आरती

artiहिन्दू धर्म मे उपासना की अनेक विधियां है जिन्मे आरती का महत्व सबसे अधिक है। इसमे जलती हुई लौ या इसके समान कुछ विशेष पदार्थ/वस्तु आराध्या देवी/देवता के समक्ष एक विशेष विधि से लहराते हुये सम्बन्धित शब्दों का उच्चारण किया जाता है। आराध्य देवी/देवतानुसार लौ धी, विभिन्न प्रकार के तेल या कपूर की हो सकती है। अनेक देवी/देवताऔं की आरती मे लौ के साथ-साथ धूम का भी महत्त्व है। धूम विभिन्न सामग्रियों के समावेश से निर्मित धूप व शुष्क पदार्थ जैसे गुग्गल आदि हो सकते है।

सामान्य तौर पर देवी/देवताओं को विदाई के समय या मंदिर व देवालयों के द्वार बंद करते समय आरती की जाती है। भारत मे अनेक स्थानों पर आरती के समय ढोल, नगाडे व घडियाल आदि बजाना भी शामिल किया जाता है।

पाठ्को की सुविधा के लिये यहां अनेक आराध्या देवी / देवताओं की सिद्ध आरतियां अंकित की जा रही है।

अंबाजी की आरती, अन्नपूर्णा मां की आरती, बद्रीनाथ जी की आरती, श्री बालाजी की आरती, भैरवजी की आरती, बुद्धवार व्रत की आरती, गणेश जी की आरती, गंगा मां की आरती, गायत्री मां की आरती, हनुमान जी की आरती, काली मां की आरती, केदारनाथ जी की आरती, श्री कुंजबिहारी जी की आरती, लक्ष्मीरमणा जी की आरती, लक्ष्मी जी की आरती, नवग्रह की आरती, पार्वती मां की आरती, रामायण जी की आरती, रामचंद्र जी की आरती, रविदेव की आरती, रविवार व्रत की आरती, साई बाबा की आरती, संतोषी मां की आरती, सरस्वती मां की आरती, शाकूम्बरी मां / शाक्भरी मां की आरती, शनिदेव की आरती, शिवोंकार, शुक्रवार व्रत की आरती, श्यामजी की आरती, तुलसी मां की आरती, वैष्नवी मां की आरती, विन्द्येश्वरी मां की आरती, विष्णु जी की आरती, वृहस्पतिदेव की आरती, बुधवार / युगलकिशोर जी की आरती

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