्ति है परन्तु वहिर् की धूम के साथ व्याप्ति क्यों नहीं क्योंकि दप्त लोह पिंड में अग्नि है धूम नहीं अविनाभाव का अर्थ व्याप्ति है समव्याप्ति और असमव्याप्ति दोनों एक स्थान में हो तो सम और असम अर्थात धूम और अग्नि के मध्य में ही न, अर्थात असम अग्नि सम धूम के साथ यदि व्याप्त न हो अर्थात अग्नि धूम से व्याप्त न हो तो हीन अग्नि अप्रयोजक है अर्थात धूमरूप साध्य का हेतु नहीं हो सकती।

ऐसा नियम है की आभाव ज्ञान में प्रतियोगिज्ञान कारण होता है एवं निषेध ज्ञान में भी विधि ज्ञान कारण होने से उपाधि ज्ञान होने पर उपाध्य भाव सहित व्याप्ति ज्ञान होगा व्याप्ति ज्ञानानंतर उपाधि ज्ञान आईटीआई अन्योंयश्रय दोष भी अपरिहरणीय है। अन्योन्याश्रय का लक्षण “स्वज्ञानाधीन ज्ञानवत्त्व” है स्वपद से उपाधि के आभाव का ग्रहण है उसके ज्ञान के अधीन व्याप्ति ज्ञान है। अतः अविनाभाव दुर्ज्ञेय होने से अनुमानादि का अवकाश ही नहीं। यदि कहो अनुमान का प्रामाण्य ही नहीं तो धुमादी ज्ञान से अग्न्यादि ज्ञान में प्रवृत कैसे होती है – कहीं२ प्रत्यक्ष द्वारा कहीं-२ भ्रान्ति से होती है ऐसे कहेंगे।

भ्रान्ति ज्ञान से प्रवृत पुरुष को शुक्ति रजत आदि में फल की सिद्धि नहीं होती, प्रकृत में अग्न्यादि रूप फल प्राप्त होता है। सो क्यों? वह यद्दच्छा से ही होता है। यथा मणि मन्त्र औषधादि से निश्चित फल मिलता हो तो एक ही रोग के लिए अनेक औषधियों को बदल बदल कर क्यों देते है? इससे मालूम होता है – रोगनिवृत्यादि फल अकस्मात ही होता है। अतः मंत्रादि साध्य अद्दष्टादिक भी नहीं; यदि कहा अद्दष्ट न मनो तो संसार की विचित्रता न होगी- यह भी नहीं क्योंनकी यह सब स्वभाव से होते है। अग्नि को उष्ण, जल को शीत, वायु को शीत स्पर्श- विचित्र रूओप किसने बनाया अर्थात किसने नहीं, यह सब स्वभाव से ही होते है।

वृहस्पति ने भी कहा है – न स्वर्ग है न मोक्ष है परलोक का सुख भोगने वाला आत्मा भी नहीं है वर्णाश्रमादि का जो कर्म है वह भी फलदायक नहीं है। अग्निहोत्र ऋगयजुसामरूपवेदत्रय, सन्यास, भस्मलेपन सब बुद्धि और पराक्रम शून्य के लिए ब्रह्मण ने जीविका मात्र के लिए बनाये है। ज्योतिष्टोम याग में मारे हुए पशु यदि स्वर्ग को जायेगा तो यारा करने वाले अपने पिता को यज्ञ में क्यों नहीं मारते जिससे पिता भी स्वर्ग में पहुँच जाये।

श्राद्ध करने से मरे हुए प्राणियों की तृप्ति होती है तो परदेश जाने वाले पाथेय(भोजन) को क्यों ले जाते हैं, घर ही में श्राद्ध करने से सभी तृप्त हो जायेंगे। यहाँ पर दान करने से स्वर्गस्थ पितृगण तृप्त होते हों तो कोठे पर बैठे विराजमान के नाम से भी यहीं से क्यों नहीं दे देते हो वह तृप्त तो हो ही जायेंगे और नीचे उतरने का कष्ट भी न होगा। जब तक जिवें सुख से भोगें। देह जलकर भस्म हो जाने पर पुनः उसको उत्पत्ति कहाँ से हो सकती है। यदि कोई आत्मा इस देह से निकलकर लोकांतर में जाता हो तो बंधू स्नेह से व्याकुल होकर पुनः क्यों नहीं घर आता है, आता तो नहीं अतः देह से भिन्न आत्मा नहीं है। देह ही है सो यहाँ नष्ट हो गया।

अतः मरे के लिए प्रेतकार्यादि सब ब्राह्मणों ने अपने जीवन के उपाय बनाये है इसके अतिरिक्त कुछ फल नहीं है।

वेद को बनाने वाले धूर्त, भांड और राक्षस यह तीन हैं। जर्फरी तुर्फरी इत्यादि ऋषियों के नाम भी पंडितों ने कल्पित किये हैं। घोड़े के लिंग को पत्नी ग्रहण करे इत्यादि अश्लील वचन भांडों के कहे हुए है। मांसभक्षणादि के वचन राक्षसों ने बनाये है। अतः अनेक जीवों के कल्याण के लिए चर्र्वाक मत का अवलंबन करना उत्तम है।

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