संदर्भ

Rajeshकर्मयोगी, धर्मयोगी बनने के लिये अनिवार्य नही कि भगवा/पीले वस्त्र धारण कर माथे पर लाल / काला / पीला / सफ़ेद तिलक लगाकर कुछ व्यक्तियों के समूह के साथ नाट्य प्रकरण का हिस्सा बना जाये। यह कदापि कर्मपरायणता या धर्मपरायणता नही हो सकती। अनिवार्य है कि वैदिक ऋचाओं का पालन करते हुये सुदृड, सूनिश्वित जीवन का प्रण किया जाये। केवल उन्ही वस्तुओं के भोग की इच्छा रखे जो सार्थक हो और कष्ट का कारण न बनें। सहज भोजन स्वीकार करे। वातावरण के अनुसार सहज, सुलभ, योग्यतानुसार वस्त्र धारण करे।

कर्मयोगी कभी अपना कर्म नही छोडता। वेद-पुराणो, शास्त्रौ, उपनिषदों एवं सहिंताओ मे रचित ऋचाओं को समझ कर उसी अनुसार पालन करते हुये अपना नित कर्म करे। दंतकथाओं और बाहरी आडंबरों से पृथक रहे। मूर्ख व्यक्तियों के कहने में आकर / धन के लालच मे कर्म का त्याग न करे। लोगों की मूर्खतापूर्ण आडंबरी वाणी पर ध्यान न दे।

धर्मयोगी भी अपना धर्म नही छोडता। धर्म वही है जो मानव कल्याण मे हितकर हो। स्वार्थ भाव से किया गया कार्य धर्मयोगी को शोभित नही। यदि किसी कार्य से किसी जीव का अहित हो रहा है तो इस बात को सूनिश्चित करे कि एक का अहित होने पर अनेक का हित हो रहा है। मात्र स्वयं के हित के लिये या स्वार्थपूर्ती के लिये किसी का अहित करना धर्मयोगी के लिये शोभनीय नही। ऎसा व्यक्ति धर्मयोगी का संवाग मात्र है।

स्वयं को किसी भी नाम से सम्बोधित करना अपनी पहचान बनाना होता है। कोई चाहता उसकी अपनी पहचान हो तो यह उसका अपना अहंकार है जो उसके नाम से जाना जाता है। कोई चाहता है उसकी पहचान उसके अपने देवी / देवता या गुरु से हो तो वह अपने नाम के साथ सम्बन्धित देवी / देवता अथवा गुरु का नाम जोडता है। वह अपनी पहचान को संबंधित देवी/देवता व गुरु पर समर्पित करता है।

जिस प्रकार से आधुनिक समय मे धर्म के नाम पर पाखंड और मिथ्या भाष्यो ने जगह बना ली है वही अनिवार्य हो गया है भक्त / श्रद्धालु स्वयं अपने विचारों को प्रमाणिकता के साथ सम्बन्धित ग्रन्थ मे ही खोजे। भगवान / ईश्वर आदि के  नाम पर प्रकाशित सामग्री व वस्तु आपकी समस्या के समाधान के लिये नही हो सकती, यह जान लिजीये। केवल हिन्दू धर्म मे पूर्व मान्य वेद, पुराण, शास्त्र, उपनिषद, रामायण, महाभारत, शांकरभाष्य, गीता, सहिन्ताएं ही सही अर्थ मे हमारे संस्कारों को सुदृड बनाने के लिये प्रयाप्त है। बाहरी आडम्बर को त्याग कर, शुद्ध मन से जो उक्त मे वर्णित है उसी को प्रमात्मा की वाणी के रूप मे स्वीकार करना मानव की प्राथमिकता है।

मात्र एक ही शब्द /  वाक्य / श्लोक / श्रुति / कथा को पूर्ण मानकर उसी मे से सभी शंकाओं का निवारण असम्भव है।यदि ऎसा सम्भव होता तो शेष ग्रंथो की आवश्यकता कदापि न होती। भिन्न शंका के लिये / भिन्न उद्देश्य के लिये अलग मार्ग / अलग कथा अथवा श्रुति निर्धारित की गयी है। आवश्यकता है भिन्न शंका के लिये उचित खोज की। इसी खोज को सरल बनाने के उद्देश्य से ही इस वेबसाइट का प्रकाशन किया जा रहा है ताकि उचित जानकारी द्वारा शीघ्र समाधान प्राप्त किया जा सके। यदि इस प्रयास मे कोइ त्रुटि या खोज मे किसी प्रकार की कठिनाई पाठको को आ रही है तो हमे अवश्य लिखें आपकी शंका के, प्रश्न के, समस्या के निवारण के लिये सदैव तत्पर।

मां मांतगींदास राजेश

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