साई बाबा का परिचय

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साई बाबा

साई बाबा

श्री शिरडी साईबाबा कलियुग के महान अवतार हैं । वे मुस्लिम फकीर की भांति ही दाढ़ी रखते थे । फटे-पुराने वस्त्र पहनते थे, भिक्षा मांगकर अपना भोजन प्राप्त करते थे और सदैव “अल्लाह मालिक है,” “अल्लाह भला करेगा” एवं “सबका मालिक एक” बोलते रहते थे । अधिकतर लोग उन्हें मुस्लिम ही मानते थे । उनके आशीर्वाद से लोगों की बीमारीयां ठीक हो जाती थीं । नि:संतान दम्पत्तियों को संतान की प्राप्ति हो जाती थी और सभी प्रकार के कष्टों एवं बाधाओं से लोगों को चमत्कारी ढंग से राहत मिल जाती थी । उन्होंने पानी से दीप जलाकर, मृतकों को जीवित कर तथा अनेक अचरज भरे कारनामें करके अपने को जनमानस में ईश्वरीय अवतार के रुप में प्रतिष्ठित कर लिया था । वे भगवान दत्तात्रेय के अवतार कहे जाते हैं जो ब्रह्मा,विष्णु और महेश के सम्मिलित रुप हैं । उन्हें सर्वदेवता स्वरुप मानकर उनकी पूजा की जाती है ।

श्री साई को शिरडी के साईबाबा के रुप में जाना जाता है । इनके जीवन काल में इनका जन्म, जन्म-स्थान, इनके माता-पिता का नाम, इनका जाति-धर्म आदि रहस्य ही रहा । प्रामाणिक तौर पर श्री साईबाबा के शिरडी आगमन के पूर्व के जीवन का किसी को कुछ पता नहीं था । श्री साई का जब सन 1854 में सर्वप्रथम शिरडी में आगमन हुआ, उस समय वे 16 वर्ष की आयु के थे, उस आधार पर यह माना जाता था कि श्री साई का जन्म 1838 में हुआ ।

श्री साईबाबा के जाति-धर्म के सम्बंध में चर्चा करना व्यर्थ है । साईबाबा ने सारे भेद-भाव मिटाकर सम्पूर्ण मानव जाति में परस्पर प्रेम एवं सदभाव स्थापित करने का काम किया । उनके लिए किसी धर्म-विशेष के क्रिया-कलाप इतने महत्वपूर्ण नहीं थे जितना कि मानवता का मार्ग । यदि उन्हें हिंदु कहा जाये तो वे एक मस्जिद में शरण क्यों लिए हुए थे और सुन्न्त कराने के पक्षधर क्यों थे ? यदि उन्हें मुसलमान कहा जाये तो हिंदु रीति के अनुसार उनके कान क्यों छिदे हुए थे ? श्री साई मस्जिद में निवास करते थे पर इस्लाम धर्म के विरुद्ध वहीं सदा धुनी प्रज्ज्वलित रखते थे और वहाँ चक्की पीसना, शंखनाद, पूजा-आरती आदि कार्य नियमित रुप से होते रहते थे । श्री साई हिन्दुओं का त्योहार रामनवमी भी मनाते थे और मुसलमानों का चंदन-उत्सव भी मनाते थे तथा ईद के अवसर पर मुसलमानों को नमाज पढ़ने के लिए भी आमंत्रित करते थे । इन सब से ही श्री साई पथभ्रष्ट मानव को संकेत देते थे कि “सबका मालिक एक है” और इश्वर के साथ अभिन्नता प्राप्त करनेवाले की कोई जाति नहीं रह जाती है ।

श्री साईबाबा के जीवन काल में ही श्री गोविंद राव रघुनाथ दाभोलकर (हेमडपंत) ने उनके आशीर्वाद से ही “श्री साई सच्चरित्र” की रचना प्रारम्भ की थी । “श्री साई सच्चरित्र” के अनुसार अपने जन्म के सम्बंध में एक बार श्री साईबाबा ने अपने अंतरंग भक्त म्हालसापति को बताया था कि उनका जन्म पाथर्डी के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था और उनके माता-पिता ने बाल्यकाल में ही उन्हें एक फकीर को समर्पित कर दिया था ।

“श्री साई सच्चरित्र” के अनुसार म्हालसापति से श्री साई की इस चर्चा के समय वहाँ पाथर्डी से कुछ लोग आये हुए थे जिनसे श्री साई ने पाथर्डी के कई अन्य लोगों के बारे में पूछा भी था । बाद में जिज्ञासुओं ने श्री साई के जन्म के सम्बंध में यथासंभव खोज करने का प्रयास किया जिसमे पता चला कि श्री साई का जन्म हैदराबाद के पाथर्डी गाँव में भारद्वाज गोत्र के एक गरीब ब्राह्म्ण परिवार में 27 सितम्बर 1838 को हुआ था । श्री साई की माता को इनके लालन-पालन का सौभाग्य प्राप्त नहीं था, अत: उन्होंने नवजात साई को कपड़े में लपेटकर एक वृक्ष के नीचे रख दिया । कुछ ही समय बाद एक वृद्ध फकीर वहाँ पहुँचा । नवजात शिशु की किलकारियां सुनकर वह आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता से झूम उठा । संतान-सुख से वंचित उस फकीर ने बालक को उठाकर सीने से लगाया और उसे अपने घर ले आया । उसकी पत्नी भी बालक को पाकर बहुत खुश हुई । उस बालक का नाम “बाबू” रखा गया ।

बड़े लाड़-प्यार से बाबू की परवरिश होने लगी । कुछ समय बाद वृद्ध फकीर की मृत्यु हो गयी । अकेली पालक मां ही “बाबू” की देखभाल और पालन-पोषण की जिम्मेदारी निभा रही थी लेकिन अब “बाबू” का व्यवहार असमान्य हो रहा था । वह मंदिर में जाकर “अल्लाह-ओ-अकबर” चिल्लाता और मस्जिद में जाकर “हर हर महादेव” के नारे लगाता । उस समय हिंदु मुसलमानों में धर्म के नाम पर वैमनस्य कुछ ज्यादा ही था ।
फलत: हिन्दू और मुसलामान दोनो ही पालक मां से “बाबू” की शिकायत कड़े शब्दों में करने आते । हिन्दु और मुसलामान उसके शत्रु बन गये । भयभीत मां ने “बाबू” को साथ लिया और उस गांव को छोड़ अन्यत्र चली गयी । यह सब विधाता के आदेशानुसार ही हो रहा था । अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर होने के लिए “बाबू” को अब एक गुरु की आवश्यकता थी । उधर हैदराबाद रियासत के एक जागीरदार गोपालराव, जिन्हें अनेक सिद्धियां प्राप्त थीं, आस-पास के लोगों के बीच एक संत के रुप में विख्यात थे । लोग उन्हें वेंकुशा महाराज के रुप में जानते थे । सेलू में स्थित उनका निवास-स्थान वेंकुशा-आश्रम के रुप में जाना जाता था । अपनी चमत्कारी शक्तियों से वेंकुशा महाराज ने अनेक लोगों की मनोकामना पूर्ण की थी ।
गोपालराव जी एक बार अहमदाबाद में सुवागशाह की दरगाह पर पहुँचे तो मजार से उन्हें स्वयं गुंजता सुनाई दिया कि तुम्हारा पूर्व जन्म का शिष्य नये जन्म में पुन: तुम्हारे पास पहुँचनेवाला है । गोपालराव जी के लिए यह अद्भुत अनुभव था । अब वे स्वयं अपने प्रिय शिष्य से मिलने के लिये व्याकुल रहने लगे । कुछ समय उपरांत चार वर्षीय बालक को लिये गरीब वृद्धा मां सेलू में गोपालराव जी के पास सहायता की फरियाद लेकर पहुँची । गोपालराव जी तो स्वयं प्रतीक्षा में थे, उन्होंने शिष्य का स्वागत किया और मां-बेटे को आश्रम में सहर्ष रख लिया ।

गोपालराव जी के सानिध्य में “बाबू” अल्पायु में ही ब्रह्म-ज्ञान की ओर अग्रसर होने लगा । 8 वर्ष बाद पालक मां का देहांत हो गया और 12 वर्ष का “बाबू” अकेला रह गया परन्तु गुरु गोपालाराव के असीम स्नेह के कारण उसे कभी कष्ट का अनुभव नहीं हुआ । “बाबू” के प्रति गोपालराव जी के अतिशय प्रेम को देखकर आश्रम के अन्य शिष्यों के ह्रदय में ईष्या का भाव उत्पन्न हो गया ।

गुरु शिष्य के मध्य ज्ञान-प्रक्रिया निरंतर जारी थी । एक दिन गुरु-शिष्य आश्रम से अज्ञातवास को चले गये । आश्रम में सभी चिंतित हो गये । चार माह तक गुरु-शिष्य का कोई अता-पता नहीं मिला । चारों ओर उनकी खोज हो रही थी । कुछ लोग निकट के घने जंगल में उन्हें खोजने चले गये । कुछ समय की खोज के उपरांत गुरु-शिष्य उन्हें जंगल के शांत वातावरण में एक वृक्ष के नीचे दिखाई दिये । गुरु अपने शिष्य की गोद में सिर रखकर विश्राम कर रहे थे । इस दृष्य को देखकर एक शिष्य ईष्या के वशीभूत होकर आवेश में आ गया और एक ईंट उठाकर बाबू के सिर की ओर फेंक दिया । सिद्ध पुरुष गोपालराव जी बाबू की सुरक्षा हेतु अचानक उठ बैठे और ईंट उन्हीं के सिर में जा लगी । उनके सिर पर गहरी चोट लगी और खून बहने लगा । वे क्रोधित हो उठे, फलत: ईंट फेंकनेवाले शिष्य की तत्काल मृत्यु हो गयी । “बाबू” भी बहुत ड़र गये । गुरु के सिर से बहते रक्त को रोकने के लिये तुरंत अपने वस्त्र फाड़कर उनके सिर पर पट्टी बांधी और आशंकित होकर रोने लगे । गुरु ने उसे शांत किया, उसे वही ईंट भेंट स्वरुप प्रदान किया और उसे सदा अपने पास रखने का आदेश दिया । उसके बाद उन्होंने अपनी सारी सिद्धियाँ और दैवी शक्तियाँ “बाबू” को प्रदान करके उसे मानव जाति के उद्धार के लिये प्रेरित किया । “बाबू” को दी गई शक्तियों के परिक्षण के लिये गुरु ने उसे मृत पड़े अपने शिष्य को पुन: जीवित करने का आदेश दिया । “बाबू” ने अपनी शक्ति से मृत शिष्य को तत्क्षण जीवित कर दिया । उपस्थित सभी लोग इस घटना को देखकर आश्चर्यचकित हो गये। वापस आश्रम पहुँचकर गोपालराव जी ने अपने सभी शिष्यों और सेवकों को पास बुलाया और शीघ्र ही अपने महासमाधि में लीन होने का निर्णय सुनाया । उन्होंने यह भी बताया कि उनके समाधि-स्थान के निकट भूमि खोदने पर भगवान विष्णु की मूर्ति मिलेगी, अत: भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करने के लिये वहाँ मंदिर का निर्माण अवश्य कराना । इसके बाद उन्होंने “बाबू” को गुरुमंत्र देते हुए उसे अपनी कर्ममूमि की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिया । “बाबू” गुरु द्वारा दी गयी ईंट साथ लेकर अपनी कर्मभूमि की ओर चल पड़ा । चलते-चलते “बाबू” शिरडी पहुँचे, तब उनकी आयु 16 वर्ष की थी । शिरडी की सीमा में एक नीम वृक्ष के नीचे इस तरुण सन्त को प्रथम बार तपस्या में अविचल ध्यान में लीन देखा गया । “श्री साई सच्चरित्र” के अनुसार शिरडी की एक वृद्धा, नाना चोपदार की मां ने सबसे पहले उन्हें देखा था । स्वस्थ, अत्यंत रुपवान, तरुण संत शांतचित्त समाधि में लीन ही रहता, किसी से बात नहीं करता और रात्रि में निर्भय होकर एकांत में भ्रमण करता । उसके चेहरे पर अपूर्व तेज विधमान था और उसका आचरण पहुँचे हुये ज्ञानी संत-महात्मा जैसा था । उसे देख लोगों को आश्चर्य हुआ । सभी एक दूसरे से प्रश्न करते थे – यह बालक कौन है, कहाँ से आया है ? उनके प्रश्न अनुत्तरित ही रहते ।

एक दिन जब एक भक्त में भगवान खंडोबा का संचार हुआ तो लोगों ने उनसे तरुण संत का परिचय पूछा । भगवान खंडोबा की आज्ञा के अनुसार एक स्थान विशेष पर खुदाई की गई तो वहाँ ईंट-पत्थरों के नीचे एक दरवाजा दिखाई दिया । अंदर चार दीप जल रहे थे । दरवाजे से आगे एक गुफा थी । वहाँ गौमुखी इमारत थी और लकड़ी के तख्ते, पुष्प मालायें आदि पड़े हुए थे । भगवान खंडोबा के अनुसार उस तरुण ने यहाँ 12 वर्षों तक तपास्या की थी । तरुण संत ने पूछे जाने पर प्रश्न को टाल दिया और कहा कि ‘यह मेरे गुरु का स्थान है, इसे पूर्ववत ढककर सुरक्षित कर दो ।‘ तरुण सन्त ने मात्र दो माह शिरडी में नीम वृक्ष के नीचे तपस्या की । एक दिन अचानक वो वहाँ से गायब हो गये । वे चार वर्षों तक अज्ञातवास में रहे । उसके बाद वो औरंगाबाद जिले के निजाम स्टेट में प्रकट हुए । निजाम स्टेट के धुपखेड़ा गाँव का एक धनी मुसलमान चाँद-पाटिल एक बार औरंगाबाद जा रहा था । रास्ते में कहीं उसकी घोड़ी खो गई । काफी समय तक वह अपनी घोड़ी को खोजता रहा, परन्तु उसे निराशा ही हाथ लगी । उस दिन उदास चाँद-पाटिल पैदल ही घर वापस चल दिया । रास्ते में उसे आम के एक वृक्ष के नीचे चिलम तैयार करता हुआ एक युवा फकीर दिखाई दिया । युवा फकीर ने चाँद-पाटिल को उसके नाम से पुकारा और पास आने को कहा । चाँद-पाटिल चकित हुआ कि फकीर को मेरा नाम कैसे मालूम हुआ । पास जाने पर फकीर ने उसका हाल-चाल पूछा तो चाँद-पाटिल ने घोड़ी खो जाने की बात बता दी । फकीर ने निकट ही एक नाले की ओर इशारा करते हुए वहाँ अपनी घोड़ी खोजने के लिये कहा । चाँद-पाटिल नाले के समीप पहुँचा तो वहाँ अपनी घोड़ी को घास चरते देखकर उसे आश्चर्य हुआ । उसके मन में विचार आया कि यह युवा फकीर कोई साधारण मानव नहीं है । विचारमग्न चाँद-पाटिल घोड़ी को साथ लेकर फकीर के पास चला आया । फकीर चीलम भरकर तैयार कर चुका था । अब चीलम सुलगाने के लिये अग्नि और साफी को गीला करने के लिये पानी की आवश्यकता थी । फकीर ने अपना चिमटा जमीन में गाड़कर निकाला तो चिमटे के साथ एक सुलगता हुआ अंगारा निकला । अंगारा चीलम पर रखकर अपना सटका जमीन पर पटका तो वहाँ से जल की धारा बह निकली । फकीर ने जल से साफी को गीला किया और उसे चीलम पर लपेटकर चीलम से धुम्रपान किया । यह सब देखकर चाँद-पाटिल विश्वास से भर गया । फकीर ने चाँद-पाटिल को भी चीलम पीने को दिया । चीलम पीने से चाँद-पाटिल को अभुतपूर्व अनुभव हुआ । इन चमत्करों से प्रभावित होकर चाँद-पाटिल ने उन्हें पुण्यात्मा मान लिया और उनसे अपने घर चलने का आग्रह किया । आग्रह स्वीकार कर फकीर चाँद-पाटिल के घर चला आया और कुछ दिन वहीं व्यतीत किया । इस बीच चाँद-पाटिल के एक सम्बंधी का विवाह तय हो गया और बारात को शिरडी जाना था । चाँद पाटिल और बारात के साथ फकीर भी शिरडी चला गया ।
शिरडी में बारात को भगवान खण्डोबा के मंदिर में ठहराया गया । मंदिर के सामने बैलगाडियों से बाराती उतर रहे थे । खण्डोबा मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने जब युवा फकीर को बैलगाडी से उतरते देखा तो अनायास ही उसके मुँह से ये शब्द निकल पड़े – “आओ साई”। म्हालसापति ने फकीर का अभिनन्दन “साई” कहकर किया और तभी से अनाम फकीर का नाम “साई” हो गया । 20 वर्ष की आयु में श्री साई का शिरडी में दूसरी बार आगमन हुआ । शिरडी में अपने 60 वर्ष के जीवनकाल में उन्होंने शिरडी के बाहर कभी यात्रा नहीं की ।

शिरडी में श्री साई ने एक जीर्ण-शीर्ण मस्जिद का अपने निवास के रुप में चयन किया । मस्जिद में उन्होंने धूनी प्रज्जवलित करके रहना प्रारम्भ किया और वहाँ से सभी लोगों को “सबका मालिक एक” का संदेश देने लगे । वे अपने पास आनेवाले भक्तजनों को श्रद्धा-सबुरी और समभाव का पाठ पढ़ाते थे । बायजाबाई और नारायण तेली की पत्नी आरम्भ से ही मस्जिद में श्री साई की सेवा-सुश्रुषा कर रही थी । बाद में म्हालसापति, अप्पा कुलकर्णी, नाना साहेब डेंगले, काशीराम, पाटिल बुआ, कोते पाटिल, नंदराम, नारायण तेली, अप्पा जी कोते आदि भक्तों ने श्री साई को अपना सदगुरु मान लिया । धीरे-धीरे श्री साई की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई और वे “साई बाबा” कहलाने लगे ।

प्रारम्भ में श्री साई अधिक समय मस्जिद में व्यतीत नहीं किया करते थे और वे वन में चले जाया करते थे । बायजाबाई प्रतिदिन दोपहर को भोजन लेकर वन में जातीं और श्री साई को ढूँढकर उनसे भोजन करने का आग्रह करतीं । शांत वातावरण में ध्यानमग्न होने के लिये ही श्री साई वन में जाते थे परंतु बायजाबाई की सेवा से प्रभावित होकर और उनके कष्ट को देखकर श्री साई ने वन में जाना बंद कर दिया । तब वे अधिक समय मस्जिद में ही बिताते थे ।

शिरडी में श्री साई भिक्षा मांगने जाते थे । एक हाथ में टमरैल और दूसरे में झोली लेकर वे शिरडी के कुछ घरों में जाते और द्वार पर खड़े होकर आवाज लगाते – “ओ माई, रोटी का टुकड़ा मिले” । श्री साई रोटी आदि सूखे पदार्थ झोली में और साग, छाछ आदि टमरैल में लेकर मस्जिद में वापस लौट आते थे । भिक्षा में मिले भोज्य पदार्थों को भोजन ग्रहण और प्रसाद वितरण के बाद एक कुण्डी में डाल देते थे । वहाँ से कुत्ता-बिल्ली-कौवे भोजन प्राप्त कर लेते थे ।

रात्रि में श्री साई के साथ तात्या कोते पाटिल और म्हालसापति सोते थे । रात में विभिन्न विषयों पर चर्चा होती रहती थी । प्रतिदिन भक्तों की भी‌ड़ मस्जिद में एकत्र होती थी । साई सबसे प्रेमपूर्वक मिलते थे । कुछ भक्त श्री साई के दर्शन करने आते थे, कुछ उनसे उपदेश सुनने आते थे और कुछ अपनी समस्याओं के समधान हेतु आषीश लेने आते थे । श्री साई सबको उदी देते थे और दक्षिणा भी लेते थे । प्रसन्नचित होकर साई यह गीत गाते थे —-
रमते राम आओ जी, उदी-गोनियॉ लाओ जी

श्री साई को प्रकाश और पुष्प अतिप्रिय थे । वे दीप जलाकर मस्जिद को जगमग रखते और खुद परिश्रम करके पुष्प के पौधे उगाते । शिरडी के साईबाबा सभी धर्मों के समर्थक थे । उनके ह्रदय में सम्पूर्ण मानवता के लिये प्यार था । वे सम्पूर्ण मानवता को एक सुत्र में पिरोना चाहते थे । वे कहते थे कि ईश्वर या अल्लाह एक ही परमशक्ति के रुप हैं और धार्मिक मतवाद में फंसे व्यक्ति को परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती है । श्रद्धा, सबुरी, दृढ विश्वास और “सबका मालिक एक” यही उनका सूत्रवत संदेश है ।

साईबाबा के रुप और ढंग निराले हैं । कभी वे नाना साहेब चाँदोरकर को गीता के श्लोक का अर्थ समझाते तो कभी शामा को चुटकी काटते, कभी लेंडी बाग में पौधों की सिंचाई करते तो कभी पुराने सिक्कों को उंगलियों के बीच मसलते, कभी क्रोधित होकर निर्वस्त्र हो जाते तो कभी शांत भाव से भक्तों के मस्तक पर उदी लगाते, कभी कहानियाँ सुनाकर ज्ञान की गंगा बहाते पर सभी रुप और भाव में सत्य, प्रेम, भाईचारे और सर्वधर्म समभाव का गूढ संन्देश ही संचारित करते । साईबाबा अज्ञानरुपी अंधकार को नष्ट कर ज्ञान ज्योति बिखेरनेवाले सूर्यदेव हैं ।

साई भक्ति का मार्ग सरल, सुगम और सुलभ है । साई कृपा की प्राप्ति के लिये अटल श्रद्धा और सबुरी की आवश्यकता है । साई पथ पर चलकर मानव अपना लौकिक और पारलौकिक जीवन आसानी से सफल बना सकता है ।

श्री साईबाबा ने 15 अक्टुबर सन 1918 को 2 बजकर 30 मिनट पर महासमाधि ली । इसके पूर्व भी सन 1886 में दमा रोग से पी‌ड़ित होने पर 72 घंटे की समाधि में साई बाबा चले गये थे । महासमाधि के बाद बाबा ने सबों को आश्वस्त कर दिया था कि वे कहीं नहीं जा रहे हैं । जब भी भक्त पुकारेगा वे तत्काल आयेंगे । आज यह तथ्य भक्तों के अनुभव से प्रमाणित हो रहा है । आज भी भक्तों के घर साई बाबा आते हैं, उनके स्वप्न में आते हैं, शादियों में आमंत्रित होकर आते हैं, असाध्य रोगों से छुटकारा दिलाते हैं । पथ-प्रदर्शन करते हैं और उद्धार भी करते हैं । साई बाबा आज भी सक्रिय हैं, आज भी वे प्रेम-दया-करुणा की त्रिवेणी बहाते हैं । हमें अपना ध्यान और विश्वास बाबा पर केंद्रित करना चाहिये और परम सौभाग्य का लाभ प्राप्त करना चाहिये ।

श्री साईबाबा की शरणागति में ही सबका कल्याण अंतर्निहित है ।

॥ ऊँ श्री साई ॥

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